भगवान शिव को सनातन परंपरा में परम कल्याण, आनंद, ज्ञान और करुणा का स्वरूप माना गया है। ‘शिव’ शब्द स्वयं मंगल और कल्याण का बोध कराता है। शैवागम से लेकर शिवपुराण तक महादेव के ऐसे अनेक स्वरूपों और लीलाओं का वर्णन मिलता है, जो उनके दिव्य चरित्र और लोककल्याणकारी भाव को प्रकट करते हैं। पार्वती की कठोर तपस्या और उनकी अटूट शिव-भक्ति से लेकर अवधूतेश्वर रूप में इंद्र के अहंकार का भंजन करने तक भगवान शिव की कथाएं भक्तों को गहरा आध्यात्मिक संदेश देती हैं। एकादश रुद्रों की कथा न केवल महाभारत और पुराणादि में वर्णित है, अपितु उनका उल्लेख ऋग्वेदादि में भी मिलता है। एकादश रुद्रों की विभूति समस्त देवताओं में विद्यमान है। वैसे तो भगवान् रुद्रदेव का सम्यक् वर्णन सामान्य मस्तिष्क से परे है। फिर भी सर्वसाधारण को भी – शम्भु , पिनाकी, गिरीश, स्थाणु, भर्ग, सदाशिव, शिव, हर, शर्व, कपाली तथा भव एकादश रुद्रों में शामिल है। आइए, जानते हैं भगवान शिव के महात्म्य, शिवतत्त्व और उनके अवधूतेश्वर अवतार से जुड़ी यह अद्भुत कथा।
“गायत्रीप्रतिपाद्यायाप्योङ्कारकृतसद्मने।
कल्याणगुणधानेऽस्तु शिवाय विहितानतिः॥”
— शैवागम
अर्थ: गायत्री जिनका प्रतिपादन करती है, ओंकार जिनका निवास-स्थान है और जो समस्त कल्याणकारी गुणों के धाम हैं, उन भगवान शिव को मेरा प्रणाम है।
शैवागम में रुद्र के सातवें स्वरूप को शिव कहा गया है। ‘शिव’ शब्द नित्य, विज्ञान और आनंदस्वरूप परमात्मा का वाचक है। इसी कारण शैवागम भगवान शिव को गायत्री द्वारा प्रतिपादित तथा एकाक्षर ॐ (ओंकार) का वाच्यार्थ मानता है।
शिव शब्द का अर्थ क्या है?
‘शिव’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘वश कान्तौ’ धातु से मानी गई है। इसका भावार्थ है—जिसे सब चाहते हैं, वह शिव है। प्रत्येक जीव अखंड आनंद की इच्छा रखता है। इसलिए शिव शब्द का तात्पर्य अखंड आनंद से भी माना गया है।
जहाँ आनंद है, वहीं शांति है और परम आनंद को ही परम कल्याण कहा गया है। इसीलिए भगवान शिव को कल्याण-गुण-निलय अर्थात कल्याणकारी गुणों का धाम कहा जाता है।
शिवतत्त्व को यथार्थ रूप से भगवती पार्वती ही जानती हैं। शिवपुराण में वर्णित उमा-शिव संवाद भगवान शिव के स्वरूप और महिमा को समझने की दृष्टि से अत्यंत उपदेशप्रद और रोचक है।
भगवान शिव को पाने के लिए पार्वती ने की कठोर तपस्या
भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती जी ने घोर तपस्या आरंभ की। माता मेनका अपनी पुत्री की कठोर तपस्या देखकर स्नेह से व्याकुल हो उठीं और उन्होंने कहा—“उ वत्से! मा, ऐसा तप मत करो।”
इसी प्रसंग से पार्वती जी का एक नाम उमा प्रसिद्ध हुआ। पार्वती जी ने जब सूखे पत्ते खाना भी छोड़ दिया, तब उनका नाम अपर्णा पड़ा।
