
नई दिल्ली। राजनीति में रसूख, सत्ता में पकड़ और संगठन में मजबूत पहुंच किसी नेता को लंबे समय तक ताकतवर बनाए रख सकती है, लेकिन इतिहास और कानून के सामने हर राजनीतिक हैसियत की एक सीमा होती है। पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार की कहानी इसी कठोर सच को सामने रखती है। बाहरी दिल्ली की राजनीति में कभी उनका दबदबा था, कांग्रेस में उनका प्रभाव था और ग्रामीण दिल्ली के बड़े हिस्से में उनका मजबूत जनाधार माना जाता था। लेकिन 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों ने उनके राजनीतिक जीवन की दिशा बदल दी। सत्ता के शिखर से शुरू हुआ सफर अंततः तिहाड़ जेल की सलाखों तक पहुंचा और उम्रकैद की सजा काटते हुए 80 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।
बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है
सज्जन कुमार की राजनीतिक कहानी को अगर एक वाक्य में समेटना हो तो वह यही होगा—बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है। हालांकि किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध का अंतिम निष्कर्ष अदालत के फैसलों से ही तय होता है और सज्जन कुमार को कुछ मामलों में अदालतों से राहत भी मिली, लेकिन 1984 से जुड़े जिन मामलों में उन्हें दोषी ठहराया गया, उन्होंने उनकी पूरी राजनीतिक विरासत को बदल दिया।
एक समय जिस नेता का नाम बाहरी दिल्ली की ताकतवर राजनीति में लिया जाता था, उसी नेता के जीवन के अंतिम वर्ष जेल में बीते। संसद, सत्ता, संगठन और राजनीतिक प्रभाव पीछे छूट गए और सामने रह गया न्यायिक प्रक्रिया का लंबा अध्याय।
पार्षद से सांसद तक, फिर तिहाड़ तक पहुंचा सफर
सज्जन कुमार ने 1977 में पार्षद के रूप में राजनीति शुरू की। इसके बाद वह बाहरी दिल्ली लोकसभा सीट से तीन बार सांसद चुने गए। ग्रामीण दिल्ली और जाट बहुल क्षेत्रों में उनकी मजबूत राजनीतिक पकड़ मानी जाती थी। कांग्रेस की दिल्ली इकाई में भी उनका प्रभाव लंबे समय तक कायम रहा।
एक दौर में बाहरी दिल्ली की राजनीति में उनकी स्थिति इतनी मजबूत थी कि उन्हें वहां के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता था। लेकिन राजनीतिक ताकत के इसी दौर के समानांतर 1984 की हिंसा से जुड़े आरोप और मुकदमे भी उनके पीछे चलते रहे।
1984: वह जख्म जिसे देश आज तक नहीं भूल पाया
31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी हिंसा भड़क गई। राजधानी में हजारों सिख मारे गए। घर और दुकानें जलाई गईं, धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया और हजारों परिवारों की जिंदगी तबाह हो गई।
यह भारतीय लोकतंत्र और समाज के इतिहास का बेहद दर्दनाक अध्याय था। लेकिन इस त्रासदी का दूसरा पहलू भी उतना ही कड़वा था—न्याय के लिए पीड़ित परिवारों को दशकों तक इंतजार करना पड़ा।
इसी हिंसा से जुड़े मामलों में सज्जन कुमार का नाम सामने आया। उनके खिलाफ कई मुकदमे चले। कहीं उन्हें राहत मिली, तो कहीं अदालतों ने उन्हें गंभीर अपराधों में दोषी ठहराया।
2018 में अदालत का फैसला और खत्म हो गया राजनीतिक कवच
17 दिसंबर 2018 को दिल्ली हाईकोर्ट ने 1984 के एक मामले में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए सज्जन कुमार को दोषी ठहराया। यह मामला राज नगर पार्ट-1 और पालम कॉलोनी में पांच सिखों की हत्या तथा एक गुरुद्वारे को जलाने से जुड़ा था।
हाईकोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। यही वह फैसला था जिसने सज्जन कुमार के राजनीतिक जीवन को निर्णायक रूप से समाप्त कर दिया।
जिस नेता के लिए कभी राजनीतिक शक्ति सबसे बड़ा कवच मानी जाती थी, उसके सामने अब जेल की सजा थी। 2018 के इस फैसले के बाद उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।
कांग्रेस पर सबसे बड़ा सवाल: इतने वर्षों तक राजनीतिक संरक्षण क्यों?
सज्जन कुमार की कहानी केवल एक नेता के राजनीतिक पतन की कहानी नहीं है। यह कांग्रेस की उस राजनीति पर भी सवाल खड़े करती है, जिसमें 1984 के दंगों से जुड़े गंभीर आरोपों के बावजूद सज्जन कुमार लंबे समय तक पार्टी के प्रभावशाली नेताओं में बने रहे।
यह सवाल आज भी अपनी जगह कायम है कि जब 1984 के पीड़ित न्याय के लिए दशकों तक संघर्ष कर रहे थे, तब राजनीतिक दलों ने ऐसे नेताओं से निर्णायक दूरी बनाने में इतनी देर क्यों की?
