हिंदू धर्मग्रंथों में गंगावतरण की कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि तपस्या, संकल्प, विनम्रता और लोककल्याण की अद्भुत गाथा है। महाराज सगर के साठ हजार पुत्रों के उद्धार के लिए उनके वंशज भगीरथ ने जिस असाधारण तपस्या और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया, उसी के परिणामस्वरूप मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। इसी कारण आज भी किसी कठिन और असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को अथक प्रयास से पूरा करने के लिए ‘भगीरथ प्रयास’ की उपमा दी जाती है।
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा इंद्र ने कपिल मुनि के आश्रम के निकट छिपा दिया था। घोड़े की खोज में पहुंचे सगर के पुत्रों ने कपिल मुनि का अपमान किया और उनकी क्रोधाग्नि में भस्म हो गए। उनके उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाना आवश्यक था। सगर के वंशज अंशुमान और दिलीप के प्रयास सफल नहीं हुए, लेकिन भगीरथ ने अपना संपूर्ण जीवन इस महान संकल्प के लिए समर्पित कर दिया।
ब्रह्मा की आज्ञा और भगवान शिव की कृपा से गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरीं। शिव ने अपने जटाजूट में गंगा के प्रचंड वेग को धारण किया और फिर उनकी धाराओं को पृथ्वी पर प्रवाहित किया। भगीरथ के पीछे चलती हुई गंगा अंततः सगर-पुत्रों की भस्म तक पहुंचीं और उनका उद्धार हुआ। इसी कारण मां गंगा को ‘भागीरथी’ और ‘पतित पावनी’ के नाम से भी श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।
पूर्वकाल में अयोध्या में सगर नामक एक परम प्रतापी राजा राज्य करते थे। उनकी एक रानी से एक पुत्र तथा दूसरी रानी से साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए। कुछ काल बाद महाराज सगर के मन में अश्वमेध यज्ञ करने की इच्छा हुई। राजा सगर ने यज्ञीय अश्व की रक्षा का भार अपने पौत्र अंशुमान को सौंपकर यज्ञ प्रारंभ कर दिया।
परंतु यज्ञ के पर्व के दिन राजा सगर के यज्ञीय घोड़े को राक्षस का रूप धारण करके इंद्र ने चुरा लिया और उसे भगवान कपिल मुनि के आश्रम के पास छोड़ दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र पृथ्वी को खोदते हुए और घोड़े का पता लगाते हुए कपिल मुनि के आश्रम पर पहुंचे। महाराज सगर का यज्ञीय अश्व भी वहीं चर रहा था।
भगवान कपिल को ही घोड़े का चोर समझकर सगर-पुत्रों को अत्यंत क्रोध आया। वे कपिल मुनि को दुर्वचन कहते हुए उन्हें मारने के लिए दौड़े। भगवान कपिल ने एक ही हुंकार से उन्हें जलाकर भस्म कर दिया।
तदनंतर अपने चाचाओं का पता लगाते हुए राजकुमार अंशुमान कपिल मुनि के आश्रम पर पहुंचे, जहां सगर के साठ हजार पुत्र कपिल मुनि की क्रोधाग्नि में जलकर राख के ढेर हुए पड़े थे। महातेजस्वी अंशुमान ने उन्हें जलांजलि देने के लिए जल की इच्छा की, किंतु वहां कहीं भी कोई जलाशय दिखाई नहीं दिया।
उसी समय उन्हें पक्षिराज गरुड़ दिखाई दिए। उन्होंने अंशुमान से कहा—‘नरश्रेष्ठ! सामान्य जलांजलि से तुम्हारे चाचाओं का उद्धार नहीं होगा। हिमवान की ज्येष्ठ पुत्री गंगा जी को इस पृथ्वी पर लाने का प्रयत्न करो और उन्हीं के पवित्र जल से अपने चाचाओं का तर्पण करो। जिस समय लोकपावनी गंगा राख के ढेर बने हुए साठ हजार राजकुमारों को अपने जल से तृप्त करेंगी, उसी समय वे उन सभी को स्वर्ग पहुंचा देंगी।’
अंशुमान घोड़ा लेकर लौट आए। बहुत प्रयत्न करने के बाद भी वे गंगा जी को पृथ्वी पर न ला सके। आगे चलकर उनके वंश में भगीरथ उत्पन्न हुए। वे राज्य का भार अपने मंत्रियों को सौंपकर गंगा जी को पृथ्वी पर लाने के लिए गोकर्ण तीर्थ में बड़ी भारी तपस्या करने लगे।
भगीरथ की हजारों वर्षों की कठोर तपस्या के बाद लोकपितामह ब्रह्मा वहां आए और कहा—‘महाराज भगीरथ! तुम्हारी तपस्या से मैं परम प्रसन्न हूं। तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो। मैं तुम्हें गंगा जी को दे सकता हूं, परंतु हिमवान की ज्येष्ठ पुत्री गंगा जी को धारण करने की शक्ति भगवान शंकर के अतिरिक्त और किसी के पास नहीं है। तुम्हें गंगा के इस महान वेग को रोकने के लिए भगवान रुद्र की तपस्या करनी चाहिए।’
ऐसा कहकर ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए।
