मर्यादा का पाठ पढ़ाकर सत्ता को दिखाया आईना
सवर्णों के सवाल पर भी उठाई आवाज
एससी-एसटी संशोधन से लेकर यूजीसी के प्रावधानों तक विवादों के बीच पूर्व भाजपा अध्यक्ष का बयान अहम, बोले- विपक्ष ही नहीं, सत्ता पक्ष को भी मर्यादा का पालन करना चाहिए
भारतीय राजनीति में कुछ आवाजें ऐसी होती हैं, जिनकी अहमियत उनके पद से कहीं अधिक उनके अनुभव, वैचारिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक कद से तय होती है। भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी की आवाज भी उन्हीं में से एक है। जब पार्टी का कोई वरिष्ठ नेता अपनी ही सरकार को मर्यादा का पाठ पढ़ाता है तो उसके शब्दों को महज सामान्य राजनीतिक बयान मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब यह नसीहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के कामकाज और उसके राजनीतिक फैसलों से जुड़े सवालों के बीच सामने आए।
डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मर्यादा का स्मरण कराते हुए कहा कि मर्यादा का पालन सभी को करना चाहिए। भगवान श्रीराम स्वयं मर्यादा का पालन करते रहे। सभी को उनके आदर्शों का अनुसरण करते हुए मर्यादा में रहना चाहिए। उनसे जब मौजूदा परिस्थितियों और सवर्ण समाज के साथ हो रहे कथित अन्याय तथा अत्याचारों के संदर्भ में सवाल किया गया तो उनका जवाब भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था। उन्होंने स्पष्ट किया कि मर्यादा का पालन केवल विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि सत्ता पक्ष के लिए भी उतना ही आवश्यक है।
जोशी का यह कथन सीधे तौर पर उस राजनीतिक सोच पर सवाल खड़ा करता है, जिसमें सत्ता में बैठे लोगों के फैसलों को अंतिम सत्य मान लेने और असहमति के सवालों को राजनीतिक चश्मे से देखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। लोकतंत्र में सरकार का काम केवल बहुमत के आधार पर निर्णय लेना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि उसके निर्णयों से किसी वर्ग के मन में उपेक्षा, असुरक्षा अथवा भेदभाव की भावना पैदा न हो।
एससी-एसटी संशोधन और यूजीसी के सवाल पर सरकार की जवाबदेही
मोदी सरकार के कार्यकाल में एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून में वर्ष 2018 में किए गए संशोधन को लेकर देशभर में बहस और विरोध देखने को मिला था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संसद ने कानून में संशोधन कर गिरफ्तारी और अग्रिम जमानत से संबंधित प्रावधानों को फिर से मजबूत किया। इस फैसले को सामाजिक न्याय की दिशा में जरूरी कदम बताने वाले भी थे, तो इसके दुरुपयोग की आशंका जताने वाले वर्गों ने अपनी चिंताएं भी सामने रखीं।
सवाल यह नहीं है कि कमजोर और वंचित वर्गों को कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए या नहीं। निश्चित रूप से मिलना चाहिए। सवाल यह है कि कानून का संरक्षण किसी एक वर्ग के लिए न्याय का माध्यम बने, लेकिन दूसरे वर्ग के निर्दोष लोगों के लिए भय और असुरक्षा का कारण न बन जाए। कानून की निष्पक्षता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। किसी भी कानून के दुरुपयोग की आशंका को नजरअंदाज करना न्याय के मूल सिद्धांतों के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।
इसी तरह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से जुड़े नियमों और प्रस्तावों को लेकर भी उच्च शिक्षा जगत में समय-समय पर विवाद और असंतोष सामने आया है। विश्वविद्यालयों में समानता और भेदभाव से सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन इन उद्देश्यों को पूरा करने वाली व्यवस्था ऐसी भी होनी चाहिए, जिसमें सभी पक्षों को निष्पक्ष सुनवाई और न्याय का भरोसा मिले। किसी भी सामाजिक समूह की शिकायत को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह राजनीतिक रूप से सुविधाजनक विमर्श का हिस्सा नहीं है।
सरकार को यह समझना होगा कि सामाजिक न्याय का अर्थ एक वर्ग के अधिकारों की रक्षा करते हुए दूसरे वर्ग की चिंताओं को अनसुना करना नहीं है। न्याय का सिद्धांत सबके लिए समान होना चाहिए। यदि किसी कानून या व्यवस्था के कारण समाज के किसी हिस्से में लगातार असंतोष पैदा हो रहा है तो सरकार का दायित्व है कि वह संवाद करे, समीक्षा करे और जहां जरूरी हो वहां सुधार भी करे।
क्या सत्ता के लिए मर्यादा के मायने बदल जाते हैं?
मुरली मनोहर जोशी की नसीहत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है कि मर्यादा का पालन केवल विपक्ष को नहीं, सत्ता पक्ष को भी करना चाहिए। यह बात भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी भावना से जुड़ी है। विपक्ष सरकार की आलोचना करे तो उसे लोकतांत्रिक अधिकार माना जाता है, लेकिन जब समाज का कोई वर्ग सरकार के फैसलों पर सवाल उठाए तो उसकी आवाज को संदेह या विरोध की नजर से क्यों देखा जाए?
लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है, जनता सरकार के प्रति नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अनेक अवसरों पर सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास की बात कही है। लेकिन इस नारे की वास्तविक परीक्षा उन परिस्थितियों में होती है, जब सरकार के फैसलों से किसी वर्ग में असंतोष पैदा होता है। तब सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह उस असंतोष को सुने और उसका समाधान तलाशे।
सवर्ण समाज के भीतर भी कानूनों के कथित दुरुपयोग, आरक्षण व्यवस्था, शैक्षणिक अवसरों और सामाजिक सम्मान से जुड़े सवाल उठते रहे हैं। इन सवालों को केवल राजनीतिक विरोध या किसी वर्ग विशेष की नाराजगी बताकर टाल देना समस्या का समाधान नहीं है। संविधान सभी नागरिकों को समानता, सम्मान और न्याय का अधिकार देता है। इस अधिकार की रक्षा जाति देखकर नहीं की जा सकती।
यह भी जरूरी है कि सवर्ण समाज के नाम पर किसी अन्य वर्ग के अधिकारों को कम करने की मांग न उठे। सामाजिक न्याय की लड़ाई किसी वर्ग के विरुद्ध नहीं, बल्कि अन्याय और भेदभाव के विरुद्ध होनी चाहिए। इसी कसौटी पर सरकार की नीतियों को परखा जाना चाहिए।
राम के आदर्शों की बात करने वाली सरकार राम की मर्यादा भी अपनाए
भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक विमर्श में भगवान श्रीराम, रामराज्य और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का विशेष स्थान रहा है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर सरकार ने अपनी उपलब्धियों को देश के सामने प्रमुखता से रखा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब राजनीतिक मंचों पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों का उल्लेख किया जाता है तो शासन और प्रशासन में भी उन आदर्शों का पालन क्यों न हो?
भगवान श्रीराम की मर्यादा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि सत्ता के आचरण, कर्तव्य, न्याय और उत्तरदायित्व का भी प्रतीक है। राम ने सत्ता को अधिकार नहीं, दायित्व माना। उन्होंने व्यक्तिगत हितों से ऊपर लोकमर्यादा को स्थान दिया। ऐसे में राम के नाम पर राजनीति करने वालों से यह अपेक्षा करना अनुचित नहीं कि वे आलोचना सुनने, असहमति का सम्मान करने और न्यायपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदर्शित करें।
डॉ. मुरली मनोहर जोशी का बयान इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। वह भाजपा के उन वरिष्ठ नेताओं में रहे हैं, जिन्होंने पार्टी को वैचारिक और संगठनात्मक रूप से मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐसे नेता का यह कहना कि सत्ता पक्ष को भी मर्यादा में रहना चाहिए, सरकार के लिए आत्ममंथन का अवसर है।
सिर्फ बहुमत नहीं, न्यायपूर्ण व्यवहार भी जरूरी
लोकतंत्र में बहुमत सरकार बनाने का अधिकार देता है, लेकिन मनमाने ढंग से शासन करने का लाइसेंस नहीं। सरकार की असली ताकत उसके समर्थकों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके निर्णयों की निष्पक्षता और जनता के विश्वास से तय होती है। यदि कोई वर्ग अपने साथ अन्याय महसूस करता है तो उसकी शिकायत सुनना सरकार की कमजोरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुरली मनोहर जोशी की इस नसीहत को राजनीतिक बयान से अधिक एक वैचारिक संदेश के रूप में लेना चाहिए। सवर्ण समाज की चिंताओं को भी उतनी ही गंभीरता से सुना जाना चाहिए, जितनी गंभीरता से अन्य सामाजिक वर्गों की समस्याओं को सुना जाता है। कानून का उद्देश्य न्याय होना चाहिए, किसी वर्ग में भय पैदा करना नहीं।
आखिरकार मर्यादा का अर्थ यही है कि सत्ता अपने अधिकारों की सीमा पहचाने, विपक्ष अपनी जिम्मेदारी समझे और सरकार हर नागरिक के प्रति निष्पक्ष रहे। भगवान श्रीराम के आदर्शों का उल्लेख करने वाली सरकार के लिए यह सवाल और भी महत्वपूर्ण है। मुरली मनोहर जोशी ने अपनी बात कह दी है। अब देखना यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार इस नसीहत को सुनती है या इसे भी राजनीतिक शोर समझकर अनसुना कर देती है।
सनातन जन का रुख:
सत्ता में होना मर्यादा से ऊपर होना नहीं है!
भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मर्यादा का स्मरण कराया है। उनका स्पष्ट संदेश है कि मर्यादा का पालन विपक्ष ही नहीं, सत्ता पक्ष को भी करना चाहिए।
एससी-एसटी संशोधन, यूजीसी विवाद और सवर्ण समाज की चिंताओं के बीच आखिर इस नसीहत के राजनीतिक मायने क्या हैं?
क्या सरकार अपने फैसलों पर उठ रहे सवालों का जवाब देगी?
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