सनातन धर्म में भगवान शिव और भगवान विष्णु को लेकर अनेक ऐसी दिव्य कथाएं मिलती हैं, जो यह संदेश देती हैं कि परमात्मा का स्वरूप भले ही अलग-अलग दिखाई दे, लेकिन उसकी सत्ता मूल रूप से एक ही है। भगवान शिव का हरिहरात्मक रूप इसी अद्वैत भाव और हरि-हर की अभिन्नता का अद्भुत प्रतीक माना जाता है। इस दिव्य स्वरूप में भगवान विष्णु और भगवान शिव एक ही शरीर में विराजमान दिखाई देते हैं। एक ओर महादेव की जटाएं, सर्पों के कुण्डल, त्रिनेत्र, त्रिशूल, पिनाक और व्याघ्रचर्म दिखाई देते हैं, तो दूसरी ओर भगवान विष्णु का पीताम्बर, गरुड़ध्वज, शंख, चक्र और शार्ङ्ग धनुष सुशोभित होता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय सम्पूर्ण जगत अशान्त हो उठा। इसका कारण जानने के लिए इन्द्र सहित सभी देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे। भगवान विष्णु ने उन्हें भगवान शिव की शरण में जाने की सलाह दी। देवता मन्दर पर्वत पहुंचे, लेकिन उन्हें सामने उपस्थित महादेव के दर्शन नहीं हुए। भगवान विष्णु ने बताया कि देवताओं ने भगवान शिव का अपराध किया है और इसी कारण उनकी देखने तथा विचार करने की शक्ति प्रभावित हुई है।
पाप से मुक्ति के लिए देवताओं ने तप्तकृच्छ्र व्रत का अनुष्ठान किया और भगवान शिव का विधिपूर्वक अभिषेक एवं पूजन किया। इसके बाद भगवान विष्णु ने उन्हें अपने हृदय कमल में स्थित भगवान शिव के लिंग का दर्शन कराया। इसी दौरान देवताओं के मन में यह प्रश्न उठा कि सत्त्वगुण से सम्बद्ध भगवान विष्णु और तमोगुण से सम्बद्ध भगवान शिव में एकता किस प्रकार हो सकती है। उनके इस संशय को दूर करने के लिए भगवान ने हरिहरात्मक रूप का दर्शन कराया।
इस दिव्य दर्शन ने देवताओं को यह समझाया कि हरि और हर में वास्तविक भेद नहीं है। भगवान शिव की कृपा से अंततः जगत की व्याकुलता भी समाप्त हुई और पृथ्वी का कंपन रुक गया। यह कथा सनातन परंपरा में शिव-विष्णु की अभिन्नता और परमात्मा की एकता का अत्यंत सुंदर संदेश देती है।
भगवान शिव का हरिहरात्मक रूप
एक बार सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए और उन्हें नमस्कार करने के बाद सम्पूर्ण जगत के अशान्त होने का कारण पूछा। देवताओं के प्रश्न करने पर भगवान विष्णु ने कहा—
“देवताओ! हम तुम्हारे इस प्रश्न का यथोचित उत्तर नहीं दे सकते। हम सभी लोगों को एक साथ मिलकर भगवान शंकर के पास चलना चाहिए। वे महान ज्ञानी हैं। सम्पूर्ण सृष्टि में होने वाली किसी भी क्रिया से वे अपरिचित नहीं हैं। इस चराचर जगत की व्याकुलता का कारण वे ही जानते होंगे।”
भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर इन्द्र आदि समस्त देवगण जनार्दन को आगे करके मन्दर पर्वत पर गए। वहाँ जाने पर बहुत प्रयास करने के बाद भी उन्हें कहीं महादेव के दर्शन नहीं हुए।
अज्ञान के अन्धकार में पड़े हुए देवताओं ने भगवान विष्णु से महादेव के दर्शन न होने का कारण पूछा। इस पर भगवान विष्णु ने कहा—
“क्या आप लोग अपने सामने स्थित महादेव को नहीं देख रहे हैं?”
