
सवर्णों की नाराजगी से बेपरवाह मोदी सरकार!
एससी-एसटी संशोधन से यूजीसी नियमों तक उठे सवाल, सवर्ण समाज में बढ़ता असंतोष, सरकार की चुप्पी और 2027 के यूपी चुनाव की चुनौती
भाजपा को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में जिन वर्गों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, क्या अब वही वर्ग मोदी सरकार की नीतियों से खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है? एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम में 2018 का संशोधन हो या जनवरी 2026 में लागू किए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए इक्विटी नियम, दोनों ने सवर्ण समाज के एक बड़े हिस्से में असंतोष पैदा किया है। सवाल यह नहीं है कि सरकार वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा क्यों कर रही है, बल्कि सवाल यह है कि न्याय और समानता के नाम पर किसी दूसरे वर्ग के अधिकारों और सुरक्षा की अनदेखी क्यों होनी चाहिए?
जमीन से लेकर सोशल मीडिया तक विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं। लेकिन केंद्र सरकार की ओर से ऐसा कोई स्पष्ट राजनीतिक संवाद सामने नहीं आया, जो इस नाराजगी को दूर कर सके। क्या सरकार मानकर चल रही है कि सवर्ण समाज के पास भाजपा के अलावा कोई राजनीतिक विकल्प नहीं है? यदि ऐसा है तो यह राजनीतिक अहंकार आने वाले समय में भारी पड़ सकता है।
पुराने समर्थकों की नाराजगी
भाजपा की राजनीतिक यात्रा में सवर्ण समाज की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राम मंदिर आंदोलन से लेकर केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने तक इस वर्ग का महत्वपूर्ण समर्थन रहा है। भाजपा ने भी लंबे समय तक अपने राजनीतिक और वैचारिक आधार में इस वर्ग की भागीदारी को महत्व दिया।
लेकिन अब इसी वर्ग में यह सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा की राजनीति में उसकी भूमिका केवल चुनाव के समय समर्थन देने तक सीमित रह गई है? क्या सरकार की नीतियां बनाते समय उसकी आशंकाओं और शिकायतों को सुनने की जरूरत नहीं समझी जा रही?
यह नाराजगी केवल किसी एक जाति तक सीमित नहीं है। ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य सवर्ण समूहों के बीच भी इन मुद्दों पर असंतोष दिखाई दे रहा है।
एससी-एसटी संशोधन पर सवाल
वर्ष 2018 में मोदी सरकार ने एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम में संशोधन कर धारा 18ए जोड़ी थी। इसके तहत प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई। गिरफ्तारी के लिए किसी सक्षम अधिकारी की पूर्व अनुमति की जरूरत भी हटा दी गई। साथ ही अग्रिम जमानत पर रोक संबंधी प्रावधान को फिर स्पष्ट किया गया।
इससे पहले 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन मामले में कुछ प्रक्रियागत सुरक्षा उपाय दिए थे। इनमें प्रारंभिक जांच और गिरफ्तारी से पहले सक्षम अधिकारी की अनुमति जैसी व्यवस्थाएं शामिल थीं। सरकार ने संसद के माध्यम से संशोधन करके इन व्यवस्थाओं को निष्प्रभावी कर दिया। बाद में 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने भी संशोधन को बरकरार रखा।
सरकार का तर्क था कि अत्याचार के पीड़ितों को न्याय दिलाने में देरी नहीं होनी चाहिए। यह तर्क अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन सवाल यह भी है कि किसी निर्दोष व्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा की रक्षा कैसे होगी?
इस कानून में अग्रिम जमानत पर सामान्य रोक है, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जहां प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता या आरोप स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण और झूठे हों, वहां न्यायिक राहत का रास्ता बंद नहीं है। इसके बावजूद आम नागरिक की आशंका यह है कि गिरफ्तारी और मुकदमे की प्रक्रिया शुरू होने के बाद उसे सामाजिक और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
पीड़ितों को मिलने वाली आर्थिक सहायता का भी अपना निर्धारित प्रावधान है। यह हर शिकायत पर बिना शर्त मिलने वाली रकम नहीं है। नियमों के अनुसार अपराध की प्रकृति के आधार पर सहायता अलग-अलग चरणों में दी जाती है। फिर भी गलत शिकायत के मामलों में निर्दोष व्यक्ति को होने वाले नुकसान की भरपाई का सवाल आज भी महत्वपूर्ण है।
यूजीसी नियमों ने बढ़ाई आग
जनवरी 2026 में यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए नए नियम अधिसूचित किए। इन नियमों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विरुद्ध जातिगत भेदभाव की शिकायतों के निस्तारण के लिए संस्थागत व्यवस्था बनाई गई।
लेकिन सामान्य वर्ग को परिभाषा से बाहर रखने और झूठी शिकायतों के विरुद्ध पर्याप्त दंडात्मक व्यवस्था नहीं होने को लेकर सवाल उठे। विरोध करने वालों का कहना था कि भेदभाव किसी भी वर्ग के साथ हो सकता है। फिर शिकायत और न्याय की व्यवस्था भी सभी के लिए समान क्यों न हो?
29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी। अदालत ने प्रावधानों में अस्पष्टता और दुरुपयोग की आशंका पर सवाल उठाए। बाद में 20 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि वह इन नियमों पर पुनर्विचार कर रही है।
अर्थात यूजीसी का मामला केवल विरोध प्रदर्शन का विषय नहीं रहा, बल्कि न्यायिक समीक्षा और सरकार के पुनर्विचार तक पहुंच चुका है। इसके बावजूद सवर्ण समाज की मूल आशंकाओं पर सरकार की ओर से स्पष्ट और भरोसा पैदा करने वाला राजनीतिक जवाब सामने नहीं आया।
सवाल पूछने पर थप्पड़!