उनकी कठोर तपस्या और शिव के प्रति अटूट निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव स्वयं एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण करके उनके पास पहुंचे।
वृद्ध ब्राह्मण के रूप में शिव ने ली पार्वती की परीक्षा
वृद्ध ब्राह्मण ने पार्वती जी से कहा कि शिव से विवाह करने का उनका संकल्प उचित नहीं है। उन्होंने शिव के रूप, रहन-सहन और वैराग्य का वर्णन करते हुए कहा कि जटाधारी शिव शरीर पर चिताभस्म लगाते हैं, भूतों के स्वामी हैं, बैल की सवारी करते हैं और बाघ की खाल धारण करते हैं।
उन्होंने शिव के माता-पिता, कुल और जाति तक पर प्रश्न उठाए और कहा कि ऐसे अत्यंत विरक्त एवं मुण्डमालाधारी शिव के साथ रहकर पार्वती को कौन-सा सुख मिलेगा।
पार्वती जी भगवान शिव की निंदा अधिक देर तक नहीं सुन सकीं। उन्होंने क्रोधित होकर कहा कि शिव के विषय में वह वृद्ध ब्राह्मण कुछ नहीं जानते। इसी कारण वह मिथ्या बातें कर रहे हैं।
पार्वती ने बताया भगवान शिव का वास्तविक स्वरूप
पार्वती जी ने कहा कि भगवान शिव वास्तव में निर्गुण हैं और सृष्टि के कल्याण के लिए करुणावश सगुण रूप धारण करते हैं। जो सगुण और निर्गुण दोनों स्वरूपों से युक्त हैं, उनकी कोई जाति कैसे निर्धारित की जा सकती है?
जो समस्त सृष्टि के आदि हैं, उनके माता-पिता कौन हो सकते हैं और उनकी आयु का निर्धारण कौन कर सकता है?
पार्वती जी ने कहा कि सभी विद्याओं का उद्गम भगवान शिव से हुआ है और वेद उनके निःश्वास माने गए हैं। ऐसे भगवान को विद्याहीन कहना अज्ञानता है। सभी देवताओं का देवत्व भी भगवान शिव की कृपा का ही परिणाम है।
उन्होंने कहा कि जिन लोगों के मुख से भगवान शिव का मंगलमय नाम निरंतर उच्चरित होता है, उनके दर्शन मात्र से अमंगल का नाश हो जाता है। फिर स्वयं भगवान शिव के दर्शन की महिमा का क्या कहना!
भगवान शिव के श्रीअंगों से झड़ने वाली चिताभस्म को धारण करने के लिए देवता भी लालायित रहते हैं। पार्वती जी ने स्पष्ट कहा कि शिव की निंदा सुनना भी महापाप का कारण बनता है। इसलिए वह वहां एक क्षण भी नहीं रुकना चाहतीं।
पार्वती की भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट हुए भगवान शिव
पार्वती जी की भगवान शिव के प्रति दृढ़ निष्ठा देखकर महादेव अपने वृद्ध ब्राह्मण के वेश को त्यागकर उनके सामने प्रकट हो गए। इस प्रकार पार्वती जी की तपस्या सफल हुई और उनकी शिव को पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा पूर्ण हुई।
आधिभौतिक रूप से रुद्र के सातवें स्वरूप भगवान शिव की चन्द्रमूर्ति काठियावाड़ में सोमनाथ के नाम से प्रसिद्ध मानी जाती है।
भगवान शिव का अवधूतेश्वर अवतार: इंद्र का गर्व कैसे हुआ चूर?
