Advertisement
Home Uttar Pradesh News Ayodhya आडवाणी वाला इतिहास दोहराएगा भाजपा? मोदी के सामने योगी की चुनौती!

आडवाणी वाला इतिहास दोहराएगा भाजपा? मोदी के सामने योगी की चुनौती!

0
167

आडवाणी के बाद क्या अब नरेंद्र मोदी की बारी है? एससी-एसटी एक्ट, यूजीसी विवाद और सवर्णों की नाराजगी के बीच भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा तेज। 2027 यूपी चुनाव और 2029 में योगी आदित्यनाथ की प्रधानमंत्री पद की संभावित दावेदारी पर विशेष राजनीतिक विश्लेषण।

आडवाणी के बाद अब मोदी की बारी? जिन्ना से यूजीसी तक

12 साल में बदली सियासत की पटकथा

सवर्णों की नाराजगी, यूजीसी विवाद और एससी-एसटी कानून पर उठते सवालों ने भाजपा के सामने खड़ी की नई चुनौती; 2027 में योगी की जीत तय करेगी 2029 की सियासी दिशा, मोदी के उत्तराधिकारी को लेकर पार्टी में बढ़ सकती है खींचतान

Advertisment

लेखक: भृगु नागर | सनातन जन

भारतीय राजनीति में सत्ता का शिखर जितना आकर्षक होता है, वहां से नीचे उतरने का खतरा भी उतना ही बड़ा होता है। इतिहास गवाह है कि राजनीतिक दलों में किसी नेता का कद कितना भी बड़ा क्यों न हो, जब उसकी स्वीकार्यता, विश्वसनीयता और चुनाव जिताने की क्षमता पर सवाल उठने लगते हैं तो उसी दल में उसके विकल्प की तलाश शुरू हो जाती है। भारतीय जनता पार्टी में लालकृष्ण आडवाणी से नरेंद्र मोदी तक का राजनीतिक सफर इसी सियासी सच्चाई की एक बड़ी मिसाल है।

याद कीजिए 2005 का वह दौर, जब भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष और पार्टी के सबसे बड़े नेताओं में शुमार लालकृष्ण आडवाणी पाकिस्तान पहुंचे थे। कराची में उन्होंने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर जाकर श्रद्धांजलि दी और जिन्ना की धर्मनिरपेक्षता संबंधी टिप्पणी की। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भीतर इस बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रिया हुई। आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि पार्टी के प्रस्ताव के बाद उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया, लेकिन उनके राजनीतिक व्यक्तित्व पर इस विवाद का गहरा असर पड़ा। आडवाणी कभी भाजपा के सबसे बड़े राजनीतिक चेहरे थे। राम मंदिर आंदोलन से लेकर पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने तक उनकी भूमिका निर्णायक रही थी। अटल बिहारी वाजपेयी के बाद उन्हें प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार माना जाता था। लेकिन 2014 आते-आते तस्वीर बदल चुकी थी। भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया और लोकसभा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा। आडवाणी सांसद जरूर बने, लेकिन पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्व की भूमिका से धीरे-धीरे बाहर होते चले गए। अब सवाल यह है कि क्या इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराने की तैयारी कर रहा है? क्या जिस भाजपा में कभी आडवाणी की राजनीतिक स्वीकार्यता पर सवाल उठने के बाद नेतृत्व का नया चेहरा सामने आया था, उसी भाजपा में अब नरेंद्र मोदी की विश्वसनीयता और राजनीतिक स्वीकार्यता को लेकर नई बहस खड़ी हो रही है?

आडवाणी से मोदी तक

आडवाणी और मोदी के राजनीतिक विवादों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। आडवाणी के मामले में जिन्ना संबंधी बयान ने उनकी वैचारिक विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए थे। दूसरी तरफ आज मोदी सरकार के सामने सामाजिक और नीतिगत फैसलों से पैदा हुआ असंतोष चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। मोदी ने 2014 में भाजपा को ऐतिहासिक बहुमत दिलाया। 2019 में भी पार्टी ने पहले से बड़ी जीत दर्ज की। 2024 में तीसरी बार सरकार बनी, लेकिन भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोग से सरकार बनानी पड़ी। इसे केवल चुनावी आंकड़ों का अंतर मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह संकेत था कि भाजपा के सामने नए राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं। इस बदलाव के बीच एक ऐसा वर्ग भी है, जिसे भाजपा लंबे समय तक अपना भरोसेमंद मतदाता मानती रही है। वह है सवर्ण समाज। इसी वर्ग के एक हिस्से में एससी-एसटी अधिनियम में 2018 के संशोधन और यूजीसी के नए नियमों को लेकर नाराजगी सामने आई है।

सवर्णों में क्यों बढ़ी नाराजगी?