ब्रह्माजी के चले जाने पर राजा भगीरथ पृथ्वी पर अंगूठे के अग्रभाग को टिकाकर लगातार एक वर्ष तक भगवान शंकर की कठोर तपस्या करते रहे। वर्षभर बाद सर्वलोकवंदित उमावल्लभ भगवान पशुपति प्रकट हुए। उन्होंने भगीरथ से कहा—‘नरश्रेष्ठ! मैं तुम पर परम प्रसन्न हूं। मैं तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य करूंगा। मैं गिरिराजकुमारी गंगा को अपने मस्तक पर धारण करके तुम्हारे पूर्वजों के साथ-साथ समस्त प्राणियों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करूंगा।’
भगवान शंकर की स्वीकृति मिल जाने के बाद हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री गंगा जी बड़े ही प्रबल वेग से आकाश से भगवान शंकर के मस्तक पर गिरीं। उस समय गंगा जी के मन में भगवान शंकर को विजित करने की प्रबल इच्छा थी। भगवान शंकर का विवाह पार्वती जी से होने के कारण रिश्ते में वे भगवान शंकर की बड़ी साली हैं। इन्होंने ही देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शंकर के वीर्य को धारण करके कार्तिकेय को जन्म दिया था। अतः इनके मन में अहंकार के साथ भगवान शिव से परिहास का भाव भी था।
गंगा जी का विचार था कि मैं अपने प्रबल वेग से भगवान शंकर को लिए-दिए पाताल में घुस जाऊंगी। गंगा जी के इस अहंकार को भांपकर त्रिनेत्रधारी शिव जी कुपित हो उठे और उन्होंने गंगा जी को अदृश्य करने का विचार किया। वैसे भी गंगा जी भक्ति की प्रतीक हैं और भक्ति में अहंकार सबसे बड़ा बाधक तत्व है। भगवान शिव अपने भक्तों के अहंकार को नष्ट करने के लिए कभी-कभी उन पर क्रोध भी करते हैं और उनका क्रोध भी कृपा करने के लिए ही होता है।
पुण्यशीला गंगा जब भगवान रुद्र के मस्तक पर गिरीं, तब वे उनकी जटाओं के जाल में बुरी तरह उलझ गईं। लाख प्रयत्न करने पर भी वे बाहर न निकल सकीं। भगवान शिव के जटाजाल में उलझकर वे बहुत वर्षों तक उसी में चक्कर लगाती रहीं।
जब भगीरथ ने देखा कि गंगा जी भगवान शिव के जटामंडल में अदृश्य हो गई हैं, तब उन्होंने पुनः भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए तप करना प्रारंभ कर दिया। उनके तप से संतुष्ट होकर भगवान शिव ने गंगा जी को ले जाकर बिंदु सरोवर में छोड़ दिया।
वहां से गंगा जी सात धाराओं में विभक्त हो गईं। इस प्रकार ह्लादिनी, पावनी और नलिनी नाम की धाराएं पूर्व दिशा की ओर तथा सुचक्षु, सीता और महानदी सिंधु—ये तीन धाराएं पश्चिम दिशा की ओर चली गईं। सातवीं धारा महाराज भगीरथ के पीछे-पीछे चली।
इस प्रकार आकाश से भगवान शंकर के मस्तक पर और वहां से पृथ्वी पर आई गंगा जी की जलराशि अद्भुत शोभा पा रही थी। सभी देवता आकाश में खड़े होकर गंगावतरण के इस अद्भुत एवं उत्तम दृश्य को देख रहे थे। गंगा का जलमार्ग कभी नीचे तो कभी ऊंचे मार्ग पर उठता हुआ भूमि पर गिरता था। आकाश से भगवान शंकर के मस्तक तथा वहां से पृथ्वी पर गिरा हुआ वह निर्मल जल उस समय अत्यंत शोभायमान था।
जो लोग शापभ्रष्ट होकर आकाश से पृथ्वी पर आए थे, वे गंगाजल में स्नान करके पुनः निष्पाप हो गए। इस प्रकार भगवान शंकर की कृपा से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ और भगीरथ के पितरों के उद्धार के साथ पतितपावनी गंगा संसारवासियों को प्राप्त हुई।
शास्त्रीय संदर्भ
गंगावतरण की कथा का प्रमुख उल्लेख:
वाल्मीकि रामायण, बालकांड, सर्ग 38 से 44
महर्षि विश्वामित्र भगवान श्रीराम को राजा सगर, उनके साठ हजार पुत्रों, कपिल मुनि, अंशुमान, भगीरथ तथा गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा सुनाते हैं। बालकांड के सर्ग 38 में राजा सगर और उनके पुत्रों का वर्णन मिलता है, जबकि सर्ग 44 में भगीरथ के पीछे गंगा के सागर और सगर-पुत्रों की भस्म तक पहुंचने तथा उनके उद्धार का उल्लेख है।
गंगा के पृथ्वी पर अवतरण और सगर-पुत्रों के उद्धार का प्रसंग महाभारत में भी विभिन्न स्थानों पर मिलता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में सगर-पुत्रों के उद्धार के लिए भगीरथ द्वारा गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने का उल्लेख मिलता है।
मुख्य संदर्भ:
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण — बालकांड, सर्ग 38–44
महाभारत — अनुशासन पर्व










