भगवान शिव के अनंत और रहस्यमय स्वरूपों में ‘कपाली’ रूप अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। कपाल धारण करने वाले इस रुद्र स्वरूप का संबंध एक ओर ब्रह्मा के पंचम मस्तक के छेदन और दक्ष-यज्ञ के विध्वंस जैसे प्रचंड प्रसंगों से जुड़ता है, तो दूसरी ओर यही महादेव भक्त की परीक्षा लेने के लिए किरात अर्थात वनवासी शिकारी का रूप धारण कर अर्जुन के सामने प्रकट होते हैं। दक्ष-यज्ञ में उनका रौद्र रूप जहां अधर्म और अहंकार के विनाश का प्रतीक बनता है, वहीं अर्जुन के सामने उनका किरात रूप यह संदेश देता है कि तप, पराक्रम और भक्ति की वास्तविक परीक्षा संकट और संघर्ष में ही होती है। अंततः अर्जुन की तपस्या और वीरता से प्रसन्न होकर भगवान शिव उन्हें दिव्य पाशुपतास्त्र प्रदान करते हैं।
कपाली नाम का शास्त्रीय संकेत
भगवान शिव के कपाली नाम का संबंध कपाल धारण करने वाले उनके उग्र स्वरूप से माना जाता है। शिव के अनेक नामों में कपाली भी एक महत्वपूर्ण नाम है। यह नाम शिव के उस स्वरूप की ओर संकेत करता है, जिसमें वे अहंकार, देहाभिमान और सृष्टि के सीमित बंधनों से परे स्थित रुद्र के रूप में दिखाई देते हैं।
दक्ष-यज्ञ और अहंकार का प्रसंग
दक्ष-यज्ञ की कथा केवल एक यज्ञ के विध्वंस की कथा नहीं है, बल्कि इसमें अहंकार और शिव-तत्त्व के अपमान के परिणाम का भी संकेत मिलता है। दक्ष प्रजापति द्वारा शिव का अनादर और सती का आत्मदाह इस प्रसंग के प्रमुख बिंदु हैं। सती के देह-त्याग के बाद शिव का रौद्र रूप प्रकट होता है और वीरभद्र के माध्यम से दक्ष-यज्ञ का विध्वंस होता है।
अर्जुन की तपस्या का उद्देश्य
महाभारत के वनपर्व में अर्जुन की तपस्या और भगवान शिव से पाशुपतास्त्र प्राप्त करने का प्रसंग मिलता है। पांडवों के वनवास के समय भविष्य के महायुद्ध को ध्यान में रखते हुए अर्जुन को दिव्यास्त्र प्राप्त करने की आवश्यकता बताई गई थी। महर्षि व्यास के निर्देश पर अर्जुन ने भगवान शिव की आराधना की।
मूकासुर और वराह का प्रसंग
अर्जुन की तपस्या के दौरान मूक नामक दैत्य वराह का रूप धारण करके उनके पास आया। उसी समय भगवान शिव किरात-वेष में वहाँ प्रकट हुए। अर्जुन और शिव दोनों ने एक साथ वराह पर बाण चलाया। इसी घटना के बाद शिकार के अधिकार को लेकर विवाद हुआ और यही विवाद आगे चलकर अर्जुन तथा किरात-वेषधारी भगवान शिव के युद्ध का कारण बना।
किरातार्जुनीयम् में इसी प्रसंग का विस्तार
महाकवि भारवि ने महाभारत के वनपर्व में वर्णित इसी कथा को आधार बनाकर संस्कृत का प्रसिद्ध महाकाव्य किरातार्जुनीयम् रचा। इसमें अर्जुन की तपस्या, किरात-वेषधारी शिव से उनका युद्ध और अंत में भगवान शिव द्वारा पाशुपतास्त्र प्रदान करने का प्रसंग विस्तार से काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पाशुपतास्त्र का महत्व
पाशुपतास्त्र भगवान शिव से संबंधित अत्यंत विशिष्ट दिव्यास्त्र माना गया है। अर्जुन को यह अस्त्र केवल उनके पराक्रम के कारण नहीं, बल्कि तपस्या, धैर्य, समर्पण और परीक्षा में सफल होने के बाद प्राप्त हुआ। इस प्रसंग में भगवान शिव ने अर्जुन के भीतर के योद्धा और भक्त—दोनों की परीक्षा ली।
कपाली रुद्र कौन हैं?
