सनातन परंपरा में भगवान शिव के अनेक दिव्य स्वरूपों का वर्णन मिलता है, जिनमें शर्व रुद्र का स्वरूप अत्यंत प्रभावशाली और रहस्यमय माना गया है। त्रिपुर का संहार करने के कारण भगवान शिव को त्रिपुरान्तक और त्रिपुरारि भी कहा जाता है। शर्व रुद्र अधर्म, अहंकार और आसुरी शक्तियों के विनाश के साथ-साथ जीवों को बंधनों से मुक्त करने वाले पशुपति स्वरूप का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान शिव के इसी दिव्य स्वरूप से जुड़ी त्रिपुर संहार की कथा जितनी अद्भुत है, उतनी ही प्रेरणादायक उनकी सुरेश्वरावतार में बालक उपमन्यु की परीक्षा की कथा है। आइए जानते हैं शर्व रुद्र की महिमा, त्रिपुर संहार और उपमन्यु पर महादेव की विशेष कृपा की पूरी कथा।
शर्व रुद्र कौन हैं?
शिव के रुद्र स्वरूप | त्रिपुर संहार | उपमन्यु की शिवभक्ति
तिसृणां पुरां हन्ता कृतांतमदभंजनः।
खड्गपाणिस्तीक्ष्णदंष्ट्रः शर्वाख्योऽस्तु मुदे मम॥
— शैवागम
भावार्थ: त्रिपुर का संहार करने वाले, कृतांत अर्थात् यमराज के मद का भंजन करने वाले, हाथ में खड्ग धारण करने वाले और तीक्ष्ण दाँतों वाले भगवान शर्व हमारे लिए आनंददायक हों।
सनातन धर्म में भगवान शिव के अनेक नाम और स्वरूपों का वर्णन मिलता है। उनके प्रत्येक नाम में कोई न कोई गहरा आध्यात्मिक रहस्य और तात्त्विक अर्थ निहित है। ‘शर्व’ भी भगवान रुद्र का एक विशिष्ट नाम और स्वरूप है। शर्व का संबंध भगवान शिव के उस तेजस्वी और संहारकारी रूप से है, जो अधर्म, अहंकार और आसुरी शक्तियों का नाश करता है।
त्रिपुरासुर के तीनों पुरों का संहार करने के कारण भगवान रुद्र को त्रिपुरहन्ता, त्रिपुरान्तक और त्रिपुरारि जैसे नामों से भी स्मरण किया जाता है। शिवपुराण के युद्धखण्ड में सर्वदेवमय रथ पर आरूढ़ होकर भगवान शिव के त्रिपुर-विनाश के प्रसंग का विस्तृत वर्णन मिलता है।
शर्व नाम का क्या अर्थ है?
‘शर्व’ शब्द का भाव व्यापक है। इसे भगवान शिव के सर्वव्यापक, सर्वात्मा और समस्त लोकों के अधिपति स्वरूप से जोड़ा जाता है। वे देवों के देव हैं और समस्त चराचर जगत् में व्याप्त परम तत्त्व के रूप में पूजित हैं।
भगवान शिव का संहारकारी रूप केवल विनाश का प्रतीक नहीं है। सनातन दर्शन में संहार का अर्थ उस व्यवस्था का अंत भी है, जो धर्म और सत्य के विपरीत हो चुकी है। इस दृष्टि से शर्व रुद्र का रौद्र रूप अधर्म के अंत और धर्म की पुनर्स्थापना का प्रतीक माना जा सकता है।
देवताओं ने भगवान शर्व रुद्र से त्रिपुर संहार की प्रार्थना की
त्रिपुरासुर के अत्याचारों से जब देवता परेशान हुए, तब सभी देवताओं सहित ब्रह्माजी ने भगवान रुद्र से त्रिपुर संहार की प्रार्थना की।
