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भगवान् हर का स्वरूप और भिक्षुवर्यावतार की कथा

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भगवान हर रुद्र स्वरूप और भिक्षुवर्यावतार की कथा
भगवान हर के दिव्य स्वरूप में सर्पभूषण, पिनाक और भक्तवत्सलता का अद्भुत संगम।

भगवान् शिव के स्वरूप जितने रहस्यमय हैं, उनके नामों में छिपे आध्यात्मिक अर्थ उतने ही गहरे हैं। हर—भगवान् रुद्र का आठवाँ स्वरूप—सिर्फ संहार का प्रतीक नहीं, बल्कि भक्तों के सभी प्रकार के संताप को हर लेने वाली परम शक्ति का स्वरूप है। गले में सर्पों की माला, हाथ में पिनाक और चरणों में नतमस्तक देवगण भगवान् हर के उस विराट स्वरूप का दर्शन कराते हैं, जिसमें सृष्टि, स्थिति और संहार का गूढ़ रहस्य समाहित है।

शैवागम में भगवान् हर के स्वरूप की महिमा का वर्णन करते हुए बताया गया है कि वे काल को भी अपने आभूषण के रूप में धारण करने के बाद कालातीत हैं। उनके लिए सर्प केवल आभूषण नहीं, बल्कि संहार-शक्ति और संसार के अनित्य स्वरूप का प्रतीक भी है।

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इसी भगवान् हर ने देवताओं को तारकासुर के पुत्रों के अत्याचार से मुक्ति दिलाई और भक्तों के प्रति अपनी अद्भुत करुणा का परिचय दिया। आगे भगवान् शिव के भिक्षुवर्यावतार की कथा सामने आती है, जिसमें एक अनाथ राजकुमार के जीवन में स्वयं महादेव संरक्षण और मार्गदर्शन बनकर प्रकट होते हैं।

आइए, जानते हैं भगवान् हर के इस अद्भुत स्वरूप, त्रिपुरासुर की कथा और भिक्षुवर्यावतार से जुड़ी वह पौराणिक कथा, जिसमें शिवभक्ति, कर्मफल, करुणा और भगवान् की भक्तवत्सलता का अद्भुत संदेश छिपा है।

आशीर्विषाहारकृते देवौघप्रणताञ्जये।
पिनाकाङ्कितहस्ताय हरायास्तु नमस्कृतिः॥

(शैवागम)

अर्थ: जो भुजंग-भूषण धारण करते हैं, जिनके चरणों में देवता विनत होते हैं तथा जिनके हाथ में पिनाक धनुष सुशोभित है, उन भगवान् हर को मेरा नमस्कार है।

शैवागम के अनुसार भगवान् रुद्र के आठवें स्वरूप का नाम हर है। भगवान् हर को सर्पभूषण कहा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि मंगल और अमंगल, दोनों ही ईश्वर के स्वरूप में विद्यमान हैं। दूसरा अभिप्राय यह है कि संहारकर्ता रुद्र में संहार की सामग्री भी होनी चाहिए। समय पर सृष्टि का सृजन और समय पर उसका संहार—दोनों भगवान् रुद्र के ही कार्य हैं।

सर्प से बढ़कर संहारकारी तमोगुणी जीव कोई नहीं हो सकता, क्योंकि अपनी ही संतान को खा जाने की वृत्ति सर्प जाति में भी देखी जाती है। इसलिए भगवान् हर अपने गले में सर्पों की माला धारण करते हैं। काल को अपने आभूषण के रूप में धारण करने के बाद भी भगवान् हर कालातीत हैं।

भगवान् हर अपनी शरण में आने वाले भक्तों को आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—तीनों प्रकार के तापों से मुक्त कर देते हैं। इसीलिए भगवान् रुद्र का हर नाम और भी सार्थक है। उनका पिनाक अपने भक्तों को अभय प्रदान करने के लिए सदैव तत्पर रहता है।

त्रिपुरासुर के विनाश की कथा

जब भगवान् शंकर के पुत्र स्कन्द ने तारकासुर का वध कर दिया, तब उसके तीनों पुत्रों को महान् संताप हुआ। उन्होंने मेरु पर्वत की एक कंदरा में जाकर हजारों वर्षों तक तपस्या की और ब्रह्माजी को प्रसन्न किया।

ब्रह्माजी ने तीनों के वर माँगने पर उनके लिए स्वर्ण, रजत और लौह के अजेय नगरों का निर्माण करने के लिए मय दानव को आदेश दिया। इस प्रकार मय ने अपने तपोबल से तारकाक्ष के लिए स्वर्णमय, कमलाक्ष के लिए रजतमय और विद्युन्माली के लिए लौहमय—तीन प्रकार के उत्तम दुर्ग तैयार कर दिए।

इन पुरों का भगवान् हर के अतिरिक्त कोई भेदन नहीं कर सकता था। ब्रह्मा के वरदान और शिवभक्ति के प्रभाव से वे तीनों असुर अजेय होकर देवताओं के लिए संतापकारी बन गए। इन्द्र आदि सभी देवता उनके अत्याचार से पीड़ित होकर भटकने लगे।

तारक के पुत्रों के अत्याचार से पीड़ित सभी देवता ब्रह्माजी को साथ लेकर दुःखी अवस्था में भगवान् हर के पास गए। अंजलि बाँधकर उन सभी देवताओं ने नाना प्रकार के दिव्य स्तोत्रों द्वारा त्रिशूलधारी भगवान् हर की स्तुति करते हुए कहा—

“महादेव! तारक के तीनों पुत्रों ने मिलकर इन्द्र सहित सभी देवताओं को परास्त कर दिया है। उन्होंने सम्पूर्ण सिद्ध स्थानों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है। वे यज्ञ के भाग स्वयं ग्रहण करते हैं। सबके लिए कष्टकारी ये असुर जब तक सृष्टि का विनाश नहीं कर डालते, उससे पहले आप उनका संहार करने का कोई उपाय करें।”