दक्षाध्वरध्वंसकरः कोपयुक्तमुखाम्बुजः।
शूलपाणिः सुखायास्तु कपाली मे ह्यहर्निशम्॥
(शैवागम)
‘दक्ष-यज्ञ का विध्वंस करने वाले तथा क्रोधित मुख-कमल वाले शूलपाणि कपाली हमें रात-दिन सुख प्रदान करें।’
शैवागम के अनुसार दसवें रुद्र का नाम कपाली है। पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड-17) के अनुसार एक बार भगवान कपाली ब्रह्मा के यज्ञ में कपाल धारण करके गए, जिसके कारण उन्हें यज्ञ के प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया गया। उसके बाद भगवान कपाली रुद्र ने अपने अनंत प्रभाव का दर्शन कराया। फिर सब लोगों ने उनसे क्षमा माँगी और यज्ञ में उन्हें ब्रह्मा के उत्तर में बहुमान का स्थान प्रदान किया। ऐसी कथा है कि इन्होंने एक बार ब्रह्मा को दंड देने के लिए उनका पाँचवाँ मस्तक काट लिया था। कपाल धारण करने के कारण ही दसवें रुद्र को कपाली कहा जाता है। इसी रूप में भगवान रुद्र ने क्रोधित होकर दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया था।
एक बार प्रयागराज में मुनियों का एक महान् समागम हुआ। उसमें ब्रह्मा के साथ सभी देवता सम्मिलित हुए। भगवान कपाली रुद्र भी वहाँ उपस्थित थे। पीछे से प्रजापतियों के पति दक्ष प्रजापति भी उस सभा में आए। उन्हें देखकर सभी लोगों ने उठकर उनका सम्मान किया। केवल आत्माराम रुद्र अपने आसन पर ही बैठे रहे। दामाद को अभिवादन न करते देखकर दक्ष क्रोधित हो गए और रुद्र को अनेक दुर्वचन कहने के साथ उन्हें यज्ञ में भाग न मिलने का शाप दिया तथा सभा से उठकर चले गए। बाद में रुद्र को अपमानित करने के उद्देश्य से उन्होंने कनखल में एक विराट् यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में उन्होंने सभी देवताओं को आमंत्रित किया, केवल भगवान रुद्र को नहीं बुलाया। रुद्र-पत्नी सती ने जब यज्ञ का वृत्तांत सुना तो बिना बुलाए ही पिता के यज्ञ में जाने के लिए भगवान रुद्र से अनुमति माँगी। भगवान रुद्र के समझाने पर भी उन्होंने यज्ञ में वहाँ जाने का हठ नहीं छोड़ा। फिर भगवान रुद्र ने उन्हें राजोचित ठाट-बाट से अपने मुख्य गणों के साथ दक्ष-यज्ञ में भेज दिया। यज्ञ में रुद्र का भाग न देखकर सती ने दक्ष के साथ वहाँ उपस्थित सभी लोगों की जमकर कड़ी भर्त्सना की और दक्ष के द्वारा उत्पन्न अपने शरीर को योगाग्नि में भस्म कर दिया।
इधर जब भगवान कपाली रुद्र को यह दुःखपूर्ण संवाद मिला तो उन्होंने क्रोधित होकर अपनी एक जटा उखाड़कर पत्थर पर पटक दी, जिससे उसके दो टुकड़े हो गए। एक टुकड़े से प्रलयाग्नि के समान वीरभद्र प्रकट हुए और दूसरे से महाकाली प्रकट हुईं। इन दोनों ने भगवान कपाली रुद्र की आज्ञा से दक्ष-यज्ञ का विध्वंस कर दिया। इनके सामने देवता, मुनि कोई भी नहीं ठहर सके। कुछ धराशायी हो गए और कुछ के अंग-भंग हो गए। वीरभद्र ने दक्ष के सिर को काटकर महाकाली को सौंप दिया। महाकाली उससे गेंद के समान खेलने लगीं और बाद में उसे यज्ञ-कुंड में डाल दिया। दक्ष सहित दक्ष-यज्ञ को नष्ट करके वे दोनों भगवान कपाली रुद्र के पास लौट आए। उसके बाद सभी देवगण ब्रह्मा और विष्णु के साथ भगवान कपाली रुद्र के पास गए। सब लोगों ने हाथ जोड़कर कपाली रुद्र की स्तुति की तथा दक्ष के अपराध को क्षमा करके उसे जीवन-दान देने और यज्ञ को पूर्ण कराने की प्रार्थना की। भगवान कपाली ने प्रसन्न होकर दक्ष के सिर की जगह बकरे का सिर जोड़कर उसके यज्ञ को पूर्ण करा दिया। कपाली रुद्र के आधिभौतिक स्वरूप को पावक कहा जाता है।