ब्रह्माजी ने भगवान रुद्र की स्तुति करते हुए कहा कि प्रभु देवताओं के सार्वभौम सम्राट् होने के कारण शर्व हैं। श्रीहरि विष्णु सहित सभी देवगण और संपूर्ण जगत् आपका परिवार हैं। अजन्मा देव श्रीहरि आपके युवराज हैं, मैं ब्रह्मा आपका पुरोहित हूँ और इंद्र आपकी आज्ञा का पालन करने वाले तथा राज्य का संचालन करने वाले मंत्री हैं। अन्य सभी देवता भी आपकी व्यवस्था के अधीन रहकर अपने-अपने कार्य में लगे हुए हैं।
इसलिए हे प्रभो! त्रिपुर का संहार करके देवताओं को भयमुक्त करने की कृपा कीजिए।
भगवान शर्व ने मांगी युद्ध के लिए दिव्य सामग्री
ब्रह्माजी की बात सुनकर सुरों के पालक भगवान शर्व रुद्र ने कहा कि यदि उन्हें देवताओं का सम्राट् बताया जा रहा है तो उस पद के अनुरूप युद्ध-सामग्री भी होनी चाहिए।
भगवान ने कहा कि उनके पास न तो कोई दिव्य रथ है, न उपयुक्त सारथि और न ही ऐसा धनुष है, जिससे वे प्रबल दैत्यों का वध कर सकें।
इसके बाद भगवान शर्व रुद्र मौन हो गए।
तब विश्वकर्मा ने भगवान शर्व रुद्र की इच्छा के अनुसार सर्वदेवमय दिव्य रथ का निर्माण किया। यह साधारण रथ नहीं था, बल्कि इसमें ब्रह्मांड की विभिन्न शक्तियों और तत्त्वों को प्रतीकात्मक रूप से प्रतिष्ठित किया गया था। शिवपुराण में इस दिव्य रथ का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है।
कैसा था भगवान शिव का सर्वदेवमय दिव्य रथ?
भगवान शर्व रुद्र के लिए बनाए गए इस अद्भुत रथ में—
- दाहिने चक्र में सूर्य विराजमान थे।
- बाएँ चक्र में चंद्रमा विराजमान थे।
- छहों ऋतुएँ चक्र की नेमि बनीं।
- अंतरिक्ष रथ का अग्रभाग बना।
- मंदराचल बैठक का स्थान बना।
- संवत्सर रथ के वेग का प्रतीक बना।
- पंचमहाभूत उसके बल बने।
- श्रद्धा उसकी गति बनी।
- वेदों के छहों अंग उसके आभूषण बने।
- सहस्र फणों वाले शेषनाग उसकी रस्सी बने।
- पुष्कर आदि तीर्थ उसकी पताकाएँ बने।
- समुद्र रथ का वस्त्र बना।
- गंगादि पवित्र नदियाँ श्रेष्ठ स्त्रियों के रूप में रथ में चंवर डुलाने लगीं।
- चारों वेद रथ के चार घोड़े बने।
- स्वयं ब्रह्माजी सारथि बने।
- हिमालय पर्वत भगवान शिव का धनुष बना।
- नागराज उसकी प्रत्यंचा बने।
- भगवान विष्णु बाण बने।
- अग्नि उस बाण की नोक बनी।
अर्थात् इस दिव्य रथ में ब्रह्मांड की संपूर्ण शक्तियों का समावेश दिखाई देता है। यह प्रसंग इस बात का प्रतीक है कि भगवान शिव के लिए संपूर्ण सृष्टि ही उनकी शक्ति का विस्तार है।
भगवान शर्व रुद्र बने पशुपति
जब परम ऐश्वर्यशाली भगवान शर्व रुद्र उस सर्वदेवमय रथ पर आरूढ़ हुए, तब देवताओं और असुरों सहित समस्त जीवों को पशुत्व से मुक्त करने वाले उनके स्वरूप का विशेष वर्णन मिलता है।
यहीं भगवान शिव के पशुपति नाम की महिमा भी सामने आती है।
शैव परंपरा में ‘पशु’ केवल पशु-प्राणी के अर्थ में नहीं है। जो जीव अज्ञान, मोह, कर्म और सांसारिक बंधनों में बंधा हुआ है, वह भी ‘पशु’ कहलाता है। जो उसे इन बंधनों से मुक्त कराए, वह पशुपति है।