एससी-एसटी अधिनियम को लेकर विवाद की जड़ 2018 के घटनाक्रम में है। मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में गिरफ्तारी संबंधी कुछ सुरक्षा उपायों की व्यवस्था की थी। इसके बाद केंद्र की मोदी सरकार ने संसद में संशोधन विधेयक लाकर अधिनियम के मूल प्रावधानों को प्रभावी रूप से बहाल किया। सरकार का तर्क था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को अत्याचारों से संरक्षण देने वाले कानून की प्रभावशीलता बनाए रखना जरूरी है। लेकिन इस संशोधन के बाद सामान्य वर्ग के कुछ संगठनों और लोगों में यह धारणा मजबूत हुई कि कानून के दुरुपयोग की आशंकाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। फर्जी मुकदमों, गिरफ्तारी और कानूनी संरक्षण को लेकर उनकी शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।

इसके बाद यूजीसी के 2026 के इक्विटी विनियमों ने इस असंतोष को एक नया राजनीतिक आयाम दे दिया। विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से 13 जनवरी 2026 को नए नियम अधिसूचित किए गए। इन नियमों के कुछ प्रावधानों को सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों और संगठनों ने भेदभावपूर्ण तथा दुरुपयोग की आशंका वाला बताया। विवाद इतना बढ़ा कि मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। 29 जनवरी को शीर्ष अदालत ने इन नियमों पर रोक लगा दी और 2012 के पुराने विनियमों को फिलहाल लागू रखने का आदेश दिया। अदालत ने नए नियमों की भाषा और संभावित दुरुपयोग को लेकर गंभीर सवाल भी उठाए। अगस्त में केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि वह इन नियमों पर पुनर्विचार कर रही है।

यह घटनाक्रम मोदी सरकार के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। जिस मुद्दे को विश्वविद्यालयों में समानता और भेदभाव रोकने की व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वही सामान्य वर्ग के एक हिस्से में असंतोष का कारण बन गया। दूसरी ओर, इन नियमों का समर्थन करने वाले सामाजिक वर्गों की अपनी चिंताएं भी हैं। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती है कि वह किसी एक वर्ग की शिकायत को सुनते हुए दूसरे वर्ग के संवैधानिक अधिकारों और सुरक्षा को कमजोर न होने दे।

मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती

मोदी की राजनीतिक ताकत का एक बड़ा आधार यह रहा कि उन्होंने जातीय समीकरणों से ऊपर उठकर हिंदुत्व और राष्ट्रीय पहचान की राजनीति को प्रभावी बनाया। भाजपा के समर्थन में अलग-अलग जातियों और समुदायों के मतदाता एक मंच पर आए। यही सामाजिक गठजोड़ भाजपा की चुनावी सफलता की बड़ी वजह बना। लेकिन आज सवाल उठ रहा है कि क्या यह गठजोड़ पहले की तरह मजबूत है?

यदि सामान्य वर्ग का एक हिस्सा यह महसूस करने लगे कि उसकी शिकायतों को सरकार सुनने के लिए तैयार नहीं है, तो उसका असर केवल एक चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा। खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां जातीय समीकरण चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं, इस नाराजगी को नजरअंदाज करना भाजपा के लिए भारी पड़ सकता है। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि पूरा सवर्ण समाज भाजपा से दूर हो चुका है या मोदी की लोकप्रियता समाप्त हो गई है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि भाजपा के पारंपरिक समर्थक वर्गों में असंतोष की चर्चा अब राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी है।

हिंदुस्तान टाइम्स की 11 सितंबर 2026 की रिपोर्ट में भी भाजपा के सामने यूजीसी विवाद, युवाओं में रोजगार को लेकर नाराजगी, आरक्षण संबंधी असहजता और कार्यकर्ताओं की थकान को 2027 के चुनाव की प्रमुख चुनौतियों में गिना गया। यानी ये चिंताएं केवल विपक्ष का राजनीतिक प्रचार नहीं हैं, पार्टी के भीतर भी इन पर विचार हो रहा है।

