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भगवान भव रुद्र से हनुमान अवतार तक

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भव रुद्र योगाचार्य स्वरूप
भगवान भव रुद्र और रुद्रावतार हनुमान—ज्ञान, योग, शक्ति और भक्ति के दिव्य स्वरूप।

सनातन परंपरा में भगवान शिव केवल संहार के देवता ही नहीं, बल्कि योग, ज्ञान, वैराग्य और आत्मकल्याण के आदि गुरु भी माने गए हैं। भगवान रुद्र के ग्यारहवें स्वरूप ‘भव’ को जगद्गुरु और योगाचार्य के रूप में विशेष महत्त्व प्राप्त है। शैवागम, लिंगपुराण और शिवपुराण की परंपराओं में उनके ज्ञानोपदेश, योग-मार्ग की स्थापना और शिष्यों के माध्यम से इस दिव्य परंपरा के विस्तार का वर्णन मिलता है। इसी रुद्रतत्त्व से भगवान शिव के हनुमान रूप में अवतार की कथा भी जुड़ी हुई है, जिसमें श्रीराम की सेवा, भक्ति, शक्ति और धर्म की स्थापना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

भगवान रुद्र के ग्यारहवें स्वरूप भव को सनातन परंपरा में जगद्गुरु और योगाचार्य के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। उन्हें योग, वेदान्त और आत्मज्ञान का आदि गुरु माना गया है। परंपरा के अनुसार रुरु, दधीचि, अगस्त्य और उपमन्यु उनके प्रमुख शिष्यों में बताए गए हैं। विभिन्न कल्पों में भगवान भव रुद्र ने सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान रूपों में प्रकट होकर ब्रह्मा तथा अन्य कुमारों को ज्ञान और योग का उपदेश दिया।

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भगवान शिव के प्रमुख रुद्रावतारों में हनुमानजी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। परंपरागत मान्यता के अनुसार उन्होंने अंजनी के गर्भ से वानर रूप में अवतार लेकर श्रीराम की सेवा की। बाल्यकाल में सूर्य को फल समझकर निगलने का प्रयास, इन्द्र के वज्र प्रहार और देवताओं से प्राप्त वरदानों की कथा उनके अद्भुत सामर्थ्य को दर्शाती है।

श्रीराम से भेंट के बाद हनुमानजी ने सुग्रीव और श्रीराम की मित्रता कराई, सीताजी की खोज की और लंका में श्रीराम का संदेश पहुंचाया। उनका जीवन शक्ति, ज्ञान, विनम्रता, सेवा और अखंड रामभक्ति का आदर्श है।

इस प्रकार भव रुद्र और हनुमानजी की कथाएं सनातन परंपरा में भगवान शिव के ज्ञान, योग, शक्ति और भक्ति से जुड़े व्यापक स्वरूप को सामने रखती हैं।

योगीन्द्रनुतपादाब्जं द्वंद्वातीतं जनाश्रयम्। वेदान्तकृतसञ्चारं भवं तं शरणं भजे॥ (शैवागम)

‘योगीन्द्र जिनके चरण-कमलों की वंदना करते हैं, जो द्वंद्वों से अतीत तथा भक्तों के आश्रय हैं और जिनसे वेदान्त का प्रादुर्भाव हुआ है, मैं उन भव की शरण ग्रहण करता हूँ।’

भगवान रुद्र के ग्यारहवें स्वरूप का नाम भव है। इसी रूप में वे संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं तथा जगद्गुरु के रूप में वेदान्त और योग का उपदेश देकर आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। भगवान रुद्र का यह ग्यारहवाँ स्वरूप जगद्गुरु के रूप में वंदनीय है। भव-रुद्र की कृपा के बिना विद्या, योग, ज्ञान, भक्ति आदि के वास्तविक रहस्य से परिचित होना असंभव है। वे अपने क्रिया-कलाप, संयम-नियम आदि के द्वारा जीवन्मुक्त योगियों के परम आदर्श हैं।