इस प्रकार भगवान शिव का पशुपति स्वरूप जीव को बंधन से मुक्ति देने वाले परमेश्वर का प्रतीक है।
तीनों पुर एक सीध में आए
जब भगवान शर्व रुद्र सर्वदेवमय रथ पर सवार होकर युद्ध के लिए तैयार हुए, उसी समय त्रिपुर के तीनों पुर एकता को प्राप्त हो गए। देवताओं को यह देखकर अत्यंत हर्ष हुआ, क्योंकि यही वह अवसर था जिसका उन्हें लंबे समय से इंतजार था।
भगवान शिव त्रिपुर संहार के लिए आगे बढ़े। देवता, ऋषि और शिवगण उनके साथ थे। शिवपुराण के वर्णन में इस दिव्य यात्रा में असंख्य गणों और देवशक्तियों के साथ भगवान के प्रस्थान का उल्लेख मिलता है।
पाशुपतास्त्र से भगवान शर्व ने किया त्रिपुर का संहार
तब भगवान विष्णु ने महेश्वर से कहा कि तारक के पुत्रों तथा त्रिपुर निवासी दैत्यों के वध का समय आ गया है। तीनों पुरों के फिर अलग होने से पहले ही बाण छोड़कर उनका संहार कर देना चाहिए।
इसके बाद भगवान शर्व रुद्र ने अपने धनुष पर पाशुपतास्त्र नामक दिव्य बाण का संधान किया।
वह बाण करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान बताया गया है। भगवान ने उसे त्रिपुर की ओर छोड़ा। वह अत्यंत वेग से आगे बढ़ा और क्षणमात्र में त्रिपुर निवासी दैत्यों को भस्म कर दिया।
इसके बाद तीनों पुर भी भस्म हो गए।
चारों दिशाओं में त्रिपुरान्तक भगवान शर्व रुद्र की जय-जयकार होने लगी।
शिवपुराण की रुद्रसंहिता में त्रिपुरदाह के बाद देवताओं की स्तुति और भगवान शिव की विजय का भी वर्णन मिलता है।
त्रिपुर संहार का आध्यात्मिक संदेश
त्रिपुर की कथा केवल देवताओं और दैत्यों के युद्ध की कथा नहीं है। इसके भीतर गहरा आध्यात्मिक संदेश भी देखा जाता है।
मनुष्य के भीतर भी अनेक प्रकार के बंधन और विकार होते हैं। अहंकार, मोह, अज्ञान, आसक्ति और कामना मनुष्य को सत्य से दूर कर सकते हैं।
भगवान शिव का त्रिपुरान्तक स्वरूप इस बात का प्रतीक है कि जब शिव-तत्त्व का ज्ञान जागृत होता है, तब भीतर के अज्ञान और अहंकार का विनाश संभव होता है।
इसलिए शिव का रौद्र रूप भी अंततः कल्याणकारी है।
शर्व रुद्र का आधिभौतिक स्वरूप
परंपरा में आधिभौतिक रुद्र के रूप में शर्व रुद्र को पवमान कहा गया है और उनका निवास आकाश में बताया गया है। संहारकारी स्वरूप के कारण उनसे शांत रहने की प्रार्थना की जाती है।
इस प्रकार शर्व रुद्र के स्वरूप में एक ओर संहार की शक्ति है, तो दूसरी ओर संसार की रक्षा और कल्याण की भावना भी जुड़ी हुई है।
भगवान शिव का सुरेश्वरावतार: उपमन्यु की अद्भुत शिवभक्ति
भगवान शिव के रौद्र स्वरूप के साथ उनका करुणामय और भक्तवत्सल रूप भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसी का सुंदर उदाहरण सुरेश्वरावतार और बालक उपमन्यु की कथा है।
