Advertisement
Home International युद्ध में संघ की भूमिका, इतिहास का संतुलित सच

युद्ध में संघ की भूमिका, इतिहास का संतुलित सच

0
70
युद्ध और राष्ट्रीय संकट के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका
युद्ध, आपदा और राष्ट्रीय संकट के समय संघ के स्वयंसेवकों की भूमिका का ऐतिहासिक विश्लेषण।

स्वतंत्रता दिवस केवल तिरंगा फहराने और राष्ट्रगान गाने का अवसर नहीं है। यह उस लंबे संघर्ष और उन असंख्य लोगों को याद करने का दिन भी है, जिन्होंने राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में अपने-अपने तरीके से योगदान दिया। इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका पर चर्चा आज भी राजनीतिक बहस का विषय बनी रहती है। संघ को लेकर समर्थकों और विरोधियों के अपने-अपने तर्क हैं, लेकिन इतिहास का मूल्यांकन न तो प्रशंसा के चश्मे से होना चाहिए और न ही पूर्वाग्रह से। सवाल यह होना चाहिए कि अलग-अलग कालखंडों में संघ और उसके स्वयंसेवकों ने वास्तव में क्या किया?

संघ की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। उसका मूल जोर संगठन निर्माण, अनुशासन, चरित्र निर्माण और समाज में राष्ट्रीय चेतना पैदा करने पर रहा। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में कांग्रेस, क्रांतिकारियों, समाजवादियों, किसान आंदोलनों, आजाद हिंद फौज और अनेक सामाजिक संगठनों की अपनी-अपनी भूमिकाएं थीं। संघ का रास्ता उनसे अलग था। इसलिए संघ को स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्य राजनीतिक नेतृत्वकर्ता बताना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन यह कहना भी उचित नहीं कि संघ से जुड़े किसी व्यक्ति ने स्वतंत्रता संघर्ष में भाग ही नहीं लिया। संघ की अपनी ऐतिहासिक सामग्री भी 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कुछ संघ कार्यकर्ताओं के व्यक्तिगत रूप से सक्रिय होने का उल्लेख करती है।

Advertisment

यहीं से इतिहास की जटिलता शुरू होती है। संगठन के रूप में संघ ने भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व नहीं किया। इसलिए स्वतंत्रता संग्राम में उसकी भूमिका को कांग्रेस या आजाद हिंद फौज के समकक्ष रखना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन संघ के स्वयंसेवकों के व्यक्तिगत योगदान और उस समय समाज में चल रही राष्ट्रीय चेतना को भी पूरी तरह नकारना इतिहास को अधूरा पढ़ना होगा। स्वतंत्रता आंदोलन स्वयं अनेक धाराओं का समुच्चय था।

1947 का विभाजन और उसके बाद का संकट संघ के लिए एक अलग अध्याय लेकर आया। देश के विभाजन के बाद लाखों लोग विस्थापित हुए। पंजाब, दिल्ली, बंगाल और जम्मू-कश्मीर सहित कई क्षेत्रों में भयावह मानवीय संकट पैदा हुआ। स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों के लिए भोजन, आवास, सुरक्षा और राहत की व्यवस्था में काम किया—ऐसे दावे संघ के ऐतिहासिक विवरणों में मिलते हैं। विभाजन की हिंसा का इतिहास अत्यंत जटिल है और उसमें सभी पक्षों की भूमिका पर गंभीर विवाद हैं। इसलिए इस कालखंड में संघ की भूमिका का मूल्यांकन भी प्रमाण और संदर्भ के साथ होना चाहिए।

इसके बाद जब देश के सामने सीमाओं पर युद्ध के संकट आए, तब संघ की भूमिका का स्वरूप बदलता दिखाई देता है। 1962 का चीन युद्ध इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। चीनी आक्रमण के बाद देश में राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर अभूतपूर्व चिंता पैदा हुई। संघ के अपने इतिहास के अनुसार, स्वयंसेवकों को सरकार के उपायों और विशेष रूप से जवानों की सहायता के लिए सक्रिय किया गया।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। सैनिक युद्ध लड़ते हैं, जबकि नागरिक संगठन युद्ध के दौरान नागरिक और सामाजिक मोर्चे को संभाल सकते हैं। स्वयंसेवकों का योगदान सैनिकों के सैन्य योगदान का विकल्प नहीं था। लेकिन रक्तदान, राहत, आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था, नागरिक सहयोग और जनमनोबल बनाए रखने जैसे काम भी युद्धकालीन राष्ट्रीय प्रयास का हिस्सा होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संघ के शताब्दी समारोह में 1962 के युद्ध का उल्लेख करते हुए स्वयंसेवकों द्वारा सशस्त्र बलों के सहयोग और सीमावर्ती गांवों में सहायता पहुंचाने की बात कही।

