Advertisement
Home Religious Dharm-Sanskriti अर्जुन ने पूरी की प्रतिज्ञा, जयद्रथ का किया वध

अर्जुन ने पूरी की प्रतिज्ञा, जयद्रथ का किया वध

0
64

अभिमन्यु वध का प्रतिशोध:

महाभारत युद्ध के सबसे मार्मिक और निर्णायक प्रसंगों में से एक अभिमन्यु वध और उसके बाद अर्जुन द्वारा जयद्रथ के वध की घटना को माना जाता है। यह प्रसंग न केवल युद्ध की दिशा बदलने वाला साबित हुआ, बल्कि पिता-पुत्र के संबंध, प्रतिशोध और धर्मयुद्ध के संकल्प का भी प्रतीक बन गया।

युद्ध के दौरान जब अर्जुन रणभूमि के दूसरे छोर पर व्यस्त थे, तब कौरव पक्ष के सेनापति द्रोणाचार्य ने पांडव सेना को पराजित करने के उद्देश्य से चक्रव्यूह की रचना की। अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु को चक्रव्यूह में प्रवेश करने की कला ज्ञात थी, लेकिन उससे बाहर निकलने की पूर्ण विधि का ज्ञान नहीं था। इसके बावजूद युवा योद्धा अभिमन्यु ने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए चक्रव्यूह में प्रवेश किया और कौरव सेना के कई महारथियों को चुनौती दी। अभिमन्यु ने चक्रव्यूह के अनेक स्तरों को भेदते हुए कौरव सेना में भारी क्षति पहुंचाई। किंतु अंततः वह अकेला पड़ गया। युद्ध के नियमों की अनदेखी करते हुए कई महारथियों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। संघर्ष के दौरान अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुआ। यह समाचार जब अर्जुन तक पहुंचा तो वे शोक और क्रोध से भर उठे।अर्जुन ने युद्धभूमि में प्रतिज्ञा की कि यदि अगले दिन सूर्यास्त से पहले वे जयद्रथ का वध नहीं कर सके, तो स्वयं अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्याग देंगे। अर्जुन की इस घोषणा से कौरव पक्ष में हलचल मच गई। जयद्रथ को अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी और उसके संरक्षण के लिए विशेष रणनीति बनाई गई।

Advertisment

अगले दिन कौरव सेना ने जयद्रथ को कड़े सुरक्षा घेरे में रखा। अर्जुन लगातार युद्ध करते हुए अपने लक्ष्य तक पहुंचने का प्रयास करते रहे, लेकिन समय तेजी से बीत रहा था। जैसे-जैसे सूर्यास्त का समय निकट आता गया, पांडव पक्ष की चिंता बढ़ती गई।

इसी बीच श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से ऐसा वातावरण निर्मित किया कि सूर्य बादलों में छिप गया और सभी को सूर्यास्त होने का भ्रम होने लगा। कौरव पक्ष ने इसे अर्जुन की प्रतिज्ञा विफल होने का संकेत माना। जयद्रथ भी अपने सुरक्षा घेरे से बाहर निकल आया और स्वयं को सुरक्षित समझने लगा।

तभी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अवसर का संकेत दिया। कुछ ही क्षणों बाद बादल हटे और सूर्य पुनः दिखाई देने लगा। अर्जुन ने तत्काल अपना गांडीव उठाया और लक्ष्य साधा। श्रीकृष्ण ने उन्हें जयद्रथ के पिता को प्राप्त वरदान की जानकारी भी दी, जिसके अनुसार जयद्रथ का सिर भूमि पर गिराने वाले का भी विनाश हो सकता था।

इसके बाद अर्जुन ने दिव्य अस्त्र का प्रयोग करते हुए ऐसा बाण छोड़ा जिसने जयद्रथ का मस्तक धड़ से अलग कर दिया। कथा के अनुसार वह मस्तक दूर तपस्या में लीन उसके पिता की गोद में जा गिरा। जब वे अचानक उठे तो मस्तक भूमि पर गिर पड़ा और वरदान के प्रभाव से उनका भी अंत हो गया। इस प्रकार अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की और अभिमन्यु की मृत्यु का प्रतिशोध लिया। महाभारत का यह प्रसंग आज भी संकल्प, वीरता, रणनीति और धर्मयुद्ध के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता है। अभिमन्यु वध, जयद्रथ वध, अर्जुन की प्रतिज्ञा, महाभारत युद्ध, श्रीकृष्ण की रणनीति, चक्रव्यूह, कुरुक्षेत्र युद्ध, पांडव, कौरव, महाभारत कथा, अभिमन्यु, अर्जुन, जयद्रथ, भारतीय महाकाव्य, धार्मिक कथा

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here