Advertisement
Home International क्या अंबानी हैं भारत के असली बॉस?

क्या अंबानी हैं भारत के असली बॉस?

0
60

स्टारलिंक पर मस्क के वार से छिड़ी नई जंग

सरकार ने मस्क के ‘ओलिगार्क’ वाले आरोप को बताया बेबुनियाद, कुछ घंटे बाद मस्क ने सीधे मुकेश अंबानी का नाम लेकर पूछा—स्टारलिंक को पांच साल बाद भी भारत में सेवा शुरू करने की अनुमति क्यों नहीं

नई दिल्ली। भारत के तेजी से बढ़ते दूरसंचार बाजार में अब मुकाबला सिर्फ कारोबार का नहीं, बल्कि नियमन और प्रभाव के सवाल तक पहुंच गया है। स्टारलिंक के भारत में वाणिज्यिक संचालन की मंजूरी में हो रही देरी पर स्पेसएक्स के प्रमुख एलन मस्क ने सीधे रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी को निशाने पर लेते हुए पूछा है—“क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं?” यह सवाल उन्होंने तब उठाया जब केंद्र सरकार ने स्टारलिंक को कथित तौर पर घरेलू उद्योगपतियों द्वारा रोके जाने के आरोपों को खारिज कर दिया।

Advertisment

मस्क ने एक्स पर कहा कि स्टारलिंक को 165 से अधिक देशों में लाइसेंस प्राप्त है और कंपनी पिछले करीब पांच वर्षों से भारत सरकार के नियमों और आवश्यकताओं को पूरा करने में लगी है। इसके बावजूद भारत में सेवा शुरू करने की प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं हो पा रही, यह उनका सवाल है।

पहले ‘ओलिगार्क’, फिर अंबानी का नाम

मस्क ने इससे पहले बिना किसी उद्योगपति का नाम लिए आरोप लगाया था कि कुछ बड़े कारोबारी हित स्टारलिंक को भारत में आने से रोक रहे हैं ताकि भारतीय उपभोक्ताओं पर अपना “एकाधिकार” बनाए रखा जा सके। मस्क ने इसे भारतीय लोगों के हितों के खिलाफ बताया था। हालांकि उस समय उन्होंने अंबानी या किसी दूसरी कंपनी का नाम नहीं लिया था।

सरकार के खंडन के कुछ घंटे बाद मस्क ने अपने अगले संदेश में पहली बार मुकेश अंबानी का नाम लेकर सवाल खड़ा कर दिया। इससे स्टारलिंक विवाद सीधे रिलायंस जियो बनाम विदेशी सैटेलाइट इंटरनेट कंपनी की संभावित प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जाने लगा है।

सरकार ने दिया दो टूक जवाब

संचार मंत्रालय ने मस्क के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भारत का दूरसंचार और सैटेलाइट संचार नियामकीय ढांचा निष्पक्ष और भेदभावरहित है। मंत्रालय के अनुसार, तीन सैटेलाइट संचार कंपनियों को लाइसेंस दिए जा चुके हैं और तीनों को सुरक्षा संबंधी शर्तें पूरी करनी हैं।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सरकार के मुताबिक स्टारलिंक, रिलायंस जियो और भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब तीनों फिलहाल लगभग एक ही नियामकीय चरण में हैं। तीनों के सुरक्षा आकलन की प्रक्रिया चल रही है। सुरक्षा प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पेक्ट्रम आवंटन की अगली प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

इसलिए मामला यह नहीं है कि स्टारलिंक को भारत में कोई दूरसंचार लाइसेंस ही नहीं मिला। असली अड़चन सुरक्षा मंजूरी और उसके बाद स्पेक्ट्रम आवंटन की है।

अंबानी की कंपनी भी मैदान में

मस्क के सवाल का सबसे बड़ा कारोबारी संदर्भ रिलायंस जियो है। मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो भारत के प्रमुख दूरसंचार खिलाड़ियों में है और वह भी सैटेलाइट इंटरनेट के क्षेत्र में उतरने की तैयारी कर रही है। दूसरी ओर भारती समूह यूटेलसैट वनवेब से जुड़ा है। यानी जिस बाजार में स्टारलिंक प्रवेश करना चाहता है, वहां उसके सामने पहले से स्थापित भारतीय कारोबारी समूहों से जुड़ी कंपनियां भी मौजूद हैं।

