Advertisement
Home Religious Dharm-Sanskriti पञ्चदेवोपासना और भगवान शिव की महिमा, जानिए एकादश रुद्र

पञ्चदेवोपासना और भगवान शिव की महिमा, जानिए एकादश रुद्र

0
80
एकादश रुद्र और भगवान शिव की महिमा
भगवान शिव के एकादश रुद्र स्वरूप

सनातन धर्म में पञ्चदेवोपासना की परंपरा अनादि काल से चली आ रही है। भगवान शिव इस उपासना परंपरा में विशेष स्थान रखते हैं। शिव के रुद्र स्वरूप और एकादश रुद्रों का वर्णन वेद, पुराण और महाभारत सहित अनेक शास्त्रीय ग्रंथों में मिलता है।

भगवान शिव तीनों गुणों से परे क्यों हैं?

सनातन धर्म में पञ्चदेवोपासना की परंपरा अनादि काल से चली आ रही है। वैष्णव, शैव, शाक्त, सौर और गाणपत्य जैसे अनेक संप्रदाय सनातन परंपरा में देखने को मिलते हैं। इनमें भगवान शिव की उपासना का विशेष महत्व माना गया है। पञ्चदेवों में भगवान शिव, माता शक्ति और भगवान गणेश का संबंध भगवान शिव के परिवार से है। यही कारण है कि शिव उपासना को व्यापक और सर्वसमावेशी माना गया है।

Advertisment
एकादश रुद्र और भगवान शिव की महिमा
भगवान शिव के एकादश रुद्र स्वरूप

पुराणों में भगवान शिव को देवाधिदेव महादेव, भूतभावन और आशुतोष कहा गया है। भगवान शिव की भक्ति केवल देवताओं और मनुष्यों तक सीमित नहीं मानी गई, बल्कि पुराणों में असुरों तथा भूत-प्रेतादि गणों को भी शिव परिवार से संबंधित बताया गया है। भगवान शिव कल्याण के देवता हैं और इसी कारण उनका एक नाम शंकर भी है।

भगवान शिव तीनों गुणों से परे हैं

शास्त्रों में भगवान विष्णु, भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा के कार्यों को क्रमशः पालन, संहार और सृष्टि की व्यवस्था से जोड़ा गया है। एक प्रसिद्ध श्लोक में इनके स्वरूप का वर्णन इस प्रकार मिलता है—

अन्तस्तमो बहिःसत्त्वस्त्रिजगत्पालको हरिः।
अन्तःसत्त्वस्तमोबाह्यस्त्रिजगल्लयकृद्धरः॥
अन्तर्बहीरजश्चैव त्रिजगत्सृष्टिकृद्विधिः।
एवं गुणास्त्रिदेवेषु गुणभिन्नः शिवः स्मृतः॥

अर्थात भगवान विष्णु तीनों लोकों का पालन करते हैं। उनका बाहरी स्वरूप सात्त्विक और भीतर से तामसिक बताया गया है। भगवान शिव तीनों लोकों का संहार करने वाले हैं। उनका बाहरी स्वरूप तमोगुण से संबंधित दिखाई देता है, जबकि भीतर से वे सतोगुणी हैं। भगवान ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं, इसलिए उनका संबंध रजोगुण से माना गया है। वहीं भगवान परब्रह्म शिव तीनों गुणों से परे माने गए हैं।

इसका आध्यात्मिक रहस्य यह बताया गया है कि सुख का संबंध सतोगुण, दुःख का संबंध तमोगुण और क्रिया का संबंध रजोगुण से है।

भगवान विष्णु संसार का पालन करते हैं। संसार देखने में सुखमय दिखाई देता है, लेकिन सांसारिक जीवन में दुःख और बंधन भी विद्यमान हैं। इसी कारण विष्णु के कार्य को बाहरी रूप से सात्त्विक होते हुए भी तत्त्वतः अलग दृष्टि से समझाया गया है। भगवान विष्णु का श्यामवर्ण स्वरूप भी इसी दार्शनिक व्याख्या से जोड़ा जाता है।

दूसरी ओर, भगवान शिव संसार का संहार करते हैं। बाहरी दृष्टि से संहार दुःख का प्रतीक दिखाई देता है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से संहार जीव को संसार के बंधनों से मुक्त कर परमात्मा में एकत्व की ओर ले जाने वाला माना गया है। इसी कारण भगवान शिव का स्वरूप कल्याणकारी और सतोगुण से संबंधित माना जाता है। उनका शीघ्र प्रसन्न होना ही उन्हें आशुतोष नाम प्रदान करता है।