शिवपुराण की शतरुद्रसंहिता में सुरेश्वरावतार का वर्णन करते हुए उपमन्यु को व्याघ्रपाद मुनि का पुत्र तथा धौम्य का ज्येष्ठ भ्राता बताया गया है। उन्हें पूर्वजन्म की तपस्या से सिद्धि प्राप्त करने वाला मुनिकुमार भी कहा गया है।
दूध के लिए रोया बालक उपमन्यु
उपमन्यु अपनी माता के साथ बचपन से ही अपने मामा के घर रहते थे। परिवार आर्थिक रूप से बहुत गरीब था।
एक दिन बालक उपमन्यु ने अपनी माता से दूध पीने के लिए कहा। अपने इकलौते पुत्र की इच्छा पूरी करने में असमर्थ माता का हृदय दुःख से भर गया।
उन्होंने घर में उपलब्ध अनाज/चावल आदि को पीसकर पानी के साथ मिलाया और कृत्रिम दूध तैयार कर बालक को दे दिया।
उपमन्यु ने जब उसे पीया तो तुरंत समझ गए कि यह वास्तविक दूध नहीं है।
उन्होंने अपनी माता से कहा—
“माँ! यह दूध नहीं है।”
और वे रोने लगे।
माता ने कहा—भगवान शिव की कृपा से मिलता है दूध
माता ने बालक को समझाया कि हम वनवासी और निर्धन हैं। हमारे लिए दूध प्राप्त करना सहज नहीं है। उन्होंने उपमन्यु से कहा कि भगवान शिव की कृपा के बिना वास्तविक सुख और संपदा की प्राप्ति कठिन है।
माता की बात बालक के मन में बैठ गई।
उसने दूध के लिए रोना छोड़ दिया और भगवान शिव को पाने के लिए तपस्या करने का संकल्प ले लिया।
यहाँ से एक साधारण बालक की कथा एक महान शिवभक्त की कथा में बदल जाती है।
आठ ईंटों से बनाया मंदिर और मिट्टी का शिवलिंग
उपमन्यु भगवान शिव की आराधना के लिए वन में चले गए।
उन्होंने आठ ईंटों से एक छोटा मंदिर बनाया। उसके भीतर मिट्टी से शिवलिंग बनाया और माता पार्वती सहित भगवान शिव का आवाहन करके श्रद्धा और भक्तिभाव से पूजा आरंभ की।
पूजा के बाद वे पंचाक्षर मंत्र—‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करते थे।
बालक की साधना दिन-प्रतिदिन कठोर होती गई। वह पूरी निष्ठा से शिव का ध्यान और जप करता रहा।
उपमन्यु की तपस्या से त्रिभुवन हुआ संतप्त
उपमन्यु की कठोर तपस्या का प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि त्रिभुवन संतप्त होने लगा।
देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे बालक की भक्ति की परीक्षा लें और उस पर कृपा करें।
भगवान शिव ने उपमन्यु की भक्ति की परीक्षा लेने का निश्चय किया। शिवपुराण के अनुसार इस समय भगवान शिव ने देवराज इंद्र का रूप, माता पार्वती ने शची का रूप, नंदी ने ऐरावत का रूप और शिवगणों ने अन्य देवताओं का रूप धारण किया।
सुरेश्वर रूप में शिव ने ली उपमन्यु की परीक्षा
भगवान शिव सुरेश्वर अर्थात् इंद्र के रूप में उपमन्यु के सामने प्रकट हुए और उनसे वरदान माँगने के लिए कहा।
उपमन्यु ने उनसे कोई सांसारिक संपत्ति नहीं माँगी।
उन्होंने भगवान शिव की भक्ति माँगी।
