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धर्म का ठेकेदार कौन? संघ नहीं, धर्मगुरु ही धर्म के निर्णायक

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सनातनजन ब्यूरो, लखनऊ। आज के दौर में हिंदू धर्म को लेकर बहस और विमर्श जितना बढ़ा है, उतना ही एक बड़ा भ्रम भी समाज में फैलाया जा रहा है। यह भ्रम है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) हिंदू धर्म का प्रतिनिधि है, हिंदू धर्म का रक्षक है और हिंदू धर्म का निर्णायक भी है। लेकिन यदि तथ्य और तर्क के आधार पर देखा जाए तो यह धारणा न केवल गलत है, बल्कि हिंदू धर्म की मूल आत्मा के साथ अन्याय भी है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं को एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है। उसका कार्यक्षेत्र संगठन निर्माण, राष्ट्रवाद, अनुशासन और वैचारिक प्रशिक्षण तक सीमित है। संघ का ढांचा धार्मिक संस्था जैसा नहीं है। वह मंदिर नहीं चलाता, पूजा-पाठ नहीं कराता, वेद-शास्त्रों का अध्ययन नहीं कराता, न ही धर्म-दर्शन की व्याख्या करने वाली कोई परंपरा उसके पास है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब कोई संगठन धर्म की मूल अवधारणाओं का ज्ञाता ही नहीं है, तो वह धर्म का ठेकेदार कैसे हो सकता है?

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धर्म का अर्थ केवल नारा नहीं है। धर्म केवल किसी समुदाय की पहचान नहीं है। हिंदू धर्म तो विशेष रूप से एक विशाल और गहन दर्शन है, जिसकी जड़ें वेद, उपनिषद, गीता, पुराण, स्मृतियों और संत परंपराओं में हैं। हिंदू धर्म की आत्मा में योग है, भक्ति है, साधना है, त्याग है, तप है, आत्मज्ञान है और सहिष्णुता है। यह एक ऐसा धर्म है जो हजारों वर्षों से अनेक मतों, पंथों और विचारों को समेटते हुए आगे बढ़ा है। इसकी व्याख्या करने का अधिकार किसी संगठन को नहीं, बल्कि उस परंपरा को है जो सदियों से धर्म की रक्षा और प्रचार करती रही है।

यदि किसी मुद्दे पर धर्म से जुड़ा प्रश्न उठता है तो उसका उत्तर किसी संगठन से नहीं, बल्कि शंकराचार्य, संत, महंत, आचार्य, पुरोहित और धर्मगुरुओं से लिया जाना चाहिए। धर्म का निर्णय धार्मिक ग्रंथों, शास्त्रों और आचार्य परंपरा से होता है, न कि शाखाओं, नारों या राजनीतिक मंचों से। धर्म का ज्ञान वही दे सकता है जिसने धर्म को पढ़ा हो, जिया हो, साधना की हो और उसके सिद्धांतों को जीवन में उतारा हो।

यह भी विचारणीय है कि जब संघ या उसके समर्थक धर्म पर अधिकार जताने लगते हैं, तो यह स्थिति धर्म को कमजोर करती है। धर्म को जब राजनीतिक एजेंडे में ढाला जाता है, तब वह धर्म नहीं रह जाता, वह सत्ता का उपकरण बन जाता है। हिंदू धर्म का इतिहास बताता है कि यह धर्म कभी भी सत्ता-केन्द्रित नहीं रहा, बल्कि आत्मा-केन्द्रित रहा है। यह धर्म युद्ध नहीं, बल्कि धर्मयुद्ध की बात करता है, जो आत्मशुद्धि और सत्य के मार्ग का संघर्ष है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि संघ को हिंदू धर्म का संरक्षक बताना, हिंदू धर्म की विशाल परंपरा का अपमान है। हिंदू धर्म किसी एक संस्था, संगठन या व्यक्ति की बपौती नहीं है। यह सनातन विचारधारा है, जो ऋषियों, मुनियों, संतों और आचार्यों के ज्ञान से बनी है। धर्म की रक्षा तलवार या नारे से नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना और आचरण से होती है।

इसलिए समाज को यह समझना होगा कि संघ कोई हिंदू धर्म का प्रतिनिधि संगठन नहीं है और न ही उसे धर्म का ठेकेदार माना जा सकता है। धर्म का अधिकार उसी को है जिसने धर्म का अध्ययन किया है, साधना की है और जिसकी पहचान धार्मिक ज्ञान से बनी है। यदि धर्म को बचाना है, तो उसे संगठनों की राजनीति से नहीं, बल्कि धर्म की मूल चेतना से जोड़ना होगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हिंदू धर्म को राजनीतिक विवादों से बाहर निकालकर उसके वास्तविक स्वरूप में समझा जाए। धर्म को संगठन नहीं चलाते, धर्म को परंपरा चलाती है। धर्म को सत्ता नहीं बचाती, धर्म को संत बचाते हैं। और धर्म का निर्णय शाखा में नहीं, शास्त्र में होता है।

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