75 की उम्र और सत्ता का मोह

नरेंद्र मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को हुआ था। वह 76 वर्ष के हो चुके हैं। यहां एक दिलचस्प राजनीतिक सवाल भी खड़ा होता है। भाजपा में 75 वर्ष की आयु को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय सत्ता की राजनीति से अलग भूमिका में रखा गया था। हालांकि भाजपा के संविधान में 75 वर्ष की आयु पर प्रधानमंत्री या किसी नेता के लिए स्वतः पद छोड़ने का कोई बाध्यकारी नियम नहीं है। इसलिए मोदी के लिए भी यह कोई कानूनी या संवैधानिक बाध्यता नहीं है। फिर भी राजनीति में नैतिकता और स्थापित परंपराओं का अपना महत्व होता है। सवाल यह है कि यदि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के लिए उम्र को लेकर एक राजनीतिक मानदंड बनाया गया था तो क्या मोदी के मामले में भी उस पर चर्चा नहीं होनी चाहिए? क्या पार्टी में नई पीढ़ी को नेतृत्व सौंपने का समय नहीं आ गया है? या फिर मोदी का राजनीतिक कद इतना बड़ा हो चुका है कि भाजपा में कोई उनके उत्तराधिकारी की बात करने का साहस नहीं जुटा पा रहा?

मोदी के बाद किसकी बारी?

भाजपा की मौजूदा राजनीति में यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। मोदी के बाद प्रधानमंत्री पद का चेहरा कौन होगा? क्या पार्टी किसी ऐसे नेता को आगे बढ़ाएगी जो वर्तमान केंद्रीय नेतृत्व और मोदी के करीबी राजनीतिक समूह की पसंद हो, या फिर नेतृत्व का फैसला व्यापक संगठनात्मक और राजनीतिक स्वीकार्यता के आधार पर होगा? इसी संदर्भ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम सबसे अधिक चर्चा में आता है। योगी केवल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं हैं। उनका अपना स्वतंत्र राजनीतिक आधार है। हिंदुत्व की राजनीति में उनकी पहचान, प्रशासनिक छवि और समर्थकों के बीच लोकप्रियता उन्हें भाजपा के दूसरे नेताओं से अलग स्थान देती है। वह उन नेताओं में हैं जिनके समर्थन का आधार केवल केंद्रीय नेतृत्व की कृपा पर निर्भर नहीं दिखाई देता। यही वजह है कि प्रधानमंत्री पद के संभावित उत्तराधिकार की चर्चा में योगी का नाम बार-बार सामने आता है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि योगी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी अभी कोई घोषित पार्टी निर्णय नहीं है। भाजपा ने उन्हें भविष्य का प्रधानमंत्री चेहरा घोषित नहीं किया है। उनके सामने भी कई राजनीतिक और संगठनात्मक चुनौतियां हैं। फिर भी 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव उनके राजनीतिक भविष्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होगा।

2027 बनेगा मोदी की परीक्षा का साल?

उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए केवल एक राज्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सत्ता की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। 80 लोकसभा सीटों वाला यह राज्य 2029 के आम चुनाव की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश में बड़ा झटका लगा था। समाजवादी पार्टी ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया और भाजपा की सीटें काफी घट गईं। इसके बाद राज्य में संगठन और सरकार के बीच तालमेल, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज हुईं।

अक्टूबर 2026 में इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा ने उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक असंतोष दूर करने के लिए वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकें और फीडबैक प्रक्रिया शुरू की है। पार्टी कार्यकर्ताओं ने नेतृत्व और सरकार के कुछ स्तरों पर उपेक्षा की शिकायतें भी उठाई हैं।

यह बताता है कि 2027 का चुनाव भाजपा के लिए सामान्य चुनाव नहीं होगा।

यदि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा उत्तर प्रदेश में मजबूत जीत हासिल करती है तो उनकी राजनीतिक हैसियत निश्चित रूप से बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में 2029 के नेतृत्व और प्रधानमंत्री पद के उत्तराधिकार की बहस को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

इसके विपरीत, यदि भाजपा को बड़ा झटका लगता है तो योगी की राजनीतिक स्थिति पर भी सवाल उठेंगे और उनके विरोधियों को अपनी दलील मजबूत करने का अवसर मिलेगा।

मोदी और योगी के बीच असली सवाल

भाजपा की राजनीति में मोदी और योगी को दो अलग-अलग राजनीतिक केंद्रों के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। हालांकि दोनों के बीच किसी निर्णायक टकराव का सार्वजनिक प्रमाण नहीं है, लेकिन पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर चर्चाएं लगातार होती रही हैं।

एक तरफ मोदी का राष्ट्रीय नेतृत्व और उनका व्यापक चुनावी प्रभाव है। दूसरी तरफ योगी की अपनी राजनीतिक पहचान और उत्तर प्रदेश में उनकी भूमिका है।

राजनीति के जानकारों के सामने सवाल यह है कि 2029 के लिए भाजपा किस तरह का नेतृत्व तैयार करेगी? क्या पार्टी मोदी के बाद भी उसी राजनीतिक शैली और नेतृत्व व्यवस्था को जारी रखेगी या कोई नया चेहरा सामने लाएगी?