भगवान ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं। क्रिया और सृजन के प्रतीक के रूप में उनका संबंध रजोगुण और रक्तवर्ण से जोड़ा गया है।

शिव उपासना में ब्रह्मा और विष्णु की उपासना भी निहित

सनातन परंपरा में त्रिदेवों को एक-दूसरे से अलग करके देखने के बजाय उनके कार्यों में एकत्व का भाव बताया गया है। सृष्टि की रचना, पालन और संहार एक ही परम सत्ता की विभिन्न लीलाएं मानी गई हैं।

शिव पुराण में भगवान शिव के परात्पर निर्गुण स्वरूप को सदाशिव, सगुण स्वरूप को महेश्वर, सृष्टि की रचना करने वाले स्वरूप को ब्रह्मा, पालन करने वाले स्वरूप को विष्णु और संहार करने वाले स्वरूप को रुद्र कहा गया है।

इस दृष्टि से भगवान शिव की उपासना में ब्रह्मा और विष्णु की उपासना का भाव भी स्वतः समाहित हो जाता है। त्रिदेवों के बीच जो भेद दिखाई देता है, उसे शास्त्रों में कार्यभेद और लीला के रूप में समझाया गया है।

रुद्र का अर्थ क्या है?

भगवान शिव के संहारक स्वरूप को रुद्र कहा जाता है। रुद्र शब्द का एक अर्थ दुःखों का नाश करने वाला भी माना गया है—

रुजं दुःखं द्रावयतीति रुद्रः।

अर्थात जो दुःख को दूर कर दे, वह रुद्र है।

इसलिए रुद्र केवल संहार के देवता नहीं हैं, बल्कि जीव को दुःख, बंधन और अज्ञान से मुक्त कराने वाली शक्ति के प्रतीक भी हैं।

समुद्र मंथन और भगवान शिव का नीलकंठ स्वरूप

भगवान शिव के करुणामय स्वरूप को समझने के लिए समुद्र मंथन और हलाहल विष की कथा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया। लंबे प्रयास के बाद अमृत निकलने से पहले भयंकर हलाहल विष प्रकट हुआ। उसका प्रभाव इतना प्रचंड था कि उसने देवताओं, असुरों और समस्त सृष्टि को संकट में डाल दिया।

विष के प्रभाव से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा और पालनकर्ता भगवान विष्णु भी चिंतित हुए। जब इस संकट का कोई उपाय नहीं मिला तो सभी भगवान शिव की शरण में पहुंचे।

भगवान शिव ने समस्त जीव-जगत के कल्याण के लिए उस भयंकर विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष को कंठ में धारण करते ही संसार विनाश से बच गया। विष के प्रभाव से भगवान शिव का कंठ नीला हो गया और तभी उन्हें नीलकंठ कहा गया।

यह कथा भगवान शिव के त्याग, करुणा और लोककल्याणकारी स्वरूप का प्रतीक मानी जाती है।

भगवान शिव के परिवार में अद्भुत समन्वय

भगवान शिव का परिवार सनातन परंपरा में समन्वय और संतुलन का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।

भगवान गणेश का वाहन मूषक है, जबकि भगवान शिव के आभूषणों में सर्प प्रमुख रूप से दिखाई देता है। भगवान शिव के सेनापति कार्तिकेय का वाहन मयूर है। सर्प और मयूर को स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे का विरोधी माना जाता है, फिर भी शिव परिवार में दोनों का सहज सह-अस्तित्व दिखाई देता है।

इसी प्रकार माता पार्वती का वाहन सिंह और भगवान शिव का वाहन नंदी हैं। दोनों में भी स्वाभाविक वैर माना जाता है। भगवान शिव के कंठ में विष है, जबकि उनके मस्तक पर चंद्रमा की शीतलता और जटाओं में गंगा की पवित्र धारा विराजमान है।

भगवान शिव के तीसरे नेत्र को प्रलयकारी अग्नि का प्रतीक माना जाता है, जबकि उनके मस्तक पर चंद्रमा और गंगा शीतलता के प्रतीक हैं। इस प्रकार शिव परिवार और भगवान शिव का स्वरूप परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली शक्तियों के बीच संतुलन और समन्वय का संदेश देता है।

यही भगवान शिव के समन्वयकारी स्वरूप की विशेषता है।

एकादश रुद्र कौन हैं?

