Advertisement
Home Religious Dharm-Sanskriti किस दिन बाल, दाढ़ी और नाखून काटना शुभ, किस दिन वर्जित

किस दिन बाल, दाढ़ी और नाखून काटना शुभ, किस दिन वर्जित

0
180
महाभारत के अनुसार क्षौरकर्म के नियम: सप्ताह के किस दिन बाल, दाढ़ी और नाखून काटना शुभ-अशुभ

सनातन धर्मशास्त्रों में क्षौरकर्म अर्थात बाल, दाढ़ी और नाखून काटने के संबंध में विस्तृत नियम बताए गए हैं। महाभारत के अनुशासन पर्व के ‘आयुष्याख्यान’ प्रसंग में भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को सप्ताह के प्रत्येक दिन क्षौरकर्म के शुभ और अशुभ प्रभावों का वर्णन किया है। इन नियमों का उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण सहित अन्य धर्मग्रंथों में भी मिलता है।

महाभारत के अनुसार सोमवार को बाल, दाढ़ी और नाखून काटने से मानसिक अशांति बढ़ती है तथा शिवभक्ति की हानि होती है। शास्त्रों में पुत्रवान व्यक्ति के लिए इस दिन क्षौरकर्म वर्जित बताया गया है।

Advertisment

मंगलवार को क्षौरकर्म अत्यंत अशुभ माना गया है। अनुशासन पर्व में उल्लेख है कि इस दिन बाल, दाढ़ी या नाखून काटने से आयु में आठ माह की कमी आती है तथा अकाल मृत्यु का भय उत्पन्न होता है।

बुधवार क्षौरकर्म के लिए सर्वश्रेष्ठ दिनों में माना गया है। इस दिन बाल, दाढ़ी और नाखून काटने से आयु में पांच माह की वृद्धि होती है तथा घर में धन-धान्य और माता लक्ष्मी का आगमन होता है।

गुरुवार, जो देवगुरु बृहस्पति का दिन माना जाता है, उस दिन क्षौरकर्म करने से मान-सम्मान की हानि होती है और माता लक्ष्मी घर से रुष्ट होकर चली जाती हैं।

शुक्रवार को क्षौरकर्म शुभ फलदायी बताया गया है। इस दिन बाल, दाढ़ी और नाखून काटने से व्यक्ति के तेज, ओज और आकर्षण में वृद्धि होती है। महाभारत में इस दिन आयु में ग्यारह माह की वृद्धि तथा यश की प्राप्ति का उल्लेख मिलता है।

शनिवार को बाल, दाढ़ी और नाखून काटना वर्जित माना गया है। अनुशासन पर्व के अनुसार इस दिन क्षौरकर्म कराने से आयु में सात माह की कमी आती है तथा व्यक्ति गंभीर रोगों से ग्रस्त हो सकता है।

रविवार को भी क्षौरकर्म अशुभ बताया गया है। इस दिन बाल, दाढ़ी और नाखून काटने से संचित पुण्य का क्षय होता है तथा धन, बुद्धि और धर्म की हानि होती है। साथ ही आयु में एक माह की कमी आने का भी उल्लेख मिलता है।

धर्मग्रंथों में शनिवार को तेल के प्रयोग के संबंध में भी विशेष नियम दिए गए हैं। शास्त्रों के अनुसार शनिवार के दिन तेल खरीदना वर्जित माना गया है, जबकि उसी दिन शरीर पर तिल या सरसों के तेल का तैलाभ्यंग शुभ फलदायी बताया गया है। इस संबंध में शास्त्रों में श्लोक मिलता है—

तैलाभ्यांगे रवौ तापः सोमे शोभा कुजे मृतिः।
बुधे धनं गुरौ हानिः शुक्रे दुःखं शनौ सुखम्॥

इस श्लोक के अनुसार शनिवार को शरीर पर तेल लगाने से सुख की प्राप्ति होती है। वहीं निर्णयसिंधु में उल्लेख है कि सामान्यतः षष्ठी तिथि पर तैलाभ्यंग वर्जित माना गया है, किंतु यदि षष्ठी शनिवार के दिन पड़े तो शनिवार के प्रभाव से यह निषेध समाप्त हो जाता है।

महाभारत के अनुशासन पर्व और अन्य धर्मग्रंथों में वर्णित इन नियमों के अनुसार सप्ताह के सातों दिनों के लिए क्षौरकर्म के अलग-अलग फल बताए गए हैं, जिनका उल्लेख सनातन परंपरा में किया गया है।

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here