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ट्रम्प के बाद क्या अब मोदी की बारी!

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अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की चुनावी हार और भारत में नरेंद्र मोदी सरकार के सामने उभरती राजनीतिक चुनौतियों का प्रतीकात्मक दृश्य।

ट्रम्प की हार से मोदी सरकार को सबक! क्या 2029 में भारी पड़ सकती है जनता की नाराजगी?

अमेरिका में सत्ता का अहंकार टूटा, भारत में भी उभर रहे असंतोष के संकेत; यूजीसी नियम, आरक्षण और एससी-एसटी कानून पर सरकार को घेर रहे अपने ही समर्थक

दुनिया की सबसे बड़ी ताकत माने जाने वाले अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पार्टी को मध्यावधि चुनाव में करारी शिकस्त मिली है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों में बहुमत हासिल कर लिया। यह सिर्फ विपक्ष की चुनावी जीत नहीं, बल्कि ट्रम्प की नीतियों और कार्यशैली के खिलाफ जनता के गुस्से का बड़ा राजनीतिक संदेश भी है। महंगाई, जीवनयापन की बढ़ती लागत, सरकारी भ्रष्टाचार और ईरान के साथ लंबे युद्ध ने ट्रम्प की लोकप्रियता को भारी नुकसान पहुंचाया।

अमेरिका के इस नतीजे को भारत की राजनीति से जोड़कर देखने की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के सामने भी कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर उसके परंपरागत समर्थक वर्गों में असंतोष दिखाई दे रहा है। सवाल यह है कि क्या सत्ता का आत्मविश्वास धीरे-धीरे राजनीतिक अहंकार में बदल रहा है? क्या सरकार अपने ही समर्थकों की नाराजगी को समय रहते समझ पा रही है? और क्या इसका असर 2029 के लोकसभा चुनाव में दिखाई दे सकता है?

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ट्रम्प को जनता ने दिखाया आईना

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल कर ट्रम्प के लिए राजनीतिक मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अब उनके कार्यकाल के शेष दो वर्षों में सरकार को विधायी फैसले लेने और नीतियां आगे बढ़ाने में विपक्ष की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

रॉयटर्स की चुनावी समीक्षा के अनुसार, करीब 90 प्रतिशत मतदाताओं ने जीवनयापन की लागत को अपने मतदान का महत्वपूर्ण या प्रमुख कारण बताया। लगभग दो-तिहाई मतदाताओं ने महंगाई के लिए ट्रम्प को जिम्मेदार माना। करीब 70 प्रतिशत मतदाता चाहते थे कि अमेरिकी कांग्रेस राष्ट्रपति की शक्तियों पर अधिक प्रभावी नियंत्रण रखे। यह आंकड़े बताते हैं कि जनता केवल राजनीतिक भाषणों से संतुष्ट नहीं थी, बल्कि अपने रोजमर्रा के जीवन में राहत चाहती थी।

ईरान के साथ युद्ध भी ट्रम्प के लिए महंगा साबित हुआ। युद्ध के कारण ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी और आर्थिक दबाव ने आम अमेरिकी परिवारों को प्रभावित किया। हालांकि चुनावी सर्वेक्षणों में महंगाई और जीवनयापन की लागत युद्ध से बड़ा मुद्दा बनकर उभरे। एबीसी न्यूज के मतदाता सर्वेक्षण में 49 प्रतिशत लोगों ने जीवनयापन की लागत और 34 प्रतिशत ने ईरान युद्ध को अपने मतदान के लिए निर्णायक बताया। सरकारी भ्रष्टाचार को लेकर चिंता इससे भी अधिक थी।

इस चुनाव का एक संदेश साफ है—राष्ट्रपति की लोकप्रियता, पार्टी का संगठन और चुनावी रणनीति भी जनता की नाराजगी के सामने कमजोर पड़ सकते हैं।

भारत में भी बढ़ रही बेचैनी

भारत में भाजपा की स्थिति अमेरिका के रिपब्लिकन दल जैसी नहीं है। यहां चुनावी मुद्दे, सामाजिक समीकरण और राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। लेकिन जनता की नाराजगी को नजरअंदाज करने का जोखिम दोनों जगह मौजूद है।

मोदी सरकार के सामने यूजीसी के नए नियम और एससी-एसटी कानून से जुड़े सवालों ने एक नया राजनीतिक मोर्चा खोल दिया है। यूजीसी के 2026 के समानता नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों ने आशंका जताई कि शिकायतों की प्रक्रिया का दुरुपयोग हो सकता है और उन्हें पर्याप्त संरक्षण नहीं मिलेगा। दूसरी ओर, दलित और पिछड़े वर्गों के संगठनों के एक हिस्से ने नियमों पर रोक का विरोध किया। यानी सरकार के सामने दोनों ओर से सवाल खड़े हुए।

29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों को स्थगित कर दिया। अदालत ने नियमों की भाषा और संभावित दुरुपयोग को लेकर गंभीर सवाल उठाए। बाद में केंद्र सरकार ने भी अदालत को बताया कि वह नियमों की समीक्षा कर रही है। यह घटनाक्रम बताता है कि मामला केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संवैधानिक और कानूनी बहस का विषय भी बन गया।

