गणेश चतुर्थी के व्रत से पूरी होती हैं मनोकामनाएं, विश्वामित्र बने थे ब्रह्म ऋषि

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गणेश चतुर्थी व्रत का भारत में विशेष महत्व है। गणेश जी भगवान शिव व माता के पुत्र हैं, वे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। गण्ोश चतुर्थी का व्रत करने से गणेश जी शीघ्र प्रसन्न होते हैं। ऐसी तमाम गाथाएं धर्म शास्त्रों में वर्णित हैं, जो उनके महात्म को उल्लेखित करती हैं। यदि सच्चे मन-भाव से उनकी भक्ति की जाए तो सभी मनोरथ पूरे होते हैं, इस व्रत से प्रसन्न होकर भगवान गणेश जी ने ऋषि विश्वमित्र जी को ब्रह्म ऋषि होने का वर प्रदान किया था।

व्रत की विधि-

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भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी गणेश चतुर्थी के नाम से विख्यात है। इस दिन सुबह स्नानादि से निवृत होकर सोने, तांबे, चांदी, मिट्टी या गाय के गोबर से गणेश जी की मूर्ति बनाकर उनकी पूजा करने का विधान है। पूजन के समय 21 मोदक का भोग लगाते हैं और हरित दूर्वा के 21 अंकुर लेकर गण्ोश जी के ये 1० नामों का स्मरण करते हुए चढ़ाने चाहिए, जो इस प्रकार है- ओम गताप नम:, ओम गौरी सुमन नम:, ओम अघनाशक नम:, ओम एकदंताय नम:, ओम ईशपुत्र नम:, ओम सर्वसिद्धिप्रद नम:, ओम विनायक नम:, ओम कुमार गुरु नम:, ओम इम्भववक्त्राय नम:, ओम मूषकवाहनसंत नम:। इसके बाद 21 लड्डूओं में 1० लड्डू ब्राह्मणों को दान देना चाहिए। 11 लड्डू स्वयं खाने चाहिए।

गणेश चतुर्थी व्रत कथा इस प्रकार है-एक बार महादेव जी माता पार्वती के साथ नर्मदा नदी के तट पर गए। वहां सुंदर स्थान पर पार्वती जी ने महादेव जी के साथ चौपड़ खेलने की इच्छा जताई, तब शिव जी ने कहा कि हमारी हार जीत का साक्षी कौन होगा? पार्वती जी ने तत्काल वहां की घास के तिनके बटोरकर एक पुतला बनाया और उसमें प्राण प्रतिष्ठा करके उससे कहा- बेटा हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, लेकिन यहां हार जीत का साक्षी कोई नहीं है, इसलिए तुम हमारी हार जीत के साक्षी हो कर बताना कि हममें से कौन जीता? कौन हारा? खेल शुरू हुआ देवयोग से तीन बार पार्वती जीती और जब अंत में बालक से हार- जीत के का निर्णय कराया गया तो उसने महादेव जी को विजयी बताया। इससे पार्वती जी नाराज हो गईं और उसे एक पांव से लंगड़ा होने और वहीं के कीचड़ में पड़ा रह कर दुख भोगने का श्राप दे दिया। तब बालक ने विनम्रतापूर्वक कहा कि हे मात, मुझसे अज्ञानवश ऐसा हो गया। मैंने किसी कुटिलता के कारण ऐसा नहीं किया। मुझे क्षमा कर दें और इससे मुक्ति का उपाय बताएं। तब देवी पार्वती को उस पर दया आ गई और बोलीं- जब यहां नागकन्याएं श्री गणेश पूजन करने आएंगी, उनके उपदेश से तुम गणेश व्रत करके मुझे प्राप्त करोगे। इतना कहकर वह कैलाश पर्वत चली गईं।

 

एक वर्ष बाद वहां से सावन में नागकन्याएं गणेश पूजन के लिए आईं। तब नाग कन्याओं ने गणेश व्रत करने की विधि बालक को बताई। इसके बाद बालक ने 12 दिन तक गणेश जी का व्रत किया। तब गणेश जी ने उसे दर्शन देकर कहा- मैं तुम्हारे व्रत से प्रसन्न हूं, वर मांगों। बालक बोला भगवान मेरे पांव में इतनी शक्ति दें कि मैं कैलाश पर्वत पर अपने माता पिता के पास पहुंच सकूं। गणेश जी तथास्तु कहकर अंतर्धान हो गए। बालक भगवान शिव के चरणों में पहुंच गया। जब भगवान शिव ने उससे वहां तक पहुंचने के साधन के बारे में पूछा, तब बालक ने सारी बात बता दी।

उधर उसी दिन से अप्रसन्न होकर माता पार्वती जी शिव जी से विमुख हो गई थीं। इसके बाद भगवान शंकर ने भी बालक की तरह 21 दिन प्रयंत श्री गणेश का व्रत किया। इसके प्रभाव से माता पार्वती जी स्वयं भगवान शंकर के पास आ गईं। कैलाश पर्वत पर पहुंचकर माता पार्वती जी ने शिवजी से पूछा कि भगवन आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया। जिसके कारण मैं आपसे आपके पास भागी-भागी आ गई हूं। शिव जी ने गणेश जी के व्रत के बारे में बताया। तब पार्वती जी ने अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा कर 21 दिन तक 21-21 की संख्या में दुर्वा, पुष्प और मोदक से गण्ोश जी का पूजन किया। इसके बाद 21 वें दिन कार्तिकेय जी स्वयं पार्वती जी से मिलने मिलने वहां पहुंच गए। तब कार्तिकेय जी को माता पार्वती ने व्रत के बारे में बताया। इसके बाद कार्तिकेय ने यही व्रत विश्वामित्र जी को बताया। विश्वामित्र ने व्रत कर गण्ोश जी से जन्म-मरण से मुक्त होकर ब्रह्म ऋषि होने का वर पाया।

 

एक अन्य कथा भी है, जो इस प्रकार है- एक बार महादेव जी स्नान करने के लिए भोगावती गए। उनके चले जाने के बाद माता पार्वती जी ने अपने तन की मैल से एक पुतला बनाया। उसका नाम गणेश रखा। पार्वती जी ने उससे कहा कि एक मुगदल लेकर द्बार पर बैठ जाओ। जब तक मैं नहा रही हूं, किसी पुरुष को भीतर मत आने देना। इस दौरान भोगावती पर स्नान करने के बाद जब भगवान शिव जी आए तो गणेश जी ने उन्हें द्बार पर रोक लिया। शिवजी ने इसे अपना अपमान समझकर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया और भीतर चले आए। पार्वती जी ने समझा कि भोजन में विलंब होने के कारण महादेव जी नाराज हैं, इसलिए उन्होंने तत्काल दो थाल में भोजन परोस दिया। शिव जी को उन्हें बुलाया और पूछा कि यह दूसरा थाल किसके लिए है जब पार्वती जी ने उत्तर दिया कि पुत्र गणेश के लिए जो बाहर द्बार पर पहरा दे रहा है। यह सुनकर शिव जी ने कहा कि मैंने तो उसका सिर काट कर काट दिया है। यह सुनकर पार्वती जी बहुत दुखी हुईं। तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बच्चे के सिर से भर से जोड़ दिया। पार्वती जी इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर प्रसन्न हुईं। उन्होंने पति और पुत्र को प्रीतिपूर्वक भोजन कराकर स्वयं भोजन किया। यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी, इसलिए इसे पर्व के रूप में मनाया जाता है।

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