यह सुनकर सुरेश्वर रूपधारी भगवान शिव ने उपमन्यु की परीक्षा और कठिन कर दी। उन्होंने स्वयं भगवान शिव की निंदा करनी शुरू कर दी।
उन्होंने उपमन्यु को शिव की भक्ति छोड़कर अपनी पूजा करने के लिए कहा।
लेकिन उपमन्यु अपने आराध्य के प्रति अडिग रहे।
उन्होंने भगवान शिव के अतिरिक्त किसी अन्य से वरदान लेने से इनकार कर दिया।
शिव-निंदा सुनकर उपमन्यु ने उठाया अघोरास्त्र
भगवान शिव की निंदा सुनकर बालक उपमन्यु अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने सुरेश्वर रूपधारी व्यक्ति को दंड देने के लिए अघोरास्त्र उठाया।
कथा के अनुसार नंदी ने उस अस्त्र को बीच में ही पकड़ लिया।
उपमन्यु का क्रोध शांत नहीं हुआ। अघोरास्त्र के निष्फल होने पर उन्होंने अपने शरीर को अग्नि में जलाने के लिए अग्नि की धारणा की।
तभी भगवान शिव ने उनकी अग्नि को शांत कर दिया।
वायवीयसंहिता की परंपरा में भी अघोरास्त्र को नंदी द्वारा रोकने और उपमन्यु की अग्नि-धारणा को भगवान शिव द्वारा शांत किए जाने का वर्णन मिलता है।
भगवान शिव ने अपना वास्तविक स्वरूप दिखाया
उपमन्यु की अटूट भक्ति से भगवान शिव प्रसन्न हो गए।
उन्होंने सुरेश्वर का रूप छोड़कर अपना वास्तविक दिव्य स्वरूप प्रकट किया। माता पार्वती और शिवगण भी उनके साथ प्रकट हुए।
आकाश में देवदुंदुभियाँ बजने लगीं, पुष्पवर्षा हुई और चारों दिशाएँ भगवान शिव की दिव्य उपस्थिति से आलोकित हो उठीं। वायवीयसंहिता में भगवान शिव द्वारा उपमन्यु को दिव्य समुद्रों और अनेक ऐश्वर्यों का दर्शन कराने का भी विस्तृत वर्णन मिलता है।
भगवान शिव ने उपमन्यु को बनाया अपना पुत्र
भगवान शिव ने उपमन्यु का मस्तक सूँघकर उसे वात्सल्य प्रदान किया और कहा—
“वत्स! आज से मैं तुम्हारा पिता हूँ और पार्वती तुम्हारी माता हैं।”
भगवान शिव ने उपमन्यु को सनातन कुमारत्व प्रदान किया।
उन्होंने उपमन्यु को दूध, दही और मधु के सहस्रों समुद्र प्रदान करने का वर दिया। इसके साथ ही भक्ष्य-भोज्य पदार्थों की विपुलता, अमरत्व और अपने गणों के आधिपत्य का वर भी प्रदान किया। शिवपुराण के उपलब्ध पाठ में पाशुपतव्रत, पाशुपत ज्ञान, योग तथा प्रवचन की शक्ति सहित अनेक दिव्य वरदानों का वर्णन मिलता है।
भगवान शिव ने उपमन्यु को पाशुपत ज्ञानयोग, प्रवचन की शक्ति तथा योग संबंधी ऐश्वर्य भी प्रदान किया और उन्हें अपने हृदय से लगा लिया।
इसके बाद उन्होंने माता पार्वती को उपमन्यु सौंपते हुए उन्हें अपना पुत्र स्वीकार किया।
वरदान पाकर माता के पास लौटे उपमन्यु
भगवान शिव से वर प्राप्त करने के बाद उपमन्यु अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने घर लौट आए।
उन्होंने अपनी माता को भगवान शिव के दर्शन, परीक्षा और प्राप्त हुए वरदानों की पूरी कथा सुनाई।
माता यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुईं।