भगवान् हर ने कहा, “देवताओ! मैं तुम्हारे कष्टों से परिचित हूँ। फिर भी मैं तारक के पुत्रों का वध नहीं कर सकता। जब तक वे असुर मेरे भक्त हैं, मैं उन्हें कैसे मार सकता हूँ? तारक के पुत्रों के वध के लिए तुम लोगों को भगवान् विष्णु के पास जाना चाहिए। जब वे दैत्य विष्णुमाया के प्रभाव से धर्म-विमुख हो जाएंगे तथा मेरी भक्ति का त्याग कर देंगे, तब मैं शर्व रुद्र के रूप में उन असुरों का संहार करके तुम लोगों को उनके अत्याचार से मुक्त करूँगा।”

आठवें हर रुद्र की आधिभौतिक मूर्ति काठमांडू (नेपाल) में पशुपतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। इसे यजमान मूर्ति कहा जाता है।

भगवान् शिव का भिक्षुवर्यावतार

विदर्भ देश में सत्यरथ नाम के एक प्रसिद्ध राजा थे। वे धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते हुए सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे। एक दिन शाल्व देश के राजा ने उनकी राजधानी पर आक्रमण कर दिया। शत्रुओं के साथ युद्ध करते हुए राजा सत्यरथ की सेना नष्ट हो गई और दैवयोग से राजा भी शत्रुओं के हाथों मारे गए।

सत्यरथ की महारानी किसी प्रकार शत्रुओं से बचकर नगर से बाहर निकल गईं। उस समय वे गर्भवती थीं। शोकाकुल रानी भगवान् शंकर का चिंतन करती हुई पूर्व दिशा की ओर बढ़ती गईं। रातभर चलने के बाद प्रातःकाल वे एक सरोवर के तट पर पहुँचीं।

भाग्यवश रानी ने सरोवर के किनारे शुभ मुहूर्त में एक वृक्ष के नीचे दिव्य बालक को जन्म दिया। दैवयोग से उसी समय रानी को बहुत तेज प्यास लगी। जैसे ही वे पानी पीने के लिए सरोवर में उतरीं, एक ग्राह ने उन्हें अपना ग्रास बना लिया। इस प्रकार जन्म लेते ही वह बालक माता-पिता से विहीन हो गया।

इतने में भगवान् शंकर वहाँ प्रकट हुए और बालक की रक्षा करने लगे। उसी समय एक विधवा ब्राह्मणी अपने एक वर्ष के बालक को गोद में लिए वहाँ आ पहुँची। नवजात शिशु को अकेले पड़े देखकर उसके मन में आश्चर्य के साथ उसके प्रति करुणा उत्पन्न हुई। उसके मन में उस बालक को अपना पुत्र बनाने की इच्छा जाग उठी।

ठीक उसी समय ब्राह्मणी के वहाँ आने पर अदृश्य हुए भगवान् शंकर भिक्षुवेष में प्रकट हुए और ब्राह्मणी से कहा—

“ब्राह्मणी! यह बालक परम पवित्र है। तुम इसे अपना पुत्र समझकर इसका पालन-पोषण करो। यह शिवभक्त महाराज सत्यरथ का पुत्र है। इसके पिता को शाल्वदेशीय क्षत्रियों ने मार डाला है और इसे जन्म देने के बाद इसकी माता को सरोवर में रहने वाले ग्राह ने अपना आहार बना लिया। पूर्वजन्म में प्रदोषकाल में शिवजी की पूजा किए बिना ही भोजन करने के कारण इसे जन्म से ही माता-पिता से विहीन होना पड़ा है। यह बालक आगे चलकर बहुत बड़ा शिवभक्त होगा।”

इस प्रकार ब्राह्मणी को उपदेश देकर संन्यासी-शरीरधारी भगवान् शिव ने उसे अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन कराया। ब्राह्मणी ने बड़े प्रेम से गद्गद वाणी में उनकी स्तुति की। इसके बाद भक्तवत्सल भगवान् शिव अंतर्धान हो गए।

फिर ब्राह्मणी एकचक्रा नामक नगर में अपने बालक के साथ उस बालक का भी अपने पुत्र के समान पालन-पोषण करने लगी। यथासमय दोनों बालकों का उपनयन संस्कार सम्पन्न हुआ।

शाण्डिल्य मुनि के उपदेश से दोनों बालक व्रत रखकर प्रदोषकाल में शिव-उपासना किया करते थे। एक दिन ब्राह्मणी का पुत्र राजकुमार को साथ लिए बिना ही नदी में स्नान करने के लिए गया। वहाँ उसे रत्नों से भरा हुआ एक कलश मिल गया। इस प्रकार उनकी विपन्नता दूर हो गई।

एक वर्ष बाद एक दिन राजकुमार ब्राह्मण कुमार के साथ वन में गया। वहाँ अचानक अपनी सखियों के साथ एक गंधर्व कन्या आई। वह कन्या राजकुमार के रूप-सौंदर्य पर मोहित हो गई। गंधर्व कन्या से विवाह करके राजकुमार उसके पिता के राज्य का राजा बन गया।

राजकुमार ने उसका पालन-पोषण करने वाली विधवा ब्राह्मणी को राजमाता के पद पर प्रतिष्ठित किया। वही राजकुमार आगे चलकर धर्मगुप्त के नाम से प्रसिद्ध राजा हुआ।

यह देवेश्वर भगवान् शिव की आराधना का सच्चा फल था।

एकादश रुद्र में भगवान शिव का महात्म्य

भगवान शिव का सदाशिव स्वरूप

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