CAG ने खोली 477.93 करोड़ की राजस्व चोरी की परत, 282.22 करोड़ की पेनाल्टी भी दबा दी गई
58 पट्टों में खनन योजना की अनदेखी, 15 को बिना नवीनीकरण खनन की छूट और 12 को तय सीमा से ज्यादा खनिज निकालने दिया गया; हाईकोर्ट के आदेश के बाद CBI जांच में 11 के खिलाफ FIR, छापों में नकदी और सोना भी मिला
उत्तर प्रदेश: अखिलेश सरकार के कार्यकाल में खनन का खेल!
📊 CAG रिपोर्ट के बड़े खुलासे: 🔹 ₹477.93 करोड़ की राजस्व चोरी/नुकसान। 🔹 ₹282.22 करोड़ की पेनाल्टी को दबाया गया। 🔹 ₹179.57 करोड़ की खनिज लागत की गैर-वसूली। 🔹 58 पट्टों में खनन योजना (Mining Plan) की पूरी अनदेखी। 🔹 15 पट्टों को बिना नवीनीकरण के खनन की छूट, और 12 को तय सीमा से अधिक दोहन की अनुमति।
⚖️ जांच और कार्रवाई: 🔸 हाईकोर्ट के आदेश के बाद CBI जांच में 11 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज। 🔸 छापों के दौरान भारी नकदी और किलोभर सोना बरामद। 🔸 ED द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग की जांच भी शुरू
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में खनन व्यवस्था में हुई गड़बड़ियों का सरकारी रिकॉर्ड अब भी कई गंभीर सवाल खड़े करता है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की आधिकारिक रिपोर्ट ने वर्ष 2015-16 में खनन विभाग की कार्यप्रणाली की पड़ताल करते हुए न सिर्फ बड़े पैमाने पर राजस्व नुकसान दर्ज किया, बल्कि यह भी पाया कि नियमों की अनदेखी करके खनन कराया गया और उल्लंघन करने वालों से निर्धारित पेनाल्टी तक वसूल नहीं की गई। CAG के मुताबिक अनधिकृत उत्खनन और कमजोर निगरानी के कारण उत्तर प्रदेश सरकार 477.93 करोड़ रुपये के राजस्व से वंचित हुई। इससे अलग मामलों में 282.22 करोड़ रुपये की पेनाल्टी वसूल नहीं की गई, जबकि पर्यावरणीय मंजूरी से जुड़े उल्लंघनों में 179.57 करोड़ रुपये की खनिज लागत की वसूली भी नहीं हुई।
यहां सवाल केवल सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचने का नहीं है। CAG ने अपनी रिपोर्ट में साफ दर्ज किया कि खनन नियामकों का इस पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील गतिविधि पर प्रभावी नियंत्रण नहीं था और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन नियमों की अनदेखी के बावजूद जारी रहा। रिपोर्ट ने अधिकारियों की लापरवाही अथवा मिलीभगत पाए जाने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश तक की थी।
477.93 करोड़ का नुकसान कैसे हुआ?
CAG ने भूविज्ञान एवं खनन विभाग की निगरानी व्यवस्था की जांच में पाया कि विभाग अनिवार्य त्रैमासिक रिटर्न की निगरानी नहीं कर रहा था। रॉयल्टी की दरों में बदलाव के बाद अंतर की वसूली, खनिजों के मूल्य का आकलन और देर से भुगतान पर ब्याज वसूलने में भी गंभीर कमियां थीं। जिला खनन अधिकारियों ने उन रिकॉर्ड और तथ्यों का पर्याप्त मिलान नहीं किया, जिसके कारण अनधिकृत खनन और खनिजों के परिवहन को रोका नहीं जा सका।
नतीजा यह हुआ कि सरकार को 477.93 करोड़ रुपये के राजस्व से हाथ धोना पड़ा। यह CAG का आधिकारिक ऑडिट निष्कर्ष है, कोई राजनीतिक आरोप नहीं।
58 पट्टों में नियमों की अनदेखी
CAG की रिपोर्ट का सबसे गंभीर हिस्सा खनन पट्टों से जुड़ा है। ऑडिट में पाया गया कि 58 पट्टाधारकों के मामलों में खनन योजना दाखिल और स्वीकृत कराने की अनिवार्यता को ही नजरअंदाज कर दिया गया।
इसके बाद भी खनन चलता रहा। इतना ही नहीं, 15 पट्टाधारकों को खनन योजना के नवीनीकरण के बिना खनिज निकालने दिया गया। दूसरी ओर 12 पट्टाधारकों को स्वीकृत खनन योजना में निर्धारित मात्रा से काफी अधिक खनिज निकालने दिया गया।
यानी जिस व्यवस्था का उद्देश्य यह तय करना था कि किस इलाके में कितना खनन होगा और प्राकृतिक संसाधनों का कितना दोहन किया जा सकता है, वही व्यवस्था मौके पर प्रभावहीन साबित हुई। CAG ने इसी आधार पर कहा कि खनन नियामकों का इस गतिविधि पर नियंत्रण नहीं था।
282.22 करोड़ की पेनाल्टी क्यों नहीं वसूली गई?