नाराजगी का एक ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में सामने आया। दो नवंबर को उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य एक कार्यक्रम में पहुंचे थे। वहां कुछ लोगों ने यूजीसी नियमों को लेकर उनसे सवाल पूछे। इसी दौरान भाजपा के पार्षद विनय मिश्रा ने रोहित तिवारी को कथित तौर पर थप्पड़ मार दिया।
मामला यहीं नहीं रुका। तीन नवंबर को रोहित तिवारी की शिकायत पर पार्षद के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने की खबर सामने आई। भाजपा विधायक हर्षवर्धन वाजपेयी ने भी घटना पर नाराजगी जताते हुए कहा कि यूजीसी के मुद्दे पर सवाल उठाना हर ब्राह्मण का अधिकार है।
यह घटना भाजपा के लिए सामान्य अनुशासनहीनता का मामला भर नहीं है। यह उस राजनीतिक बेचैनी की तस्वीर है, जिसमें सरकार और उसके प्रतिनिधियों से सवाल पूछने वाले अपने ही समर्थक असहज स्थिति में पहुंच रहे हैं। सवाल पूछने वाले को जवाब देने के बजाय थप्पड़ मिले तो नाराजगी कम होने के बजाय और बढ़ेगी।
संघ की चुप्पी भी सवालों में
इस पूरे विवाद पर संघ से जुड़े एक नेता से बातचीत हुई तो उन्होंने कहा कि यूजीसी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही रोक लगा चुका है, इसलिए फिलहाल इस मामले में कुछ होने की संभावना नहीं है।
जब उनसे एससी-एसटी कानून के संशोधन और उसमें गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच जैसी सुरक्षा व्यवस्था की मांग के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सवर्ण समाज को खुश करने के लिए संशोधन किया जा सकता है।
हालांकि यह किसी अधिकृत संघ पदाधिकारी या केंद्र सरकार का आधिकारिक बयान नहीं है। इसे एक व्यक्ति की निजी राजनीतिक समझ और बातचीत के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
जब उनसे पूछा गया कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं, फिर संशोधन के लिए 2029 तक इंतजार क्यों? तो उनके पास इसका स्पष्ट जवाब नहीं था। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि कहीं केंद्र की नीतियों का राजनीतिक नुकसान उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को तो नहीं उठाना पड़ेगा।
यह आशंका कितनी सही है, इसका फैसला तथ्यों और राजनीतिक घटनाक्रम से ही होगा। लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा के भीतर और उसके समर्थक वर्ग में इन मुद्दों पर बेचैनी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
2027 में भाजपा की परीक्षा
उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए केवल एक राज्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण प्रदेश है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा यहां 62 सीटों से घटकर 33 सीटों पर आ गई थी। इसके पीछे कई कारण थे, लेकिन सामाजिक समीकरणों और विभिन्न वर्गों की नाराजगी ने भी पार्टी की चिंता बढ़ाई थी।
अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यूजीसी और एससी-एसटी कानून का मुद्दा एक नई चुनौती बन सकता है। भाजपा के सामने दोहरी मुश्किल है। एक तरफ उसे पिछड़े, दलित और आदिवासी वर्गों के हितों की रक्षा का अपना राजनीतिक आधार बनाए रखना है, दूसरी तरफ परंपरागत सवर्ण समर्थकों की नाराजगी भी दूर करनी है।
सवाल यह है कि क्या सरकार दोनों के बीच न्यायपूर्ण संतुलन बनाने के लिए तैयार है या फिर चुनाव आने तक इस नाराजगी को दबा रहने देने की रणनीति पर काम कर रही है?
चुप्पी की कीमत चुकानी पड़ सकती है
लोकतंत्र में किसी भी कानून का उद्देश्य किसी वर्ग को भयभीत करना नहीं, बल्कि अन्याय से सुरक्षा देना होना चाहिए। एससी-एसटी समाज के साथ भेदभाव और अत्याचार की घटनाओं को रोकना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। उसी तरह किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे आरोप, सामाजिक अपमान और कानूनी उत्पीड़न से बचाना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
न्याय की व्यवस्था एकतरफा भरोसे पर नहीं, बल्कि निष्पक्ष प्रक्रिया पर चलती है। शिकायतकर्ता को न्याय मिलना चाहिए तो आरोपी को भी निष्पक्ष जांच और कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। यही संविधान की भावना है।
मोदी सरकार को यह समझना होगा कि राजनीतिक समर्थन किसी वर्ग की स्थायी बपौती नहीं होता। सवर्ण समाज की नाराजगी को केवल सोशल मीडिया का शोर समझना या यह मान लेना कि चुनाव आते ही सब कुछ सामान्य हो जाएगा, गंभीर भूल हो सकती है।
भाजपा यदि अपने पुराने समर्थकों के सवालों का जवाब नहीं देगी तो विपक्ष को राजनीतिक जमीन तलाशने का अवसर मिलेगा। 2027 में उत्तर प्रदेश की जनता केवल जातीय समीकरण नहीं, सरकार की नीतियों और उसके व्यवहार का भी हिसाब मांगेगी।
आखिर सवाल यही है कि सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास का नारा देने वाली सरकार क्या सबके लिए समान न्याय का भरोसा भी दे पाएगी? या फिर सवर्ण समाज को अपने सवालों के जवाब के लिए 2029 तक इंतजार करना पड़ेगा?