जिस बालक ने कभी दूध के लिए रोते हुए भगवान शिव की शरण ली थी, वही बालक अब स्वयं महादेव की कृपा से दिव्य ज्ञान, ऐश्वर्य और शिवभक्ति से संपन्न हो चुका था।
शिवपुराण की कथा में आगे उपमन्यु के सभी के पूजनीय और अत्यंत सुखी होने का वर्णन मिलता है।
शर्व रुद्र और सुरेश्वरावतार—दोनों में छिपा है शिव का एक ही संदेश
भगवान शिव के शर्व रुद्र और सुरेश्वरावतार को साथ रखकर देखें तो उनके व्यक्तित्व का अद्भुत विस्तार सामने आता है।
शर्व रुद्र के रूप में वे त्रिपुर का संहार करते हैं। वे अधर्म, अहंकार और आसुरी शक्ति का अंत करते हैं।
सुरेश्वर रूप में वे एक छोटे बालक की परीक्षा लेते हैं और उसकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपना पुत्र स्वीकार कर लेते हैं।
एक ओर वे त्रिपुरान्तक हैं, दूसरी ओर आशुतोष।
एक ओर वे रुद्र हैं, दूसरी ओर भक्त के लिए करुणामूर्ति।
एक ओर वे संहारकर्ता हैं, दूसरी ओर पशुपति—अर्थात् जीवों को बंधन से मुक्त करने वाले।
यही भगवान शिव की महिमा है।
उपमन्यु की कथा हमें क्या सिखाती है?
उपमन्यु की कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि भक्ति और संकल्प की प्रेरक कथा है।
अभाव भक्ति में बाधा नहीं है।
उपमन्यु के पास दूध तक नहीं था, लेकिन उनके भीतर भगवान शिव को पाने की प्रबल इच्छा थी।
सच्ची भक्ति परीक्षा में भी अडिग रहती है।
जब भगवान शिव ने स्वयं दूसरे रूप में आकर शिव की निंदा की, तब भी उपमन्यु अपनी श्रद्धा से विचलित नहीं हुए।
भक्ति सांसारिक इच्छा से ऊपर उठ सकती है।
उपमन्यु शिव की आराधना दूध के लिए करने लगे थे, लेकिन अंततः उनकी साधना शिवभक्ति और ज्ञान में परिवर्तित हो गई।
भगवान भक्त की भावना देखते हैं।
आठ ईंटों का मंदिर और मिट्टी का शिवलिंग बाहरी दृष्टि से साधारण थे, लेकिन उपमन्यु की श्रद्धा असाधारण थी।
शर्व रुद्र की उपासना का संदेश
शर्व रुद्र हमें यह स्मरण कराते हैं कि जीवन में अधर्म, अहंकार और अज्ञान चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, शिव-तत्त्व के सामने उसका अंत निश्चित है।
त्रिपुर का विनाश बाहरी दैत्यों के अंत के साथ-साथ भीतर के विकारों के नाश का भी प्रतीक माना जा सकता है।
और उपमन्यु की कथा बताती है कि जब भक्ति निष्कपट हो, साधना दृढ़ हो और आराध्य के प्रति विश्वास अटूट हो, तब भगवान स्वयं भक्त के जीवन में प्रकट होकर उसे अपनी कृपा से भर देते हैं।
शर्व रुद्र का रौद्र रूप अधर्म का नाश करता है और सुरेश्वर का करुणामय रूप भक्त को अपने हृदय से लगा लेता है।
इसीलिए भगवान शिव को देवाधिदेव महादेव, रुद्र, शर्व, त्रिपुरान्तक, पशुपति और आशुतोष जैसे असंख्य नामों से स्मरण किया जाता है।
शिव वंदना
हर-हर महादेव।
ॐ नमः शिवाय।