इस सवाल का जवाब केवल दिल्ली में बैठकर नहीं मिलेगा। उत्तर प्रदेश का चुनाव इसमें बड़ी भूमिका निभाएगा।

यह भी संभव है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व किसी तीसरे चेहरे को आगे बढ़ाए। इसलिए मोदी के बाद प्रधानमंत्री पद की दौड़ को केवल योगी बनाम मोदी समर्थक गुट के रूप में देखना राजनीतिक वास्तविकता को सीमित करना होगा।

भाजपा के अस्तित्व से बड़ा कोई नेता नहीं

भाजपा के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह सत्ता और संगठन के बीच संतुलन बनाए रखे। किसी भी राजनीतिक दल का अस्तित्व किसी एक नेता से बड़ा होता है। यदि पार्टी का पूरा राजनीतिक भविष्य एक व्यक्ति की लोकप्रियता और स्वीकार्यता पर निर्भर होने लगे तो उसके सामने उत्तराधिकार का संकट पैदा होना स्वाभाविक है।

मोदी ने भाजपा को राष्ट्रीय राजनीति में जिस ऊंचाई तक पहुंचाया, उसे नकारा नहीं जा सकता। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि उनके नेतृत्व की नीतियों और फैसलों पर सवाल नहीं उठाए जा सकते।

एससी-एसटी कानून को लेकर शिकायतें, यूजीसी के नियमों पर विवाद, सामान्य वर्ग के एक हिस्से की नाराजगी, युवाओं के रोजगार की चिंता और उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक असंतोष ऐसे मुद्दे हैं जिनका राजनीतिक समाधान जरूरी है।

सरकार के लिए सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब वह आलोचना को विरोध समझने लगती है और असंतोष को केवल विपक्ष की साजिश मानकर खारिज कर देती है। सत्ता में बैठे व्यक्ति के लिए अपने पक्ष में आने वाली खबरों से ज्यादा जरूरी उन आवाजों को सुनना होता है जो उसके फैसलों पर सवाल उठा रही हों।

2029 की पटकथा 2027 में लिखी जाएगी

आज की तारीख में यह कहना संभव नहीं है कि 2029 में मोदी प्रधानमंत्री पद का चेहरा होंगे या नहीं। यह भी तय नहीं है कि योगी आदित्यनाथ को पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया जाएगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि भाजपा के सामने नेतृत्व की अगली पीढ़ी तैयार करने का सवाल अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

आडवाणी के दौर में पार्टी ने नेतृत्व परिवर्तन का रास्ता चुना था। 2014 में मोदी के नेतृत्व ने भाजपा को नई राजनीतिक ऊर्जा दी। अब वही पार्टी एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहां उसे भविष्य की राजनीति का खाका तैयार करना होगा।

क्या मोदी अपनी राजनीतिक विरासत को किसी मजबूत उत्तराधिकारी के हाथों सौंपने का रास्ता तैयार करेंगे? क्या योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में जीत के बाद राष्ट्रीय राजनीति में और मजबूत होकर उभरेंगे? क्या भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व किसी नए चेहरे पर दांव लगाएगा?

इन सवालों का जवाब आने वाले समय में मिलेगा।

लेकिन एक बात साफ है—भाजपा की राजनीति में कोई भी नेता स्थायी नहीं है। आडवाणी का दौर इसका उदाहरण है और मोदी का भविष्य भी इसी राजनीतिक कसौटी पर परखा जाएगा।

2027 का चुनाव केवल उत्तर प्रदेश की सत्ता का फैसला नहीं करेगा। यह भाजपा के भीतर नेतृत्व की अगली लड़ाई की दिशा भी तय कर सकता है। 2029 में मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ा जाएगा या भाजपा किसी नए चेहरे के साथ मैदान में उतरेगी, इसकी पटकथा काफी हद तक उत्तर प्रदेश में ही लिखी जाएगी।

मोदी सरकार को मुरली मनोहर जोशी की नसीहत

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here