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जानिए वट सावित्री व्रत का महत्व और विधि

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वट पूजा (वट सावित्री व्रत) का शास्त्रीय महत्व केवल पति की दीर्घायु तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्रत धर्म, आयु, आरोग्य, वंश-वृद्धि और त्रिदेव उपासना से जुड़ा माना गया है। शास्त्रों में वट वृक्ष को “अक्षय” अर्थात कभी नष्ट न होने वाला वृक्ष कहा गया है। इसी कारण इसे जीवन की स्थिरता और परिवार की निरंतरता का प्रतीक माना जाता है।

शास्त्रों के अनुसार वट वृक्ष में त्रिदेव का वास माना गया है। इसकी जड़ें ब्रह्मा का, तना विष्णु का और शाखाएं शिव का स्वरूप मानी जाती हैं। यही कारण है कि वट वृक्ष की पूजा करने से एक साथ ब्रह्मा-विष्णु-महेश की कृपा प्राप्त होती है। कुछ परंपराओं में इसे “कल्पवृक्ष” का स्वरूप भी माना गया है, जो इच्छाओं की पूर्ति करने वाला वृक्ष कहा गया है। वट वृक्ष की दीर्घायु और उसकी छाया का विस्तार भारतीय धर्मशास्त्र में “जीवन-शक्ति” और “रक्षा-कवच” का संकेत माना गया है।

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वट सावित्री व्रत का सबसे बड़ा शास्त्रीय आधार सावित्री-सत्यवान की कथा है, जो धर्मग्रंथों में पतिव्रता धर्म का आदर्श उदाहरण माना जाता है। सावित्री ने सत्यवान के प्राण वापस लाने के लिए यमराज का पीछा किया और अपने धर्म, तप, वाणी और बुद्धि से यमराज को भी प्रसन्न कर लिया। शास्त्रों में इसे “सतीत्व” और “धर्मबल” की विजय के रूप में देखा जाता है। यह कथा बताती है कि नारी का संकल्प, सत्य और धर्म शक्ति से जीवन की सबसे बड़ी बाधा भी हटाई जा सकती है। इसी कारण वट सावित्री व्रत को अखंड सौभाग्य का व्रत कहा गया है।

धर्मशास्त्र की दृष्टि से यह व्रत सौभाग्य-रक्षा और कुल-परंपरा की रक्षा का भी प्रतीक है। वट वृक्ष की पूजा करके महिलाएं परिवार की स्थिरता, संतान-सुख और वंश-वृद्धि की कामना करती हैं। यही कारण है कि इस व्रत में “वट वृक्ष के चारों ओर धागा बांधना” केवल परंपरा नहीं, बल्कि शास्त्रीय रूप से बंधन, संरक्षण और जीवन-सूत्र का संकेत माना गया है। जैसे धागा वृक्ष को घेरता है, वैसे ही स्त्री अपने पति और परिवार के लिए रक्षा-कवच की प्रार्थना करती है।

वट पूजा का एक और शास्त्रीय अर्थ “अक्षय पुण्य” से जुड़ा है। वट वृक्ष को अक्षय कहा गया है, इसलिए इसकी पूजा से मिलने वाला पुण्य भी अक्षय माना जाता है। शास्त्रों में वृक्षों की पूजा को श्रेष्ठ कर्म बताया गया है क्योंकि वृक्ष पृथ्वी पर जीवन का आधार हैं। वट वृक्ष विशेष रूप से दीर्घकाल तक जीवित रहता है, इसलिए यह दीर्घायु और धर्म की स्थिरता का प्रतीक बन गया। वट सावित्री व्रत में उपवास, संयम, सत्य वचन और कथा श्रवण को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।

इस प्रकार शास्त्रों की दृष्टि से वट पूजा का महत्व चार स्तरों पर स्पष्ट होता है—पहला, त्रिदेव उपासना; दूसरा, अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु; तीसरा, संतान और वंश-वृद्धि का आशीर्वाद; और चौथा, अक्षय पुण्य की प्राप्ति। यही कारण है कि वट सावित्री व्रत को सनातन परंपरा में केवल एक पर्व नहीं बल्कि धर्म, तप और परिवार-रक्षा का महाव्रत माना गया है।

स्थिरता का प्रतीक

वट वृक्ष को जीवन और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। इसकी जड़ें गहराई में जाती हैं और शाखाएं फैलकर विशाल रूप ले लेती हैं, इसलिए इसे दीर्घायु और परिवार की वृद्धि का संकेत माना गया है। शास्त्रों के अनुसार वट वृक्ष में देवताओं का वास होता है। वट पूजा के दिन महिलाएं वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं और कच्चा सूत या मौली बांधती हैं। यह धागा पति की रक्षा और वैवाहिक जीवन की मजबूती का प्रतीक माना जाता है। पूजा के दौरान सावित्री-सत्यवान की कथा सुनने और सुनाने की परंपरा है। माना जाता है कि जो स्त्री श्रद्धा से यह कथा सुनती है, उसके घर में सुख-शांति बनी रहती है और वैवाहिक जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।

वट सावित्री व्रत की पूजा विधि में प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके बाद व्रत का संकल्प लेकर वट वृक्ष के नीचे पूजा की जाती है। महिलाएं वट वृक्ष को जल अर्पित करती हैं, हल्दी, कुमकुम, चावल, फूल, दीपक और नैवेद्य चढ़ाती हैं। इसके बाद वट वृक्ष की तीन, पांच या सात परिक्रमा की जाती है। परिक्रमा करते समय सूत बांधकर पति की लंबी उम्र की कामना की जाती है। फिर सावित्री और सत्यवान की कथा का पाठ किया जाता है। कई स्थानों पर महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि कुछ स्थानों पर फलाहार करने की परंपरा है। व्रत का पारण पूजा के बाद या अगले दिन किया जाता है, जो स्थानीय परंपरा पर निर्भर करता है।

वट पूजा केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति का उत्सव भी है।

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