1962 के बाद संघ के सार्वजनिक स्वीकार्य होने की चर्चा में 1963 का गणतंत्र दिवस अक्सर सामने आता है। संघ के अपने दस्तावेज में 26 जनवरी के संचलन में लगभग 3,000 स्वयंसेवकों के शामिल होने और कम समय में गणवेश तथा घोष के साथ तैयार होने का उल्लेख है। लेकिन इसे लेकर यह दावा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन युद्ध में संघ के योगदान से प्रभावित होकर संघ को औपचारिक गणतंत्र दिवस परेड में बुलाया था, इतिहास में विवादित है। इसलिए इसे निर्विवाद तथ्य की तरह प्रस्तुत करने के बजाय सावधानी से देखना चाहिए।

1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध संघ के इतिहास में दूसरा महत्वपूर्ण पड़ाव है। पाकिस्तान के हमले के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने संघ के सरसंघचालक गुरुजी को सर्वदलीय बैठक में आमंत्रित किया था। संघ के आधिकारिक विवरण के अनुसार, गुरुजी ने सरकार को पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।

यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि युद्ध जैसी राष्ट्रीय आपदा में राजनीतिक मतभेदों के बावजूद नागरिक संगठनों से सहयोग लिया जा सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर सरकार और समाज के बीच सहयोग किसी एक विचारधारा की संपत्ति नहीं हो सकता।

1971 का युद्ध और शरणार्थी संकट इससे भी बड़ा मानवीय संकट लेकर आया। पूर्वी पाकिस्तान से लाखों लोग भारत आए। भोजन, आवास, स्वास्थ्य और राहत की भारी आवश्यकता थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2025 में संघ के शताब्दी समारोह में कहा कि स्वयंसेवकों ने उस समय शरणार्थियों के लिए भोजन, आश्रय और स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था में योगदान दिया। संघ के अपने इतिहास में भी 1971 के युद्ध के दौरान सशस्त्र बलों की सहायता में स्वयंसेवकों की सक्रियता का उल्लेख मिलता है।

लेकिन संघ की कहानी केवल युद्धों तक सीमित नहीं है। प्राकृतिक आपदाओं और सामाजिक संकटों में स्वयंसेवकों की भागीदारी संघ की सार्वजनिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी। 1966 के बिहार अकाल के दौरान राहत कार्यों का उल्लेख संघ के इतिहास में मिलता है और जयप्रकाश नारायण द्वारा स्वयंसेवकों की सेवा की सराहना किए जाने का दावा भी दर्ज है।

इसके बाद बाढ़, चक्रवात, भूकंप और अन्य आपदाओं में संघ से जुड़े संगठनों ने राहत कार्य किए। 1977 में आंध्र प्रदेश के चक्रवात के बाद स्वयंसेवकों द्वारा बड़े पैमाने पर राहत सामग्री वितरित किए जाने का संघ के इतिहास में उल्लेख है—2.40 लाख कपड़े और 32 हजार बर्तनों के वितरण का भी दावा किया गया है।

आपातकाल संघ के इतिहास का एक और निर्णायक अध्याय है। 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल लगाया और 4 जुलाई को संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। संघ के अनेक नेता और कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए तथा कई कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर आपातकाल विरोधी गतिविधियों में भाग लिया।

आपातकाल की लड़ाई को केवल संघ की लड़ाई कहना भी गलत होगा। जयप्रकाश नारायण सहित विभिन्न राजनीतिक धाराओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष किया। लेकिन इस संघर्ष में संघ के कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी को भी इतिहास का हिस्सा माना जाना चाहिए। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद संघ पर लगा प्रतिबंध हटाया गया।

संघ की एक बड़ी उपलब्धि संगठन के बाहर सामाजिक संस्थाओं का निर्माण भी रही है। समय के साथ स्वयंसेवकों से जुड़े अनेक संगठनों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, सेवा, श्रमिक, किसान, जनजातीय क्षेत्रों और सामाजिक जागरण के क्षेत्रों में काम किया। संघ स्वयं भी मानता है कि उसके स्वयंसेवकों द्वारा समय के साथ अनेक स्वतंत्र संस्थाओं का निर्माण हुआ।