नियमों के उल्लंघन के बावजूद सरकार ने कार्रवाई के स्तर पर भी गंभीर ढिलाई बरती। CAG ने पाया कि जिन मामलों में खनन योजना से जुड़े नियमों का उल्लंघन हुआ, वहां 282.22 करोड़ रुपये की पेनाल्टी वसूल नहीं की गई।
इसका सीधा अर्थ है कि नियम तोड़ने के बाद भी सरकारी राजस्व की वसूली उस स्तर पर नहीं हुई जिस स्तर पर नियमों के तहत होनी चाहिए थी। CAG ने इसे महज तकनीकी कमी नहीं माना बल्कि अपनी निष्कर्षात्मक टिप्पणी में कहा कि खनन नियामकों ने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं किया और उल्लंघन की भरपाई तक नहीं की।
पर्यावरण मंजूरी के बिना भी खनन
रिपोर्ट में पर्यावरणीय मंजूरी से जुड़ी गड़बड़ियां भी सामने आईं। CAG के अनुसार पांच पट्टाधारकों और 2,909 ईंट-भट्ठा संचालकों को पर्यावरणीय मंजूरी के बिना खनिज निकालने दिया गया। इसके अलावा 30 पट्टाधारकों ने पर्यावरणीय मंजूरी में निर्धारित मात्रा से अधिक खनिज निकाला।
इन उल्लंघनों से संबंधित 179.57 करोड़ रुपये की खनिज लागत सरकार ने वसूल नहीं की। 40 पट्टाधारकों के मामले में 191.77 एकड़ पट्टे वाली भूमि पर पौधारोपण भी नहीं किया गया।
यानी मामला केवल सरकारी राजस्व का नहीं था। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के साथ पर्यावरणीय शर्तों की भी अनदेखी हुई।
CAG के सामने विभाग ने क्या कहा?
ऑडिट के दौरान विभाग ने कई मामलों में वसूली की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही। CAG ने इसके बावजूद अपनी अंतिम टिप्पणी में कहा कि विभाग को खनन योजना और पर्यावरणीय मंजूरी के बाद ही खनन की अनुमति देनी चाहिए। साथ ही जहां अधिकारियों की लापरवाही या मिलीभगत सामने आए, वहां संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने की सिफारिश की गई।
इससे साफ है कि CAG ने केवल रकम का हिसाब नहीं लगाया, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र पर भी सवाल उठाया जिसके जरिए नियमों का पालन कराया जाना था।
फिर हाईकोर्ट पहुंचा मामला
उत्तर प्रदेश में अवैध खनन को लेकर अलग-अलग याचिकाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाया था। 2016 में अवैध बालू खनन से संबंधित याचिकाओं में अदालत के निर्देशों के बाद मामला केंद्रीय जांच एजेंसी तक पहुंचा। बाद में CBI ने प्रदेश के कई जिलों में कथित अवैध खनन से जुड़े मामलों की प्रारंभिक जांच शुरू की।
हमीरपुर का मामला इसी सिलसिले में सबसे चर्चित हुआ। CBI ने 2012 से 2016 के बीच हुए कथित अवैध खनन और खनन पट्टों के आवंटन की जांच शुरू की और 2 जनवरी 2019 को FIR दर्ज की।
11 लोगों के खिलाफ FIR और फिर छापे
CBI की FIR में तत्कालीन हमीरपुर जिलाधिकारी बी. चंद्रकला सहित 11 लोगों को आरोपी बनाया गया। एजेंसी ने जनवरी 2019 में उत्तर प्रदेश और दिल्ली के 14 ठिकानों पर छापेमारी की। जांच का केंद्र यह आरोप था कि नियमों और ई-टेंडर प्रक्रिया का पालन किए बिना नए खनन पट्टे दिए गए, पुराने पट्टों का नवीनीकरण हुआ और ऐसे समय में भी खनन की अनुमति दी गई जब उस पर रोक थी।
CBI की कार्रवाई में बरामदगी ने मामले को और गंभीर बना दिया। एक आरोपी के आवास से दो करोड़ रुपये नकद और दो किलो सोना तथा खनन विभाग के तत्कालीन भूविज्ञानी के आवास से 12.5 लाख रुपये नकद और दो किलो सोना बरामद होने की जानकारी जांच एजेंसी के हवाले से सामने आई। CBI के मुताबिक हमीरपुर में खनन विभाग का एक कर्मचारी कथित तौर पर बेनामी खनन पट्टों से भी जुड़ा था।
अखिलेश यादव की भूमिका भी जांच के दायरे में आई
हमीरपुर मामले की अवधि 2012 से 2016 की थी। अखिलेश यादव 2012 से जून 2013 तक खनन विभाग संभाल चुके थे, इसके बाद विभाग गायत्री प्रसाद प्रजापति के पास गया। इसी कारण CBI ने संबंधित अवधि में खनन मंत्रालय संभालने वाले दोनों नेताओं की भूमिका की जांच की बात कही थी।
फरवरी 2024 में CBI ने अखिलेश यादव को हमीरपुर अवैध खनन मामले में पूछताछ के लिए नोटिस भेजा। उन्हें गवाह के तौर पर 29 फरवरी को पेश होने को कहा गया था। अखिलेश यादव उस समय CBI के सामने पेश नहीं हुए और एजेंसी की कार्रवाई को राजनीतिक बताया।
ED ने भी खोली मनी लॉन्ड्रिंग की जांच
CBI की FIR के बाद मामला केवल अवैध खनन और पट्टा आवंटन तक सीमित नहीं रहा। प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने भी मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया। ED ने कथित तौर पर अवैध खनन पट्टों से हासिल धन से बनाई गई संपत्तियों और धन के प्रवाह की जांच शुरू की थी। एजेंसी ने यह भी कहा था कि अवैध लाइसेंस से हासिल रकम से संपत्ति बनाने के पहलू की जांच की जाएगी।
तो क्या 477.93 करोड़ ही ‘घोटाले’ की रकम है?