भगवान सदाशिव के रुद्र स्वरूप की महिमा अत्यंत व्यापक है। शास्त्रों में एकादश रुद्रों का उल्लेख मिलता है। महाभारत और विभिन्न पुराणों के साथ ऋग्वेदादि वैदिक ग्रंथों में भी रुद्रों का वर्णन मिलता है।

एकादश रुद्रों की विभूतियों को देवताओं में भी विद्यमान माना गया है। भगवान रुद्र का पूर्ण वर्णन सामान्य मानवीय बुद्धि से परे माना गया है, फिर भी सनातन परंपरा में एकादश रुद्रों के नाम और उनके स्वरूप का विशेष महत्व है।

एकादश रुद्रों के नाम इस प्रकार बताए गए हैं—

शम्भु, पिनाकी, गिरीश, स्थाणु, भर्ग, सदाशिव, शिव, हर, शर्व, कपाली और भव।

इन सभी नामों में भगवान शिव के अलग-अलग गुण, शक्तियां और स्वरूप प्रकट होते हैं।

भगवान शिव क्यों कहलाते हैं आशुतोष?

भगवान शिव को आशुतोष कहा जाता है। आशुतोष का अर्थ है—जो शीघ्र प्रसन्न हो जाएं।

सनातन परंपरा में भगवान शिव को सरल पूजा से प्रसन्न होने वाला देवता माना गया है। उनके लिए भक्ति और श्रद्धा को बाहरी वैभव से अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है। यही कारण है कि शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करने की परंपरा अत्यंत लोकप्रिय है।

भगवान शिव का स्वरूप यह संदेश देता है कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए दिखावे से अधिक आवश्यक है सच्ची श्रद्धा, समर्पण और भक्ति।

भगवान शिव का संदेश है समन्वय और कल्याण

भगवान शिव का व्यक्तित्व विरोधाभासों में समन्वय स्थापित करने वाला माना जाता है। वे एक ओर संहार के देवता हैं तो दूसरी ओर कल्याणकारी शंकर हैं। वे वैरागी भी हैं और गृहस्थ भी। उनके मस्तक पर चंद्रमा की शीतलता है तो तीसरे नेत्र में प्रलय की अग्नि। उनके कंठ में हलाहल विष है तो जटाओं में जीवनदायिनी गंगा।

इसीलिए भगवान शिव का स्वरूप केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन, त्याग, करुणा, समन्वय और आत्मकल्याण का संदेश भी देता है।

भगवान शिव के इसी व्यापक स्वरूप को जनसाधारण तक पहुंचाने के उद्देश्य से गीता प्रेस द्वारा श्रीरामसागर पाण्डेय के प्रस्तुतिकरण में एकादश रुद्रों के परिचय पर आधारित सचित्र पुस्तक का प्रकाशन किया गया है। शिव भक्तों और सनातन धर्म के अध्येताओं के लिए ऐसी सामग्री भगवान रुद्र के विविध स्वरूपों को समझने में उपयोगी हो सकती है।

अंत में भगवान शिव के प्रति समर्पण का यह भाव अत्यंत सुंदर है—

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः।।

अर्थात—हे महेश्वर! मैं आपके तत्त्व और स्वरूप को पूर्ण रूप से नहीं जानता। हे महादेव! आप जैसे भी हैं, आपको उसी स्वरूप में मेरा बार-बार प्रणाम है।

“एकादश रुद्र: शिव के ग्यारह दिव्य रूपों का विस्तृत विश्लेषण”

एकादश रुद्र के चरित्र : विश्व के अधिपति और महेश्वर

“भगवान शिव का भर्ग स्वरूप: तेज, ज्ञान और भयविनाश का दिव्य रहस्य”

भगवन शिव का शम्भु स्वरुप : लीला विस्तार को उत्पन्न किये विष्णु- ब्रह्मा

स्थाणु स्वरूप: शिव की अचल सत्ता और ब्रह्मांडीय रहस्य

भगवान शिव का पिनाकी अवतार

भगवान शिव के रहस्य

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here