देवताओं ने उत्तर दिया—
“हाँ, हम लोग गिरिजापति देवेश को नहीं देख रहे हैं। हम उस कारण को नहीं जानते, जिससे हमारी देखने की शक्ति नष्ट हो गई है।”
भगवान विष्णु ने कहा—
“देवताओ! आप लोगों ने महादेव का अपराध किया है। आप लोग पार्वती जी का गर्भ नष्ट करने के कारण महापाप से ग्रस्त हो गए हैं। इसलिए शूलपाणि भगवान महादेव ने आप लोगों की सम्यक् अवबोध और विचार-शक्ति को नष्ट कर दिया है। इस कारण आप सब सामने स्थित शंकर को देखकर भी नहीं देख रहे हैं। अतः आप सभी अब महादेव के दर्शन की योग्यता प्राप्त करने के लिए तप्तकृच्छ्र-व्रत द्वारा पावन होकर स्नान करें। उसके बाद आप लोग भगवान शंकर का विधिपूर्वक अभिषेक करें। नाना प्रकार के उपचारों से भगवान शिव की पूजा करें।”
देवताओं! तप्तकृच्छ्र-व्रत का विधान यह है कि तीन दिन बारह पल गर्म जल पिएं, तीन दिन आठ पल गर्म दूध पिएं, तीन दिन छह पल गर्म घी पिएं और तीन दिन केवल वायु का सेवन करके रहें।
भगवान विष्णु के इस प्रकार कहने पर इन्द्र आदि देवताओं ने अपनी शुद्धि के लिए एकान्त में तप्तकृच्छ्र-व्रत का अनुष्ठान किया। इसके प्रभाव से वे पापमुक्त हो गए।
पाप से मुक्त होकर देवताओं ने भगवान विष्णु से कहा—
“जगन्नाथ! अब आप हमें भगवान शम्भु का दर्शन कराएं, जिससे हम उनका अभिषेक कर सकें।”
देवताओं की बात सुनकर मुरारि विष्णु ने उन्हें अपने हृदय-कमल में विश्राम करने वाले भगवान शंकर के लिंग का दर्शन करा दिया। उसके बाद देवताओं ने दुग्ध आदि से उस अक्षय लिंग को स्नान कराया। फिर उन लोगों ने गोरोचन और सुगन्धित चन्दन का लेप किया तथा बिल्वपत्रों और कमलों से भक्तिपूर्वक महादेव की पूजा की। इसके बाद उन्होंने भगवान शिव के एक सौ आठ नामों का जप करके उन्हें प्रणाम किया।
एक ही रूप में हरि और हर का दर्शन
सभी देवता यह विचार करने लगे कि सत्त्वगुण की अधिकता से प्रकट भगवान विष्णु और तमोगुण की प्रधानता से प्रादुर्भूत भगवान शिव में एकता किस प्रकार हुई?
देवताओं के इस विचार को जानकर भगवान ने उन्हें अपने हरिहरात्मक रूप का दर्शन कराया।
देवताओं ने एक ही शरीर में कानों में सर्पों के कुण्डल पहने, सिर पर लम्बे बालों का जटाजूट बांधे, गले में सर्पों की माला धारण किए, हाथों में पिनाक, शूल, आजगव धनुष और खट्वांग धारण किए हुए, व्याघ्रचर्म धारण करने वाले, त्रिनेत्रधारी और वृषध्वज महादेव को देखा।
उसी एक शरीर में कुण्डलधारी, गरुड़ध्वज, हार और पीताम्बर धारण किए हुए तथा हाथों में चक्र, असि, शार्ङ्ग धनुष और शंख धारण किए भगवान विष्णु को भी देखा।
इस प्रकार ब्रह्मा आदि देवताओं ने हरि और हर को एक ही रूप समझकर उनकी स्तुति की।
कुरुक्षेत्र में स्थाणु रूप में महादेव
तदनन्तर देवों के स्वामी भगवान विष्णु देवताओं को समान हृदय वाला समझकर उन्हें साथ लेकर शीघ्र ही अपने आश्रम कुरुक्षेत्र गए। वहाँ उन लोगों ने जल के भीतर स्थाणु रूप में स्थित महादेव को देखा। सभी लोगों ने “स्थाणवे नमः” कहकर भगवान शिव को नमस्कार किया।
इसके बाद इन्द्र ने कहा—
“अतिथि-प्रिय जगन्नाथ! जगत अशान्त हो उठा है। आप बाहर निकलकर आइए और हमें वर दीजिए।”
देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव बाहर आ गए। देवताओं ने उनसे कहा—
“महादेव! आप इस महाव्रत को शीघ्र छोड़ दीजिए। आपके तेज से व्याप्त होकर तीनों लोक क्षुब्ध हो गए हैं।”
देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शंकर ने अपने महाव्रत को त्याग दिया। देवता स्वर्ग चले गए। फिर भी समुद्र और द्वीपों के साथ पृथ्वी का कांपना बन्द नहीं हुआ।
रुद्र ने सोचा कि मेरे तपस्या से विरत हो जाने के बाद भी पृथ्वी क्यों कांप रही है?
