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औढरदानी भगवान शिव: महादेव की महिमा, स्वरूप, परिवार और शिव उपासना

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औढरदानी भगवान शिव का दिव्य स्वरूप
औढरदानी भगवान शिव : ज्ञान, तप, त्याग और करुणा के प्रतीक देवाधिदेव महादेव।

भगवान शिव सनातन परंपरा में केवल देवाधिदेव महादेव के रूप में ही पूजित नहीं हैं, बल्कि वे ज्ञान, वैराग्य, तप, करुणा, त्याग और लोककल्याण के अद्भुत प्रतीक भी माने जाते हैं। उनका स्वरूप जितना रहस्यमय है, उतना ही सहज और भक्तवत्सल भी। वे कैलासवासी योगिराज हैं तो गृहस्थ रूप में माता पार्वती और अपने पुत्रों गणेश व कार्तिकेय के साथ आदर्श परिवार के प्रतीक भी हैं। वे रुद्र हैं तो भोलेनाथ भी; संहार के देवता हैं तो कल्याणकारी शंकर भी। इसी सहजता और कृपालुता के कारण उन्हें आशुतोष और औढरदानी कहा जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव अपने भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उनकी श्रद्धा से की गई उपासना को स्वीकार करते हैं। शिव के चरित्र में त्याग की ऐसी मिसाल भी मिलती है, जब समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को उन्होंने संसार की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण कर लिया और नीलकंठ कहलाए। वहीं रावण, भस्मासुर और मार्कण्डेय से जुड़ी कथाएं उनके विभिन्न स्वरूपों और भक्तों के प्रति उनकी कृपा को सामने रखती हैं।

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शिव की उपासना भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में अत्यंत व्यापक है। ज्योतिर्लिंगों से लेकर गांवों के छोटे-छोटे शिवालयों तक, शिवलिंग की पूजा सर्वत्र दिखाई देती है। काशी विश्वनाथ और कैलास से लेकर रामेश्वरम् तक भगवान शिव की महिमा से जुड़े अनेक तीर्थ श्रद्धालुओं के लिए आस्था के केंद्र हैं।

योग, ध्यान, तप, नृत्य और आध्यात्मिक ज्ञान की परंपराओं में भी शिव का विशेष स्थान है। नटराज का तांडव सृष्टि की गति और परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है, जबकि शिव का ध्यानमग्न स्वरूप आत्मसंयम और वैराग्य का संदेश देता है। यही विविधता भगवान शिव को भारतीय संस्कृति के सबसे व्यापक और लोकप्रिय आराध्य स्वरूपों में स्थान देती है। भगवान शिव और उनका नाम समस्त मंगलों का मूल माना गया है। वे कल्याण की जन्मभूमि, परम कल्याणमय तथा शांति के आगार हैं। वेद तथा आगमों में भगवान शिव को विशुद्ध ज्ञानस्वरूप बताया गया है। समस्त विद्याओं के मूल स्थान भी भगवान शिव ही माने गए हैं। उनका यह दिव्य ज्ञान स्वतःस्फूर्त और स्वयंभू माना जाता है।

ज्ञान, बल, इच्छा और क्रिया-शक्ति में भगवान शिव के समान कोई नहीं है। वे सबके मूल कारण, रक्षक, पालक तथा नियंता होने के कारण महेश्वर कहलाते हैं। उनका आदि और अंत न होने के कारण वे अनंत हैं। वे सभी पवित्रकारी पदार्थों को भी पवित्र करने वाले माने गए हैं। इसलिए वे समस्त कल्याण और मंगल के मूल कारण हैं।

भगवान शंकर दिगंबर होते हुए भी भक्तों को अतुल ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं। अनंत संपदा के अधिपति होते हुए भी भस्म को अपना आभूषण बनाते हैं। श्मशानवासी होते हुए भी त्रिलोक के अधिपति हैं। योगिराज होते हुए भी अर्धनारीश्वर हैं। माता पार्वती के साथ रहने पर भी कामजित हैं और सबके कारण होते हुए भी स्वयं अकारण माने जाते हैं।

आशुतोष और औढरदानी होने के कारण वे शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों के दोषों को क्षमा कर देते हैं तथा उन्हें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ज्ञान और विज्ञान के साथ स्वयं को भी अर्पित कर देते हैं। उनकी कृपालुता का इससे बड़ा उदाहरण भला और क्या हो सकता है?