भगवान शिव की लीलाओं में उनका अवधूतेश्वर स्वरूप भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। एक बार देवराज इंद्र देवताओं और देवगुरु बृहस्पति के साथ भगवान शिव के दर्शन के लिए कैलास पर्वत की ओर गए।
इंद्र और बृहस्पति के आने की जानकारी होने पर भगवान शिव ने उनकी परीक्षा लेने का विचार किया। वे एक अवधूत का रूप धारण करके मार्ग में खड़े हो गए।
उनके शरीर पर कोई वस्त्र नहीं था और उनका तेज अत्यंत प्रचंड था। इंद्र ने मार्ग में खड़े उस अद्भुत पुरुष को देखा और अपने पद एवं ऐश्वर्य के अहंकार में उससे पूछा कि वह कौन है और भगवान शिव इस समय कैलास पर हैं या कहीं अन्यत्र चले गए हैं।
इंद्र के अहंकार की भगवान शिव ने ली परीक्षा
इंद्र ने कई बार प्रश्न किया, लेकिन अवधूत रूप में भगवान शिव मौन रहे। इंद्र का अहंकार बढ़ गया और उन्होंने क्रोधित होकर कहा कि बार-बार पूछने पर भी उत्तर न देने वाले इस मूढ़ को वह अपने वज्र से मार देंगे।
इंद्र ने जैसे ही वज्र उठाया, भगवान शिव ने तत्काल उसके प्रभाव को स्तंभित कर दिया। इंद्र की भुजा अकड़ गई और वह वज्र का प्रहार नहीं कर सके।
उधर भगवान शिव का क्रोध भी प्रकट होने लगा। उनके तेज को देखकर देवगुरु बृहस्पति समझ गए कि ये कोई साधारण अवधूत नहीं, बल्कि स्वयं भगवान हर हैं।
बृहस्पति ने पहचाना भगवान शिव को
बृहस्पति ने हाथ जोड़कर भगवान शिव की स्तुति की और इंद्र को उनके चरणों में गिरा दिया। उन्होंने भगवान हर से प्रार्थना करते हुए कहा कि इंद्र आपके चरणों में पड़ा है। कृपया इसका और मेरा उद्धार करें। आपके ललाट से प्रकट हुई अग्नि इंद्र को जलाने के लिए उद्यत है।
देवगुरु की प्रार्थना सुनकर करुणासागर भगवान शिव ने कहा कि उनके नेत्र से निकली अग्नि को वे दोबारा धारण नहीं कर सकते। उन्होंने इसकी तुलना सर्प द्वारा छोड़ी हुई केंचुली से की, जिसे वह दोबारा धारण नहीं करता।
बृहस्पति ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि भक्त सदा आपकी कृपा के पात्र होते हैं। इसलिए अपने भक्तवत्सल नाम को सार्थक करते हुए इस प्रचंड तेज को कहीं और स्थापित कर दें।
भगवान शिव ने इंद्र को दिया जीवनदान
बृहस्पति की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान रुद्र ने उन्हें वरदान दिया और कहा कि इंद्र को जीवनदान दिलाने के कारण आज से उनका एक नाम जीव भी होगा।
भगवान शिव ने कहा कि उनके तृतीय नेत्र से प्रकट हुई इस अग्नि को देवता सहन नहीं कर सकते। इसलिए वे इसे बहुत दूर छोड़ देंगे, जिससे इंद्र को कोई पीड़ा न हो।
इसके बाद भगवान शिव ने अपने तेजस्वी स्वरूप से प्रकट हुई उस अग्नि को हाथ में लेकर क्षार समुद्र में फेंक दिया।
शिव के तेज से हुआ जलंधर का जन्म
क्षार समुद्र में गिरते ही भगवान शिव का वह प्रचंड तेज एक बालक के रूप में परिवर्तित हो गया। यही बालक आगे चलकर सिन्धु पुत्र जलंधर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
बाद में देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने ही असुरों के स्वामी जलंधर का वध किया।
इस प्रकार अवधूत रूप में अद्भुत लीला करके भगवान शंकर अंतर्धान हो गए। इंद्र और बृहस्पति भी भय से मुक्त होकर सुखी हुए। जिस उद्देश्य से इंद्र भगवान शिव के पास आए थे, वह भी करुणासागर महादेव की कृपा से पूर्ण हुआ।
भगवान शिव ने किया इंद्र के अहंकार का भंजन
अवधूतेश्वर रूप में भगवान शिव ने इंद्र के अहंकार का भंजन कर यह संदेश दिया कि देवताओं का पद और ऐश्वर्य भी परमेश्वर की कृपा से ही प्राप्त होता है। अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, भगवान शिव की महिमा के सामने उसका कोई अस्तित्व नहीं।
भगवान शिव की यह अवधूत लीला उनके भक्तवत्सल, करुणामय और लोककल्याणकारी स्वरूप को प्रकट करती है। इंद्र और बृहस्पति ने इस अद्भुत लीला का चिंतन करते हुए भगवान शिव को प्रणाम किया और देवताओं के साथ देवलोक लौट गए।
हर हर महादेव!