लिंगपुराण के सातवें अध्याय और शिवपुराण के पूर्व भाग के बाईसवें अध्याय में भगवान भव रुद्र के योगाचार्य स्वरूप और उनके शिष्य-प्रशिष्यों का विशेष वर्णन है। प्रत्येक युग में भगवान भव रुद्र योगाचार्य के रूप में अवतीर्ण होकर अपने शिष्यों को योगमार्ग का उपदेश प्रदान करते हैं। इन्होंने सर्वप्रथम अपने चार बड़े शिष्यों को योगशास्त्र का उपदेश दिया। उनके नाम रुरु, दधीचि, अगस्त्य और उपमन्यु हैं। ये सभी पशुपति-उपासना के प्रवर्तक हुए। इस प्रकार भगवान भव-रुद्र ही योगशास्त्र के आदि गुरु हैं।

भगवान भव-रुद्र ही सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान रूप में पाँच कल्पों में अवतार लेकर ब्रह्मा एवं चार शिष्यों को आदि गुरु के रूप में योगशास्त्र का उपदेश देते हैं। विभिन्न कल्पों के प्रत्येक द्वापर में भी भगवान रुद्र प्रकट होकर अपने चार शिष्यों को योगमार्ग का प्रवर्तक बनाते हैं।

श्वेत-लोहित नाम के उन्नीसवें कल्प में जब ब्रह्माजी परब्रह्म का ध्यान कर रहे थे, उसी समय श्वेत और लोहित वर्ण वाला शिखाधारी कुमार उत्पन्न हुआ। ब्रह्माजी ने उसे परब्रह्म रुद्र समझकर उसकी वंदना की। वे समझ गए कि यह सद्योजात कुमार रुद्र हैं। उसी समय वहाँ श्वेत वर्ण वाले चार और कुमार प्रकट हुए। उनके नाम सुनन्दन, नन्दन, विश्वनन्द और उपनन्द थे। सद्योजात भगवान भव रुद्र ने प्रसन्न होकर ब्रह्मा को ज्ञान के साथ सृष्टि-रचना की शक्ति प्रदान की। फिर ब्रह्माजी के द्वारा उन चारों कुमारों को योग-ज्ञान का उपदेश मिला। वे सब योगनिष्ठ महात्मा हो गए और बाद में योगमार्ग के प्रवर्तक हुए।

रक्त नामक बीसवें कल्प में ब्रह्माजी का रक्तवर्ण का शरीर हुआ। उस समय पुत्र-कामना से ध्यान करते हुए ब्रह्माजी के समक्ष रक्तवर्णधारी वामदेव नाम से रुद्र का प्राकट्य हुआ। तत्पश्चात् विरजा, विवाह, विशोक और विश्वभावन नाम के चार कुमार प्रकट हुए। उस अवतार में भव रुद्र का नाम वामदेव था। उन्होंने ब्रह्मा को ज्ञान और सृष्टि-रचना की शक्ति प्रदान करने के साथ चारों कुमारों को योगमार्ग का प्रवर्तक बनाया।

इसके बाद पीतवासा नामक इक्कीसवें कल्प में पुत्र-कामना से ध्यानावस्थित ब्रह्माजी के समक्ष पीताम्बरधारी तत्पुरुष नाम से अवतरित होकर भव रुद्र ने उन्हें ज्ञानोपदेश किया। भगवान तत्पुरुष के साथ उनके पार्श्वभाग से पीतवसनधारी चार कुमार प्रकट हुए। वे सब योगमार्ग के आचार्य हुए।

शिव कल्प में ध्यानस्थ ब्रह्मा के सामने भव रुद्र का काले वर्ण में अघोर नाम से प्राकट्य हुआ और उनके पार्श्वभाग से उन्हीं की तरह चार तेजस्वी काले वर्ण वाले कुमार प्रकट हुए। वे सभी अघोर नामक योग के प्रवर्तक हुए। इसी प्रकार विश्वरूप कल्प में ध्यानस्थ ब्रह्मा के समक्ष ईशान नाम से प्रकट होकर ब्रह्मा को ज्ञानोपदेश के साथ अपने साथ प्रकट हुए चारों कुमारों को भव रुद्र ने योगाचार्य बनाया। इस प्रकार प्रत्येक कल्प में प्रकट होकर भगवान रुद्र ज्ञान और योग की स्थापना करते हैं।