शिव के दिव्य चरित्र और व्यापक उपासना

प्रायः सभी पुराणों में भगवान शिव के दिव्य और रमणीय चरित्रों का चित्रण मिलता है। संसार भर में शिव मंदिरों, ज्योतिर्लिंगों और स्वयंभू शिवलिंगों से लेकर छोटे-छोटे चबूतरों पर स्थापित शिवलिंगों तक भगवान शंकर की पूजा उनकी व्यापक लोकप्रियता का अद्भुत उदाहरण है।

भगवान शिव का परिवार भी अत्यंत व्यापक माना गया है। उनकी परंपरा में अनेक गण, रुद्र, योगिनियां, मातृकाएं तथा भैरव आदि सहचर माने गए हैं। माता पार्वती की सखियों में विजया आदि प्रसिद्ध हैं।

गणपति के परिवार में सिद्धि और बुद्धि को उनकी पत्नियों तथा शुभ और लाभ को उनके पुत्रों के रूप में वर्णित किया जाता है। गणेशजी का वाहन मूषक है। कार्तिकेय की पत्नी देवसेना तथा उनका वाहन मयूर माना जाता है। भगवती पार्वती का वाहन सिंह है और स्वयं भगवान शंकर धर्मावतार नंदी पर आरूढ़ होते हैं।

स्कंद पुराण से संबंधित परंपरा में वर्णन मिलता है कि एक बार धर्म की इच्छा हुई कि वे देवाधिदेव भगवान शंकर का वाहन बनें। इसके लिए उन्होंने दीर्घकाल तक तपस्या की। अंततः भगवान शंकर ने उन पर अनुग्रह किया और उन्हें अपना वाहन स्वीकार किया। इस प्रकार भगवान धर्म ही नंदी वृषभ के रूप में भगवान शिव के वाहन बने। शास्त्रीय परंपरा में कहा गया है— “वृषो हि भगवान् धर्मः।”

बाण, रावण, चंडी, भृंगी आदि शिव के प्रमुख पार्षदों में माने जाते हैं। इनके द्वाररक्षक के रूप में कीर्तिमुख प्रसिद्ध हैं। शिव मंदिर की परंपरा में कीर्तिमुख का भी विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है।

भगवान शंकर सर्वत्र व्याप्त माने जाते हैं। फिर भी काशी और कैलास उनके प्रमुख स्थानों के रूप में प्रसिद्ध हैं। भक्तों के हृदय में तो वे सदैव निवास करते हैं।

त्रिशूल से पिनाक तक

भगवान शिव के प्रमुख आयुधों में त्रिशूल, टंक, कृपाण, वज्र, कपाल, सर्प, घंटा, अंकुश, पाश तथा पिनाक धनुष का उल्लेख मिलता है। उनका प्रत्येक आयुध उनके किसी न किसी दार्शनिक या आध्यात्मिक स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।

भगवान शंकर के चरित्र अत्यंत उदात्त और अनुकंपापूर्ण हैं। वे ज्ञान, वैराग्य तथा साधुता के परम आदर्श माने जाते हैं। वे भयंकर रुद्र रूप हैं तो भोलेनाथ भी हैं। दुष्ट दैत्यों के संहार में कालरूप हैं तो दीन-दुःखियों की सहायता करने में दयालुता के सागर हैं।

धार्मिक कथाओं में वर्णित है कि जिसने भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया, उसे मनचाहा वरदान प्राप्त हुआ। उन्होंने रावण को अद्भुत शक्ति प्रदान की और भस्मासुर को ऐसी शक्ति का वरदान दिया जिससे वह किसी को भी भस्म कर सकता था। बाद में भस्मासुर के अहंकार और दुरुपयोग के कारण भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर उसका अंत किया।