दिलचस्प यह भी है कि जियो और एयरटेल दोनों ने स्टारलिंक के भारत में प्रवेश के रास्ते में सहयोग की भूमिका भी निभाई है। इससे तस्वीर केवल सीधी प्रतिस्पर्धा की नहीं, बल्कि सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों की बनती है।

स्पेक्ट्रम पर पहले भी आमने-सामने

स्टारलिंक और भारतीय दूरसंचार कंपनियों के बीच सैटेलाइट स्पेक्ट्रम को लेकर पहले भी मतभेद सामने आ चुके हैं। स्टारलिंक प्रशासनिक तरीके से स्पेक्ट्रम आवंटन के पक्ष में था, जबकि रिलायंस जियो ने नीलामी की वकालत की थी। बाद में भारत ने सैटेलाइट स्पेक्ट्रम को प्रशासनिक तरीके से आवंटित करने का रास्ता चुना।

यही वजह है कि भारत के सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में आने वाले वर्षों की प्रतिस्पर्धा बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ग्रामीण, पहाड़ी और दूरदराज के ऐसे इलाकों में जहां फाइबर या मोबाइल टावर पहुंचाना मुश्किल है, सैटेलाइट इंटरनेट बड़ा विकल्प बन सकता है।

स्टारलिंक भी भारत के लिए तैयार

स्टारलिंक का दावा है कि उसने भारतीय नियमों और सुरक्षा जरूरतों के मुताबिक अपना ढांचा तैयार किया है। कंपनी के अनुसार भारत में 20 से अधिक गेटवे साइट और सैकड़ों एंटेना तैयार किए जा चुके हैं। कंपनी ने भारतीय उपयोगकर्ताओं के डेटा को देश के भीतर रखने और भारत की सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीकी नियंत्रण तैयार करने की बात भी कही है।

भारत में स्टारलिंक की कोशिश नई नहीं है। कंपनी ने 2021 में भारतीय बाजार में प्रवेश की प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन आवश्यक अनुमति मिलने से पहले प्री-ऑर्डर लेने के मामले में उसे सरकार की आपत्ति का सामना करना पड़ा था और 2022 में प्री-ऑर्डर राशि वापस करनी पड़ी थी।

‘असली बॉस’ वाले सवाल का जवाब क्या?

मस्क का सवाल राजनीतिक और कारोबारी बहस को जरूर तेज करता है, लेकिन उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना अभी संभव नहीं है कि मुकेश अंबानी ने स्टारलिंक को रोकने के लिए सरकार या नियामकों पर प्रभाव डाला है। सरकार ने ऐसे आरोपों को स्पष्ट रूप से खारिज किया है और कहा है कि तीनों लाइसेंसधारी कंपनियां लगभग समान नियामकीय स्थिति में हैं।

लेकिन मस्क का सवाल भारत के दूरसंचार बाजार में एक बड़ा प्रश्न जरूर खड़ा करता है—जब दुनिया की सबसे बड़ी सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों में से एक भारतीय बाजार में प्रवेश के लिए तैयार है, तो सुरक्षा मंजूरियों और स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया आखिर कितनी तेज और पारदर्शी होनी चाहिए?

यही वह सवाल है जिस पर आने वाले दिनों में सरकार, दूरसंचार कंपनियों और नियामकों को और स्पष्टता देनी पड़ सकती है। फिलहाल इतना तय है कि स्टारलिंक बनाम भारतीय दूरसंचार दिग्गजों की यह लड़ाई सिर्फ इंटरनेट सेवा की प्रतिस्पर्धा नहीं रही; यह भारत के भविष्य के सैटेलाइट इंटरनेट बाजार के नियंत्रण और नियमों की दिशा से भी जुड़ गई है।

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here