2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को दिए गए टिकट वापस लिए थे। लेकिन सज्जन कुमार का राजनीतिक प्रभाव उसके बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। आखिरकार 2018 में दोषसिद्धि के बाद उनका कांग्रेस से औपचारिक रिश्ता समाप्त हुआ।
यह घटनाक्रम कांग्रेस के लिए असहज सवाल छोड़ता है—क्या चुनावी गणित और राजनीतिक प्रभाव ने 1984 के पीड़ितों के न्याय के सवाल को लंबे समय तक पीछे धकेले रखा?
2025 में दूसरी उम्रकैद ने कहानी और गंभीर कर दी
सज्जन कुमार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई 2018 की सजा पर समाप्त नहीं हुई। फरवरी 2025 में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने उन्हें 1984 के दंगों से जुड़े एक अन्य मामले में दोषी ठहराया। यह मामला सरस्वती विहार क्षेत्र में जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या से जुड़ा था।
इस मामले में भी अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। अभियोजन पक्ष ने मृत्युदंड की मांग की थी, लेकिन अदालत ने उम्र और स्वास्थ्य सहित परिस्थितियों को देखते हुए उम्रकैद का फैसला दिया।
इस तरह 1984 की हिंसा से जुड़े अलग-अलग मामलों ने जीवन के अंतिम दौर तक उनका पीछा नहीं छोड़ा।
हर मामले में दोषी नहीं ठहराए गए, यह तथ्य भी जरूरी है
सज्जन कुमार के बारे में कोई भी लेख लिखते समय यह तथ्य नहीं छिपाया जाना चाहिए कि उनके खिलाफ चले सभी मामलों में अदालतों ने उन्हें दोषी नहीं माना। जनवरी 2026 में जनकपुरी और विकासपुरी से जुड़े एक मामले में दिल्ली की अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
लेकिन इस राहत से उनकी रिहाई नहीं हो सकी, क्योंकि अन्य मामलों में मिली उम्रकैद की सजा के कारण वह जेल में ही रहे।
यही कानूनी तथ्य इस पूरी कहानी को अधिक गंभीर बनाता है—कुछ मामलों में राहत, लेकिन अन्य मामलों में दोषसिद्धि और उम्रकैद।
चार दशक बाद भी 1984 का सवाल जिंदा है
सज्जन कुमार की मृत्यु के साथ एक राजनीतिक युग का अंत जरूर हुआ है, लेकिन 1984 का सवाल खत्म नहीं हुआ। हजारों परिवारों के लिए वह हिंसा आज भी केवल इतिहास की घटना नहीं, बल्कि व्यक्तिगत त्रासदी है।
दशकों तक चले मुकदमे इस बात की याद दिलाते हैं कि न्याय में देरी का अर्थ पीड़ितों के लिए लंबी प्रतीक्षा और लगातार मानसिक पीड़ा भी होता है।
सज्जन कुमार की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भारतीय राजनीति के कई चेहरे एक साथ दिखाई देते हैं—सत्ता का प्रभाव, राजनीतिक संरक्षण, चुनावी जनाधार, आरोपों का लंबा साया, अदालतों की प्रक्रिया और अंततः दोषसिद्धि के बाद राजनीतिक पतन।
सत्ता का कद चाहे जितना बड़ा हो, कानून से बड़ा नहीं
सज्जन कुमार का सफर 1977 में पार्षद से शुरू हुआ था। वह तीन बार सांसद बने और बाहरी दिल्ली में मजबूत राजनीतिक आधार बनाया। कांग्रेस में उनका प्रभाव रहा। लेकिन जीवन का अंतिम अध्याय संसद या सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि तिहाड़ जेल में लिखा गया।
1984 के दंगों से जुड़े मामलों में मिली उम्रकैद ने उनके राजनीतिक कद को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया। जिस नेता को कभी बाहरी दिल्ली का प्रभावशाली चेहरा माना जाता था, उसकी अंतिम पहचान एक दोषसिद्ध पूर्व सांसद की बन गई।
यही इतिहास का सबसे बड़ा सबक है—सत्ता स्थायी नहीं होती, राजनीतिक संरक्षण हमेशा नहीं रहता और कानून के सामने आखिरकार जवाबदेही तय होती है।
सज्जन कुमार का जीवन इसी कठोर संदेश के साथ समाप्त हुआ कि बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है। देर हो सकती है, लेकिन न्याय की प्रक्रिया का दरवाजा बंद नहीं होता।