मार्कण्डेय की रक्षा और नीलकंठ स्वरूप

भगवान शिव की करुणा से जुड़ी प्रसिद्ध कथाओं में मार्कण्डेय की कथा भी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने अपने भक्त मार्कण्डेय की रक्षा की और यमदूतों को वहां से लौटा दिया।

भगवान शिव का त्याग अनुपम माना जाता है। समुद्र मंथन से जब हलाहल विष निकला और उससे समस्त सृष्टि के विनाश का संकट उत्पन्न हुआ, तब भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। इसी कारण वे नीलकंठ कहलाए।

जहां अन्य देवताओं को समुद्र मंथन से प्राप्त विभिन्न दिव्य वस्तुएं मिलीं, वहीं भगवान शिव ने लोककल्याण के लिए विष को स्वीकार किया। यह प्रसंग भगवान शिव के त्याग और करुणा का प्रतीक माना जाता है।

शिव-पार्वती : तप और समर्पण का आदर्श

भगवान शंकर और माता पार्वती का संबंध सनातन परंपरा में दांपत्य और आध्यात्मिक समन्वय का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता सती ने पुनर्जन्म लेकर पार्वती के रूप में भगवान शिव को पुनः पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की।

शिव और शक्ति का यह संबंध भारतीय दर्शन में अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिव को चेतना और शक्ति को उसकी क्रियाशील ऊर्जा के रूप में देखा जाता है। अर्धनारीश्वर स्वरूप इसी समन्वय का प्रतीक है।

योग और ज्ञान के आदि आचार्य

भगवान शिव को योगियों का भी महायोगी कहा जाता है। योग, ध्यान, तप और वैराग्य की परंपरा में उनका विशेष स्थान है। धार्मिक परंपराओं में शिव को योगविद्या और आध्यात्मिक ज्ञान का आदि आचार्य माना गया है।

पारद-शास्त्र और कायाकल्प से जुड़ी परंपराओं में भी भगवान शिव का उल्लेख मिलता है। हालांकि इनसे संबंधित दावों को धार्मिक और पारंपरिक संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।

भगवान शिव को संगीत और नृत्य का भी आदि आचार्य माना गया है। नटराज के रूप में उनका तांडव नृत्य भारतीय नृत्य परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक है। धार्मिक परंपरा में माना जाता है कि उनके डमरू से नाद और स्वर की उत्पत्ति हुई। व्याकरण की परंपरा में भी शिव के डमरू की ध्वनि से संबंधित पौराणिक आख्यान प्रसिद्ध हैं।

इस प्रकार भगवान शंकर को अनेक विद्याओं और कलाओं का जन्मदाता तथा प्रवर्तक माना गया है। संस्कृत साहित्य और भारतीय धार्मिक वाङ्मय में उनके चरित्र का व्यापक वर्णन मिलता है। वे देवों के देव महादेव हैं और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में उनका स्थान अत्यंत विशिष्ट है।

शिवलिंग की उपासना

लिंगरूप में भगवान शिव की उपासना का अपना विशिष्ट दार्शनिक महत्व है। शिवलिंग को शिव और शक्ति के समन्वय तथा सृष्टि के मूल तत्त्व के प्रतीक के रूप में समझा जाता है। शिव उपासना में “त्र्यम्बकं यजामहे…” महामृत्युंजय मंत्र का विशेष महत्व है।

भगवान श्रीराम द्वारा रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना और पूजा से संबंधित धार्मिक परंपरा भी अत्यंत प्रसिद्ध है। इसी प्रकार काशी विश्वनाथ की उपासना की परंपरा भी अत्यंत प्राचीन मानी जाती है।

भगवान शिव की उपासना भारतीय सभ्यता और संस्कृति में तप, योग, ध्यान और आध्यात्मिक ज्ञान की परंपरा को अभिव्यक्त करती है। हिमालय में उनका निवास तप और वैराग्य का प्रतीक माना जाता है। योग और साधना भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के प्रमुख तत्व हैं और भगवान शिव इस परंपरा के सर्वोच्च प्रतीकों में से एक हैं।

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