संसद का मानसून सत्र इन दिनों राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और हंगामे का अखाड़ा बना हुआ है। विपक्ष लगातार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से विभिन्न मुद्दों पर जवाब की मांग कर रहा था। अब जब अमित शाह ने सदन में चर्चा के लिए तैयार होने और विपक्ष के हर सवाल का जवाब देने की बात कही है, तो नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का यह कहना कि उन्हें गृह मंत्री का ‘लेक्चर’ सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है, कई सवाल खड़े करता है।
राहुल गांधी लंबे समय से यह आरोप लगाते रहे हैं कि सरकार विपक्ष के सवालों का सामना करने से बच रही है। विपक्ष की ओर से बार-बार कहा गया कि गृह मंत्री सदन में आएं और छात्रों से जुड़े मुद्दों, परीक्षा व्यवस्था, विरोध प्रदर्शनों तथा पुलिस कार्रवाई पर जवाब दें। अब अमित शाह ने साफ तौर पर कहा है कि वह सदन में मौजूद रहेंगे और विपक्ष के हर सवाल का जवाब देने को तैयार हैं। ऐसे में सवाल यह है कि अब राहुल गांधी बहस से क्यों पीछे हट रहे हैं?
सवाल पूछने थे तो जवाब सुनने की हिम्मत भी हो
लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना और सरकार का दायित्व उन सवालों का जवाब देना है। संसद इसी संवाद का सर्वोच्च मंच है। यदि विपक्ष किसी मुद्दे को लेकर गंभीर है तो उसे चर्चा की मांग करनी चाहिए और सरकार के जवाब को सुनकर आगे सवाल रखने चाहिए। केवल हंगामा करना और चर्चा से बचना संसदीय लोकतंत्र की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
राहुल गांधी का यह कहना कि उन्हें गृह मंत्री का भाषण सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है, उस समय आया है जब अमित शाह ने विपक्ष को चर्चा के लिए आगे आने की चुनौती दी है। इससे विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि आरोप गंभीर हैं तो उनके प्रमाण और सवाल सदन में रखे जाने चाहिए। सरकार जवाब देती है तो उसे भी सुना जाना चाहिए।
हंगामा ही राजनीति का लक्ष्य तो नहीं?
पिछले कुछ समय से संसद में लगातार व्यवधान देखने को मिल रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे पर सदन नहीं चलने देने के आरोप लगाते हैं। लेकिन अंततः नुकसान जनता का होता है। संसद की प्रत्येक बैठक पर सरकारी धन खर्च होता है। सांसदों के वेतन, कर्मचारियों की व्यवस्था, सुरक्षा, तकनीकी संसाधन और सदन की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर जनता के पैसे का इस्तेमाल होता है।
ऐसे में यदि जनप्रतिनिधि लगातार हंगामा करें और महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा न हो पाए तो इसका जवाबदेह कौन होगा? जनता ने सांसदों को संसद में भेजा है ताकि वे कानून बनाएं, नीतियों पर चर्चा करें और सरकार से जवाब मांगें। जनता ने उन्हें केवल नारेबाजी और विरोध के लिए नहीं चुना है।
राहुल की राजनीति पर उठ रहे सवाल
राहुल गांधी लंबे समय से केंद्र सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं। यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन सवाल उठाने के साथ जवाब सुनने की जिम्मेदारी भी विपक्ष की होती है। यदि सरकार चर्चा के लिए तैयार है तो विपक्ष को चर्चा के मंच पर जाना चाहिए।
अमित शाह का यह कहना कि वह पूरे समय सदन में बैठकर विपक्ष के हर सवाल का जवाब देने को तैयार हैं, राजनीतिक रूप से विपक्ष के सामने एक सीधी चुनौती है। अब गेंद विपक्ष के पाले में है। उसे तय करना है कि वह बहस चाहता है या फिर सदन को हंगामे में ही उलझाए रखना चाहता है।
राहुल गांधी का ‘लेक्चर सुनने में दिलचस्पी नहीं’ वाला बयान राजनीतिक रूप से उनके लिए उलटा भी पड़ सकता है। आखिर संसद में सरकार का पक्ष सुनना भी विपक्ष की जिम्मेदारी है। यदि किसी मुद्दे पर मतभेद है तो जवाब के बाद फिर सवाल किए जा सकते हैं। लेकिन जवाब सुनने से ही इनकार कर देना यह संदेश देता है कि मुद्दे से अधिक राजनीतिक टकराव को महत्व दिया जा रहा है।
जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?
संसद की कार्यवाही जनता के पैसे से चलती है। देश का आम नागरिक टैक्स देता है और उम्मीद करता है कि उसके प्रतिनिधि संसद में उसके मुद्दे उठाएंगे। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, किसानों की समस्याएं, युवाओं की चिंता और परीक्षा व्यवस्था जैसे विषयों पर गंभीर चर्चा की जरूरत है।
यदि संसद में इन विषयों पर बहस के बजाय लगातार हंगामा होता है तो यह जनता के साथ न्याय नहीं है। विपक्ष सरकार को घेरना चाहता है तो उसे आंकड़ों, दस्तावेजों और तथ्यों के साथ घेरना चाहिए। सरकार से कठिन सवाल पूछे जाने चाहिए और उसके जवाब की कमियां भी उजागर की जानी चाहिए। यही मजबूत विपक्ष की पहचान है।
अब फैसला राहुल गांधी को करना है
राहुल गांधी को यह स्पष्ट करना होगा कि उनका उद्देश्य वास्तव में छात्रों और युवाओं के मुद्दों का समाधान तलाशना है या फिर संसद में राजनीतिक गतिरोध बनाए रखना। यदि छात्रों के मुद्दे इतने गंभीर हैं, जैसा कि विपक्ष लगातार कह रहा है, तो फिर गृह मंत्री के जवाब से बचने के बजाय उनके सामने सवाल रखने चाहिए।
राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोपों को सदन में बहस के जरिए साबित करना कठिन। यही लोकतंत्र की कसौटी भी है। राहुल गांधी अब तक गृह मंत्री के सदन में बयान की मांग पर जोर देते रहे हैं। जब अमित शाह खुद चर्चा के लिए तैयार होने की बात कह रहे हैं, तब पीछे हटने की बजाय राहुल गांधी को सदन में मौजूद रहकर अपने सवाल रखने चाहिए।
वरना जनता के बीच यही संदेश जाएगा कि मुद्दा समाधान का नहीं, केवल राजनीतिक हंगामे का था। लोकतंत्र में विपक्ष की ताकत शोर में नहीं, उसके सवालों की गंभीरता और तर्कों की मजबूती में होती है। अब राहुल गांधी के सामने अवसर है कि वे आरोपों से आगे बढ़कर सदन में बहस करें। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो उनके राजनीतिक रुख पर सवाल उठना स्वाभाविक है।