नाराजगी सिर्फ सोशल मीडिया तक नहीं

सामान्य वर्ग के कुछ संगठनों ने यूजीसी नियमों को वापस लेने, आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करने और एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून में संशोधन की मांग उठाई है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में प्रदर्शन और महापंचायतें हुई हैं। सितंबर में उत्तर प्रदेश सहित हिंदी पट्टी में सवर्ण संगठनों की सक्रियता और विरोध को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हुई।

यह भी ध्यान रखना होगा कि एससी-एसटी कानून में संशोधन की मांग और यूजीसी नियमों का विरोध अलग-अलग मुद्दे हैं। इन्हें एक ही आंदोलन मानना सही नहीं होगा। लेकिन इनका राजनीतिक महत्व इसलिए है क्योंकि भाजपा के परंपरागत समर्थक माने जाने वाले वर्गों के कुछ हिस्सों में सरकार के प्रति नाराजगी खुलकर सामने आ रही है।

केंद्र सरकार के सामने चुनौती केवल विरोध को शांत कराने की नहीं, बल्कि यह भरोसा कायम करने की है कि किसी भी वर्ग के साथ अन्याय नहीं होगा और कानून का दुरुपयोग भी नहीं होने दिया जाएगा। लोकतंत्र में किसी एक वर्ग की चिंता को दूसरे वर्ग के अधिकारों के विरुद्ध खड़ा करना अंततः सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है।

वाराणसी का नतीजा चेतावनी है

उत्तर प्रदेश में हालिया विधान परिषद चुनावों ने भी भाजपा को आत्ममंथन का अवसर दिया है। 11 सीटों में भाजपा को छह और समाजवादी पार्टी को पांच सीटें मिलीं। भाजपा ने कुल सीटों की संख्या 2020 के चुनाव के बराबर रखी, लेकिन वाराणसी की दोनों सीटों पर हार और लखनऊ स्नातक सीट गंवाना उसके लिए बड़ा राजनीतिक झटका है।

वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है। यहां दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी की जीत को सामान्य चुनावी घटना कहकर खारिज करना आसान नहीं होगा। लखनऊ स्नातक सीट पर भी भाजपा के मौजूदा विधान परिषद सदस्य अवनीश कुमार सिंह को समाजवादी पार्टी की कांति सिंह ने हराया। इन नतीजों से यह संकेत जरूर मिलता है कि पढ़े-लिखे मतदाताओं और शिक्षक वर्ग के बीच भाजपा को पहले जैसी सहज बढ़त नहीं मिल रही।

हालांकि विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता आधार सीमित और विशिष्ट होता है। इनके परिणामों से पूरे उत्तर प्रदेश या लोकसभा चुनाव का सीधा अनुमान नहीं लगाया जा सकता। फिर भी वाराणसी जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में मिली हार को नजरअंदाज करना पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

2029 की आहट या सत्ता के लिए चेतावनी?

मोदी सरकार के सामने अभी 2029 के लोकसभा चुनाव तक समय है। भाजपा के पास संगठन, संसाधन और मजबूत राजनीतिक आधार मौजूद है। लेकिन चुनाव केवल संगठन के दम पर नहीं जीते जाते। जनता के बीच सरकार की नीतियों को लेकर भरोसा भी उतना ही जरूरी है।

ट्रम्प की हार ने यह दिखाया है कि जनता महंगाई, आर्थिक दबाव और सत्ता के व्यवहार को चुनाव में मुद्दा बना सकती है। भारत में भी बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक तनाव और नीतिगत फैसलों से पैदा होने वाली नाराजगी राजनीतिक परिणामों को प्रभावित कर सकती है।

एससी-एसटी कानून और यूजीसी नियमों को लेकर उठे सवालों का समाधान संवाद और निष्पक्ष समीक्षा से निकलना चाहिए, न कि विरोध करने वालों को राजनीतिक विरोधी मानकर खारिज करने से। सरकार को यह समझना होगा कि समर्थन स्थायी नहीं होता। जो वर्ग आज उसके साथ खड़ा है, वह कल सवाल भी पूछ सकता है।

वाराणसी और लखनऊ के नतीजे, यूजीसी नियमों पर उठा विवाद और आरक्षण से जुड़े विरोध के स्वर मिलकर भाजपा के लिए एक चेतावनी जरूर हैं। यह कहना जल्दबाजी होगी कि 2029 में परिणाम ट्रम्प जैसा होगा, लेकिन इतना तय है कि जनता की नाराजगी को सत्ता का अहंकार जितना देर से पहचानेगा, राजनीतिक कीमत उतनी ही बड़ी हो सकती है।

ट्रम्प ने चुनाव में इसकी कीमत चुकाई है। मोदी सरकार के पास अभी समय है—सवाल यह है कि वह जनता के संकेतों को समझेगी या उन्हें अनदेखा करती रहेगी?

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