इसका जवाब सीधा है—477.93 करोड़ रुपये CAG द्वारा दर्ज किया गया सरकारी राजस्व नुकसान है। इसे ही इस मामले में उपलब्ध आधिकारिक ऑडिट रिकॉर्ड का सबसे बड़ा स्पष्ट वित्तीय आंकड़ा कहा जा सकता है।
इसके अलावा 282.22 करोड़ रुपये की पेनाल्टी और 179.57 करोड़ रुपये की खनिज लागत की गैर-वसूली अलग-अलग ऑडिट निष्कर्ष हैं। इन्हें जोड़कर 939.72 करोड़ रुपये को सीधे ‘घोटाले की रकम’ बताना CAG रिपोर्ट की भाषा नहीं है। इसलिए तथ्यपरक खबर में 477.93 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान को मुख्य आंकड़ा रखना ही उचित है।
लेकिन इस पूरे मामले की गंभीरता केवल 477.93 करोड़ रुपये में नहीं है। असली सवाल यह है कि जब 58 मामलों में खनन योजना की अनदेखी, 15 मामलों में बिना नवीनीकरण खनन, 12 मामलों में स्वीकृत मात्रा से अधिक खनन, पर्यावरणीय मंजूरी के बिना खनन और 282.22 करोड़ रुपये की पेनाल्टी की गैर-वसूली सरकारी ऑडिट में दर्ज हुई, तो उस समय विभागीय निगरानी किस स्तर पर काम कर रही थी?
दस साल बाद भी बड़ा सवाल बाकी
अखिलेश सरकार के कार्यकाल से जुड़े खनन प्रकरण का सबसे बड़ा तथ्य यह है कि CAG ने अनियमितताओं को दस्तावेज में दर्ज किया, हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद CBI जांच तक मामला पहुंचा, CBI ने FIR दर्ज की, छापेमारी में नकदी और सोना बरामद होने की जानकारी सामने आई और ED ने मनी लॉन्ड्रिंग का एंगल भी खोला।
इसलिए इसे केवल विपक्ष और सत्ता के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। CAG की रिपोर्ट में नियमों के उल्लंघन और सरकारी राजस्व नुकसान के ठोस ऑडिट निष्कर्ष हैं, जबकि CBI की जांच ने कुछ मामलों में कथित आपराधिक साजिश, नियम-विरुद्ध पट्टा आवंटन और अवैध खनन की जांच को आगे बढ़ाया।
मामले का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अलग प्रश्न है, लेकिन उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों और जांच एजेंसियों की कार्रवाई से इतना स्पष्ट है कि अखिलेश सरकार के दौर में उत्तर प्रदेश का खनन तंत्र गंभीर अनियमितताओं से घिरा था और सरकारी खजाने को बड़ा नुकसान हुआ। CAG का 477.93 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान इस पूरे प्रकरण का सबसे ठोस आधिकारिक वित्तीय आंकड़ा है; वहीं 282.22 करोड़ रुपये की पेनाल्टी की गैर-वसूली और 179.57 करोड़ रुपये की खनिज लागत की गैर-वसूली उस व्यवस्था की गंभीरता को और बढ़ाती है।
यही वजह है कि इस प्रकरण को उत्तर प्रदेश के खनन इतिहास की उन बड़ी घटनाओं में गिना जाता है, जहां पहले ऑडिट ने सरकारी खजाने को हुए नुकसान और नियमों की धज्जियां उड़ने का दस्तावेजी रिकॉर्ड सामने रखा और बाद में जांच एजेंसियों ने उसी व्यापक खनन व्यवस्था में कथित आपराधिक अनियमितताओं की पड़ताल शुरू की।