विवेकानंद शिला स्मारक भी इसी क्रम में उल्लेखनीय है। 1960 के दशक में कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद की स्मृति में स्मारक निर्माण का अभियान एक राष्ट्रीय प्रयास बना। संघ के वरिष्ठ प्रचारक एकनाथ रानाडे इस अभियान के प्रमुख संगठकों में रहे। यह काम केवल संघ की गतिविधि नहीं था; इसमें विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक समूहों और देशभर के नागरिकों से सहयोग जुटाया गया। लेकिन संघ के संगठनात्मक नेटवर्क ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आज संघ से जुड़े सेवा संगठनों का काम शिक्षा, स्वास्थ्य और राहत से लेकर वंचित क्षेत्रों तक पहुंच बनाने में दिखाई देता है। प्राकृतिक आपदाओं में स्वयंसेवकों के पहुंचने का उल्लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी किया है। उन्होंने पंजाब की बाढ़, हिमाचल और उत्तराखंड की आपदाओं तथा केरल के वायनाड हादसे के संदर्भ में स्वयंसेवकों को राहत कार्यों में सक्रिय बताया।

फिर भी संघ की उपलब्धियों का मूल्यांकन करते समय आलोचनात्मक दृष्टि को छोड़ना नहीं चाहिए। किसी संगठन की सेवा गतिविधियां उसके राजनीतिक और वैचारिक इतिहास पर होने वाली बहस को स्वतः समाप्त नहीं कर देतीं। उसी प्रकार उसकी वैचारिक आलोचनाएं उसके सामाजिक सेवा कार्यों को स्वतः झूठा नहीं बना देतीं। लोकतंत्र में दोनों पक्षों को साथ देखने की क्षमता होनी चाहिए।

यही कारण है कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर संघ की भूमिका पर चर्चा करते हुए दो अतियों से बचना जरूरी है। पहली अति है—संघ को स्वतंत्रता संग्राम का केंद्रीय नायक बना देना। दूसरी अति है—संघ के स्वयंसेवकों के युद्धकालीन, आपदा राहत और सामाजिक सेवा के योगदान को पूरी तरह खारिज कर देना।

इतिहास किसी राजनीतिक दल का घोषणापत्र नहीं होता। वह उपलब्ध प्रमाणों, दस्तावेजों और घटनाओं की जटिलता से बनता है। 1962 में चीन के खिलाफ युद्ध के समय स्वयंसेवकों का सहयोग, 1965 में सरकार के साथ सहयोग, 1971 के शरणार्थी संकट में सेवा, प्राकृतिक आपदाओं में राहत और आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक संघर्ष—ये सभी संघ के इतिहास के अलग-अलग अध्याय हैं। इन अध्यायों को स्वीकार करना संघ का प्रचार नहीं, बल्कि इतिहास को उसके व्यापक संदर्भ में देखने का प्रयास है।

आज देश की सुरक्षा का अर्थ केवल सीमा पर लड़ना नहीं है। प्राकृतिक आपदा, महामारी, साइबर हमला, आंतरिक संकट, बड़े पैमाने पर विस्थापन और युद्ध जैसी परिस्थितियों में नागरिक समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सेना देश की सीमा की रक्षा करती है, लेकिन संकट के समय समाज को संभालने की जिम्मेदारी पूरे राष्ट्र की होती है।

इस दृष्टि से संघ की सबसे बड़ी शक्ति शायद उसका स्वयंसेवक आधारित ढांचा है। शाखा के माध्यम से अनुशासन, संगठन और सामूहिक कार्य की जो संस्कृति विकसित की जाती है, वह आपदा या राष्ट्रीय संकट के समय तेजी से लोगों को संगठित करने में उपयोगी हो सकती है। लेकिन इस शक्ति का सर्वोत्तम उपयोग तभी है, जब वह किसी राजनीतिक विवाद से ऊपर उठकर राष्ट्र और समाज की सेवा में दिखाई दे।

स्वतंत्रता दिवस पर इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कौन संगठन राष्ट्रभक्त है और कौन नहीं। असली प्रश्न यह होना चाहिए कि संकट की घड़ी में कौन राष्ट्र के साथ खड़ा हुआ, किसने क्या किया और उसके प्रमाण क्या हैं।

संघ का इतिहास भी इसी कसौटी पर पढ़ा जाना चाहिए। जहां योगदान है, वहां उसका उल्लेख हो; जहां सीमाएं हैं, वहां उन्हें स्वीकार किया जाए; जहां तथ्य विवादित हैं, वहां उन्हें विवादित ही कहा जाए।

क्योंकि राष्ट्र किसी एक संगठन, दल या विचारधारा से बड़ा है।

भारत की शक्ति उसकी सेना की वीरता, नागरिकों की एकजुटता और संकट में एक-दूसरे के लिए खड़े होने की क्षमता में है। संघ की भूमिका का सबसे उचित मूल्यांकन भी इसी कसौटी से होना चाहिए—न अंधा महिमामंडन, न पूर्वाग्रहपूर्ण खारिज करना, बल्कि तथ्य, सेवा और राष्ट्रहित के आधार पर निष्पक्ष मूल्यांकन।

धर्म का ठेकेदार कौन? संघ नहीं, धर्मगुरु ही धर्म के निर्णायक

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here