सनातनजन डेस्क
भारतीय राजनीति का रंग भी बड़ा निराला है। यहां सिद्धांत अक्सर चुनावी कैलेंडर देखकर बदलते हैं और विचारधारा का तापमान मतपेटियों के मौसम के साथ ऊपर-नीचे होता रहता है। जो नेता कल तक राम का नाम लेने वालों को कटघरे में खड़ा करते थे, आज वही रामभक्ति की माला जपते दिखाई दे रहे हैं। यह परिवर्तन आध्यात्मिक जागरण का परिणाम है या चुनावी गणित का, इसका निर्णय जनता पर छोड़ देना ही बेहतर है।
समाजवादी राजनीति की यात्रा पर नजर डालें तो एक ऐसा दौर भी रहा, जब अयोध्या आंदोलन के समय कारसेवकों पर गोलियां चलने की घटना भारतीय राजनीति का स्थायी अध्याय बन गई। उस निर्णय का बचाव भी वर्षों तक किया गया और उसे राजनीतिक साहस का प्रतीक बताने का प्रयास होता रहा। लेकिन समय का पहिया घूमता है और राजनीति में स्मृतिलोप की बीमारी बड़ी तेजी से फैलती है। अब वही राजनीतिक परंपरा रामभक्ति के रंग में रंगी हुई दिखाई दे रही है। कभी राम मंदिर आंदोलन को संदेह की नजर से देखने वाली राजनीति आज मंदिरों की चौखट पर माथा टेक रही है। कभी सनातन पर कटाक्ष करने वाले बयान चर्चा का विषय बनते थे, आज सनातन की महिमा का गुणगान हो रहा है। मानो चुनाव आयोग ने नहीं, बल्कि किसी चमत्कारी संत ने “राजनीतिक पुनर्जन्म” का प्रमाणपत्र बांट दिया हो।
व्यंग्य यह नहीं कि कोई व्यक्ति अपनी सोच बदले। लोकतंत्र में विचार बदलना अपराध नहीं है। लेकिन सवाल तब उठता है, जब परिवर्तन आत्ममंथन से नहीं, बल्कि वोट बैंक के कैलकुलेटर से निकलता हुआ दिखाई दे। जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि आखिर ऐसा कौन-सा आध्यात्मिक अनुभव हुआ कि वर्षों की वैचारिक दूरी कुछ ही महीनों में समाप्त हो गई? भारतीय मतदाता अब पहले जैसा भोला नहीं रहा। उसने पहले भी चुनावी जनेऊ, मंदिर यात्राओं और धार्मिक प्रतीकों के अचानक प्रकट हुए प्रेम को देखा है। जनता ने मुस्कुराकर सब देखा, सुना और फिर मतदान के दिन अपने हिसाब से फैसला भी सुनाया। इसलिए केवल माथे पर चंदन लगा लेने, हाथ में माला पकड़ लेने या मंच से “जय श्रीराम” बोल देने भर से इतिहास के पन्ने नहीं बदल जाते।
राजनीति में अभिनय की भी एक सीमा होती है। जनता संवाद सुनती जरूर है, लेकिन चरित्र भी देखती है। चुनावी मंच पर बोली गई हर बात की तुलना वह बीते वर्षों के भाषणों, फैसलों और बयानों से करती है। लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि मतदाता की स्मृति, नेताओं की सुविधा से कहीं अधिक लंबी होती है। यदि वास्तव में किसी नेता या दल के विचार बदले हैं तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन परिवर्तन की पहली शर्त ईमानदारी है। केवल चुनाव आते ही आस्था का नया संस्करण लॉन्च कर देना जनता को प्रभावित करने का आसान फार्मूला नहीं रह गया है। मतदाता अब प्रचार से अधिक व्यवहार पर भरोसा करता है। साल 2027 का चुनाव केवल नारों की परीक्षा नहीं होगा, बल्कि विश्वसनीयता की भी कसौटी बनेगा। वहां यह तय होगा कि जनता ने चेहरे पर लगे नए रंग को स्वीकार किया या पुराने चरित्र को याद रखा। आखिर लोकतंत्र में वोट श्रद्धा से कम और विश्वास से अधिक मिलते हैं। और विश्वास, चुनावी मौसम में किराए पर नहीं मिलता।