फिर त्रिशूलधारी भगवान शिव कुरुक्षेत्र के चारों ओर विचरण करने लगे। उन्होंने ओघवती के किनारे तपस्यारत शुक्राचार्य को देखा।
देवाधिदेव भगवान शिव ने उनसे कहा—
“विप्र! आप जगत को क्षुब्ध करने वाली तपस्या क्यों कर रहे हैं? उसे मुझे शीघ्र बताइए।”
शुक्राचार्य ने कहा—
“देवाधिदेव! आपकी प्रसन्नता प्राप्त करने के उद्देश्य से ही मैं यह तप कर रहा हूँ। त्रिनयन! मैं आपकी कृपा से मंगलमयी संजीवनी विद्या को जानना चाहता हूँ।”
महादेव ने कहा—
“तपोधन! मैं आपकी तपस्या से भली-भांति प्रसन्न हूँ। आप संजीवनी विद्या को यथार्थ रूप से जान जाएंगे।”
इस प्रकार वर प्राप्त कर शुक्राचार्य तपस्या से विरत हो गए। फिर भी सागर, पर्वत, वृक्ष आदि और पृथ्वी का कांपना बन्द नहीं हुआ।
महर्षि मंकण के नृत्य से कांप उठी पृथ्वी
इसके बाद महादेव सप्तसारस्वत में गए। वहाँ उन्होंने मंकण नाम के महर्षि को नाचते हुए देखा। वे बालक के समान भावविभोर होकर उछल-उछलकर नाच रहे थे। उसी के कारण पृथ्वी कांप रही थी।
महादेव के कारण पूछने पर उन्होंने बताया—
“मुझे तपस्या करते हुए अनेक वर्ष बीत गए। अब मेरे हाथ के घाव से शाकरस निकल रहा है। इससे मुझे प्रसन्नता हो रही है और मैं आनन्द में विभोर होकर नाच रहा हूँ।”
भगवान शंकर ने उन्हें नृत्य करने से मना किया और वरदान दिया।
इस प्रकार देवताओं को हरिहरात्मक शिव का दर्शन हुआ और शिव-कृपा से पृथ्वी का कांपना बन्द हो गया। इसके साथ ही सम्पूर्ण जगत की व्याकुलता और अशान्ति भी समाप्त हो गई।
इस कथा का आध्यात्मिक संदेश
हरिहरात्मक रूप केवल भगवान शिव और भगवान विष्णु के एक शरीर में दर्शन की कथा नहीं है, बल्कि यह सनातन परंपरा में एकत्व का गहरा संदेश भी देता है। देवताओं को प्राप्त यह दर्शन बताता है कि उपासना के विभिन्न रूपों के पीछे परम सत्ता एक ही है। हरि और हर को अलग-अलग मानने के बजाय उनके भीतर निहित एकत्व को समझना ही इस दिव्य कथा का मूल भाव है।










