अखिलेश के दौर पर सबसे बड़ा सवाल, योगी के कार्यकाल में बड़े दंगों पर लगा ब्रेक
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था को लेकर सरकारों के प्रदर्शन का आकलन अगर केवल दंगों और सांप्रदायिक हिंसा के पैमाने पर किया जाए, तो तीन अलग-अलग राजनीतिक दौर की तस्वीर काफी स्पष्ट दिखाई देती है। उपलब्ध आंकड़ों में अखिलेश यादव सरकार का रिकॉर्ड सबसे कमजोर, मायावती सरकार का उससे बेहतर और योगी आदित्यनाथ सरकार का बड़े सांप्रदायिक दंगों को रोकने के मामले में सबसे मजबूत नजर आता है।
2012 से 2017 के बीच उत्तर प्रदेश में 815 दंगे हुए और इनमें 192 लोगों की मौत हुई। इसके मुकाबले 2007 से 2011 के बीच मायावती सरकार के कार्यकाल में 616 दंगों में 121 लोगों की मौत दर्ज की गई। ये आंकड़े उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के साथ कानून-व्यवस्था की तस्वीर में आए बड़े अंतर की ओर इशारा करते हैं।
दंगों के पैमाने पर आंकड़ों का संदेश सीधा है—अखिलेश यादव सरकार सबसे कमजोर, मायावती सरकार उससे बेहतर और योगी आदित्यनाथ सरकार बड़े सांप्रदायिक दंगों को रोकने के मामले में सबसे सफल दिखाई देती है।
हालांकि यह निष्कर्ष केवल दंगों और सांप्रदायिक हिंसा के आधार पर है। महिला अपराध, हत्या, बलात्कार, अपहरण और अन्य अपराधों को इसमें जोड़ने पर सरकारों की रैंकिंग अलग हो सकती है। इसलिए व्यापक कानून-व्यवस्था का अंतिम फैसला करने के लिए इन सभी श्रेणियों के आंकड़ों को अलग-अलग और फिर समग्र रूप से देखना जरूरी होगा।
अखिलेश सरकार: दंगों का आंकड़ा सबसे ज्यादा
2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद प्रदेश में दंगों की घटनाओं का आंकड़ा लगातार राजनीतिक बहस का विषय रहा। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पांच साल के इस दौर में 815 दंगे और 192 मौतें हुईं।
इस दौर की सबसे बड़ी और गंभीर घटना मुजफ्फरनगर दंगा, 2013 रही। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भड़की सांप्रदायिक हिंसा ने लंबे समय तक सामाजिक तनाव पैदा किया और सरकार की कानून-व्यवस्था व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए।
यही वजह है कि केवल दंगों की संख्या ही नहीं, बल्कि हिंसा की भयावहता और उसके सामाजिक प्रभाव को भी इस दौर के आकलन में महत्वपूर्ण माना जाता है।
मायावती सरकार: आंकड़े कम, लेकिन दंगों पर पूरी रोक नहीं
2007 से 2011 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक मायावती सरकार के दौरान 616 दंगे और 121 मौतें दर्ज हुईं। यानी दंगों और उनसे हुई मौतों दोनों के लिहाज से यह आंकड़ा अखिलेश सरकार के दौर से कम था।
इस आधार पर मायावती सरकार को अखिलेश सरकार से बेहतर स्थिति में रखा जा सकता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि उस दौर में सांप्रदायिक हिंसा पूरी तरह खत्म हो गई थी। प्रदेश में कानून-व्यवस्था और सामुदायिक तनाव की घटनाएं तब भी चुनौती बनी हुई थीं।
योगी सरकार: बड़े दंगों का दौर हुआ खत्म
2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद सरकार ने कानून-व्यवस्था को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा और दंगा नियंत्रण के लिए जीरो टॉलरेंस नीति पर जोर दिया।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 2017 के बाद प्रदेश में मुजफ्फरनगर जैसी व्यापक सांप्रदायिक हिंसा दोबारा नहीं हुई। 2023 में तो एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक या धार्मिक दंगों की संख्या शून्य दर्ज हुई। इसे राज्य के लिए महत्वपूर्ण बदलाव माना गया।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है। ‘बड़े सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए’ का अर्थ यह नहीं है कि योगी सरकार के दौरान हर तरह की हिंसा या हर प्रकार के बलवे की घटना समाप्त हो गई। एनसीआरबी अलग-अलग अपराध श्रेणियों में आंकड़े दर्ज करता है। इसलिए ‘दंगे’, ‘सांप्रदायिक/धार्मिक दंगे’ और अन्य प्रकार के बलवे को एक ही श्रेणी मानना सही नहीं होगा।
2023 का आंकड़ा क्यों महत्वपूर्ण?
योगी सरकार के कानून-व्यवस्था मॉडल के समर्थन में सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ों में से एक 2023 में सांप्रदायिक/धार्मिक दंगों का शून्य होना है। रिपोर्टों के अनुसार यह उत्तर प्रदेश के लिए एक असाधारण स्थिति थी।
इसका राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि तुलना उस दौर से की जा रही है जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर जैसी बड़ी सांप्रदायिक हिंसा हुई थी।
सिर्फ संख्या नहीं, हिंसा की गंभीरता भी मायने रखती है
तीनों सरकारों की तुलना करते समय केवल दंगों की गिनती करना पर्याप्त नहीं है। किसी सरकार की कानून-व्यवस्था का वास्तविक परीक्षण इस बात से भी होता है कि हिंसा कितनी बड़ी थी, कितने लोगों की जान गई, कितने समय तक स्थिति नियंत्रण से बाहर रही और प्रशासन ने कितनी जल्दी स्थिति संभाली।
इसी कसौटी पर मुजफ्फरनगर 2013 जैसी घटना अखिलेश सरकार के कार्यकाल पर सबसे गंभीर सवाल खड़ा करती है। इसके मुकाबले योगी सरकार के दौरान हुई स्थानीय हिंसक घटनाओं को व्यापक सांप्रदायिक दंगों में बदलने से रोकने का दावा सरकार करती रही है। उपलब्ध रिपोर्टों में बरेली और बहराइच जैसी घटनाओं का उल्लेख भी है, जिन्हें प्रशासन ने तेजी से नियंत्रित करने की बात कही है।
फैसला: दंगों के मोर्चे पर कौन सबसे निकृष्ट?
उपलब्ध दंगों और उनसे हुई मौतों के आंकड़ों को आधार बनाया जाए तो तस्वीर इस प्रकार बनती है—
पहला स्थान — योगी आदित्यनाथ सरकार: बड़े सांप्रदायिक दंगों पर सबसे प्रभावी नियंत्रण; 2023 में सांप्रदायिक/धार्मिक दंगे शून्य।
दूसरा स्थान — मायावती सरकार: 616 दंगे और 121 मौतें; अखिलेश सरकार के मुकाबले बेहतर आंकड़े।
सबसे निकृष्ट — अखिलेश यादव सरकार: 815 दंगे और 192 मौतें; इसी दौर में मुजफ्फरनगर जैसी बड़ी सांप्रदायिक हिंसा भी हुई।