शिवजी का किरात-वेष में प्रकट होना
इंद्र के उपदेश तथा व्यास जी की आज्ञा से अर्जुन भगवान महेश्वर की आराधना करने लगे। उनकी उपासना से ऐसा उत्कृष्ट तेज प्रकट हुआ, जिससे देवगण विस्मित हो गए। वे शिवजी के पास गए और बोले—‘प्रभो! एक मनुष्य आपकी तपस्या में निरत है। वह जो कुछ चाहता है, उसे आप प्रदान करें।’ ऐसा कहकर देवता विनम्र भाव से भगवान शिव के चरणों में दृष्टि लगाकर खड़े हो गए। उदारबुद्धि भगवान शिव देवताओं के उस वचन को सुनकर ठठाकर हँस पड़े, क्योंकि इसके पीछे छिपी हुई देवताओं की स्वार्थ-बुद्धि से वे परिचित थे। उन्होंने देवताओं से कहा कि ‘तुम लोग अपने-अपने स्थान को लौट जाओ। मैं तुम लोगों का कार्य अवश्य पूर्ण करूँगा।’
एक दिन मूक नामक दैत्य शूकर का रूप धारण कर अर्जुन की तपस्थली के सन्निकट आया। उसे दुराचारी दुर्योधन ने अर्जुन को मार डालने के उद्देश्य से भेजा था। वह वेगपूर्वक पर्वत-शिखरों को उखाड़ता, वन के वृक्षों को छिन्न-भिन्न करता तथा भयंकर शब्द करता हुआ आया। अर्जुन ने उसे देखकर विचार किया कि यह क्रूर-कर्मा निश्चय ही मेरा अनिष्ट करने के लिए आया है, क्योंकि जिसका दर्शन करते ही मन प्रसन्न हो जाए, वह अपना हितैषी होता है और जिसे देखकर मन में व्याकुलता उत्पन्न हो, वह निश्चय ही अपना शत्रु है। ऐसा सोचकर अर्जुन अपना धनुष-बाण लेकर खड़े हो गए। उसी समय भगवान शंकर भी अर्जुन की रक्षा और उनकी भक्ति की परीक्षा तथा उस दैत्य का विनाश करने के उद्देश्य से वहाँ शीघ्र प्रकट हो गए। वे उस समय किरात-वेष में धनुष-बाण धारण किए हुए थे। उनके गण भी उसी वेष में थे।
अचानक शूकर बड़े ही वेग से अर्जुन की ओर आया। उधर भगवान शंकर भी अर्जुन की रक्षा के लिए आगे बढ़े। एक ही साथ किरात-वेषधारी भगवान शिव और अर्जुन दोनों ने शूकर को लक्ष्य करके अपना बाण चलाया। शिवजी के बाण का लक्ष्य शूकर का पुच्छ भाग था और अर्जुन ने उसके मुख को अपना निशाना बनाया था। शिवजी का बाण उसके पुच्छ भाग में प्रवेश करके मुख के रास्ते निकल गया और भूमि में विलीन हो गया। अर्जुन का बाण शूकर के पिछले भाग से निकलकर उसके बगल में गिर गया। वह शूकर-रूपधारी दैत्य उसी क्षण मरकर भूमि पर गिर पड़ा।
शिवजी ने अपना बाण लाने के लिए तुरंत अपने अनुचर को भेजा। उसी समय अर्जुन भी अपना बाण लेने के लिए वहाँ आए। एक ही समय रुद्र-अनुचर और अर्जुन दोनों बाण उठाने के लिए पहुँचे। अर्जुन ने भगवान शिव के अनुचर को डरा-धमकाकर वह बाण उठा लिया। भगवान शिव के अनुचर ने कहा—‘यह हमारा सायक है। आप इसे छोड़ दीजिए।’ अर्जुन बोले—‘वनचर! तू बड़ा मूर्ख है। इस बाण को मैंने अभी छोड़ा है। इस पर मेरा नाम अंकित है।’ शिव-अनुचर ने उस बाण को अपने स्वामी का बताया। इस प्रकार दोनों में बड़ा विवाद हुआ और रुद्र-अनुचर ने सारी बातें किरात-वेषधारी भगवान शिव को बताईं।
फिर महादेव जी का अर्जुन के साथ घोर युद्ध हुआ। भगवान शिव ने अर्जुन की परीक्षा के लिए यह लीला रची थी। उसी समय भगवान शिव ने अर्जुन को अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन कराया। फिर अर्जुन ने उनसे अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी। भगवान शिव ने उन पर प्रसन्न होकर उन्हें सभी प्राणियों के लिए दुर्जय अपना पाशुपत नामक अस्त्र तथा भक्ति का वर दिया।