शिवजी का हनुमान के रूप में अवतार

एक समय की बात है। भगवान शिव ने भस्मासुर की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वरदान दे दिया कि तुम जिसके सिर पर अपना हाथ रख दोगे, वह जलकर भस्म हो जाएगा। भस्मासुर पार्वती के सौंदर्य पर मोहित होकर उन्हें प्राप्त करने के लिए भगवान शिव को ही भस्म करने का उपक्रम करने लगा। उस समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके युक्ति द्वारा भस्मासुर को भस्म कर दिया।

भगवान शिव ने जब भगवान विष्णु के मोहिनी रूप का दर्शन किया, तब वे कामदेव के बाणों से आहत होकर क्षुब्ध हो गए। उस समय भगवान शिव के वीर्य का स्खलन हो गया। सप्तर्षियों ने उस वीर्य को पत्रपुट में स्थापित कर लिया, क्योंकि भगवान शिव ने ही उनके मन में उस समय रामकार्य के लिए ऐसी प्रेरणा उत्पन्न की थी। फिर उन महर्षियों ने उस वीर्य को रामकार्य की सिद्धि के लिए गौतम की कन्या अंजनी के कान के रास्ते उसके गर्भ में स्थापित कर दिया। समय आने पर अंजनी के गर्भ से भगवान शंकर महान बल और पराक्रम से संपन्न वानर-शरीर धारण करके अवतरित हुए। उनका नाम हनुमान रखा गया।

हनुमान अपने शिशुकाल में ही एक बार भगवान सूर्य को फल समझकर निगल गए। उसी दिन राहु और केतु के द्वारा सूर्यग्रहण लगने वाला था। राहु और केतु ने दूसरे व्यक्ति द्वारा सूर्य को निगले जाने की शिकायत इन्द्र से की। इन्द्र जब हनुमानजी को रोकने गए, तब हनुमानजी इन्द्र और ऐरावत को कोई दूसरा फल समझकर निगलने के लिए आगे बढ़े। उस समय इन्द्र ने कुपित होकर उनके ऊपर वज्र का प्रहार किया, जिससे वे अचेत हो गए। पवनदेव ने हनुमानजी को अचेत देखकर चलना बंद कर दिया, जिससे संपूर्ण सृष्टि के प्राणी संकट में पड़ गए। उसके बाद सभी देवताओं ने हनुमानजी को वरदान दिया। भगवान सूर्य ने गुरु रूप में उन्हें शिक्षा दी।

तदनन्तर रुद्र के अवतार कपिश्रेष्ठ हनुमानजी अपने विद्यागुरु सूर्य की आज्ञा से सूर्यांश से उत्पन्न सुग्रीव के साथ रहने लगे। उसके बाद सीताजी की खोज में लगे श्रीराम से हनुमानजी का मिलन हुआ। उन्होंने श्रीराम और सुग्रीव की परस्पर मित्रता कराकर सुग्रीव को वालि के भय से मुक्त कराया और उसे किष्किन्धा का राजा बनवाया। फिर उन्होंने सीताजी की खोज की, असुरों का मान-मर्दन किया तथा श्रीराम का कार्य पूरा किया। इस भूतल पर श्रीरामभक्ति की स्थापना के साथ उन्होंने भक्ताग्रगण्य होकर श्री सीता-राम को सुख प्रदान किया।

रुद्रावतार ऐश्वर्यशाली श्री हनुमान लक्ष्मण के प्राणदाता, संपूर्ण देवताओं एवं असुरों के गर्वहारी और भक्तों का उद्धार करने वाले हैं। वे सदा रामकार्य में तत्पर रहने वाले, ‘रामदूत’ नाम से विख्यात, दैत्यों के संहारक और भक्तवत्सल हैं। हनुमानजी का श्रेष्ठ चरित्र धन, कीर्ति एवं आयु की वृद्धि करने वाला तथा संपूर्ण अभीष्ट फलों का दाता है।

कपाली: रुद्र का प्रचंड रूप

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