Advertisement
Home International फैसलों का हिसाब, वोट की चोट

फैसलों का हिसाब, वोट की चोट

0
83

नई दिल्ली। संसद में कानून बदलना आसान है, लेकिन समाज में उस बदलाव की राजनीतिक कीमत तय करना सरकार के हाथ में नहीं होता। फैसला सत्ता लेती है और उसका असर मतदाता तय करता है। एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून में बदलाव हो या उच्च शिक्षा में आरक्षण और सामाजिक समानता से जुड़े नियम—मोदी सरकार के कई फैसले अब कानूनी बहस से आगे निकलकर सामाजिक और राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुके हैं। राजस्थान के ताजा निकाय चुनाव ने इस बहस को आंकड़ों का नया आधार दे दिया है।

भाजपा ने राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव में 4,179 वार्ड जीतकर कांग्रेस के 3,613 वार्डों से बढ़त बनाई। लेकिन वोट प्रतिशत की तस्वीर सीटों से अलग कहानी कहती है। भाजपा का वोट शेयर 35.19 प्रतिशत, कांग्रेस का 34.25 प्रतिशत रहा। अंतर सिर्फ 0.94 प्रतिशत अंक। यानी सबसे अधिक वार्ड जीतने के बावजूद दोनों प्रमुख दलों के बीच मत प्रतिशत का फासला बेहद सीमित रहा। इससे भी बड़ा संकेत यह कि 27.38 प्रतिशत वोट निर्दलीयों के खाते में गया और उन्होंने 2,273 वार्ड जीत लिए।

Advertisment

आरक्षित वार्डों ने बढ़ाई बहस

राजस्थान के नतीजों में एससी-एसटी आरक्षित वार्डों का आंकड़ा राजनीतिक बहस को और धार देता है। उपलब्ध परिणामों के अनुसार एससी आरक्षित वार्डों में कांग्रेस ने 542, जबकि भाजपा ने 350 वार्ड जीते। एसटी आरक्षित वार्डों में कांग्रेस 52 और भाजपा 39 वार्डों पर रही। इन आंकड़ों को किसी एक कानून या नीति का प्रत्यक्ष परिणाम कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल को चुनावी आंकड़ों से अलग भी नहीं किया जा सकता।

यही वह बिंदु है जहां एससी-एसटी एक्ट की राजनीति फिर सामने आती है।

20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने सुभाष काशीनाथ महाजन मामले में एससी-एसटी एक्ट के तहत गिरफ्तारी और प्राथमिकी की प्रक्रिया को लेकर सुरक्षा उपाय सुझाए थे। इसके बाद केंद्र सरकार ने अगस्त 2018 में कानून में संशोधन कर धारा 18-ए जोड़ी। इससे प्राथमिकी से पहले प्रारंभिक जांच और गिरफ्तारी से पहले पूर्व अनुमति की शर्तें हटाई गईं। बाद में 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रथ्वी राज चौहान मामले में संशोधन की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी।

सरकार की दलील थी कि संशोधन एससी-एसटी समुदाय के कानूनी संरक्षण को कमजोर होने से बचाने के लिए जरूरी था। आलोचकों ने गिरफ्तारी और कानून के संभावित दुरुपयोग को लेकर सवाल उठाए। यानी कानून वही रहा, लेकिन उसका राजनीतिक अर्थ अलग-अलग सामाजिक समूहों में अलग रहा।

यूजीसी ने फिर खोल दिया मोर्चा

अब 2026 में यूजीसी के समानता नियमों ने इसी बहस को नए सिरे से खड़ा कर दिया। उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से बनाए गए नियमों के कुछ प्रावधानों पर विवाद हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगाई और केंद्र ने बाद में अदालत को बताया कि वह नियमों पर पुनर्विचार कर रहा है।

यहीं से भाजपा के सामाजिक समीकरण पर सवाल खड़ा होता है। क्या सामाजिक न्याय से जुड़े फैसले एक वर्ग को राजनीतिक रूप से जोड़ते हैं तो दूसरे वर्ग में असंतोष भी पैदा कर सकते हैं?

राजस्थान का आंकड़ा इस सवाल का अंतिम उत्तर नहीं है, लेकिन उसे नजरअंदाज करने का आधार भी नहीं देता। भाजपा और कांग्रेस के बीच वोट शेयर का अंतर एक प्रतिशत से भी कम है। निर्दलीयों का 27 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करना बताता है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं ने दोनों प्रमुख दलों से बाहर भी विकल्प तलाशे।

2029 से पहले बड़ा सवाल

इसका अर्थ यह नहीं कि राजस्थान के निकाय चुनाव को सीधे लोकसभा चुनाव का पैमाना मान लिया जाए। स्थानीय चुनावों में उम्मीदवार, स्थानीय संगठन, क्षेत्रीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे परिणाम बदलते हैं। लेकिन राजनीति में संकेत भी महत्वपूर्ण होते हैं।

भाजपा के सामने असली चुनौती अब केवल विपक्ष नहीं, बल्कि अपने सामाजिक आधार के भीतर बदलती धारणाओं को समझने की भी है। एससी-एसटी एक्ट, आरक्षण और यूजीसी जैसे मुद्दे अलग-अलग कानून और नीतियां हैं, लेकिन चुनावी राजनीति में इनका असर सामाजिक समूहों की धारणा पर पड़ सकता है।

राजस्थान का संदेश साफ है—भाजपा सबसे ज्यादा वार्ड जीत सकती है, लेकिन सिर्फ सीटों की संख्या से सामाजिक संतोष का पूरा हिसाब नहीं पढ़ा जा सकता। 35.19 प्रतिशत बनाम 34.25 प्रतिशत और 27.38 प्रतिशत निर्दलीय वोट का आंकड़ा सत्ता के लिए एक राजनीतिक सवाल जरूर छोड़ता है।

फैसले सरकार लेती है, लेकिन उनका हिसाब मतदाता रखता है।

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here