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मृत्यु के बाद क्या सचमुच कुछ भी साथ नहीं जाता?

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सनातन धर्म का गहन उत्तर

“मनुष्य खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही चला जाता है।” यह कथन हम बचपन से सुनते आए हैं। इसका आशय यह होता है कि मनुष्य अपने साथ न धन ले जा सकता है, न संपत्ति, न पद, न परिवार और न ही सांसारिक वैभव। भौतिक दृष्टि से यह बात बिल्कुल सत्य है। मृत्यु के साथ शरीर समाप्त हो जाता है और संसार का समस्त भौतिक संग्रह यहीं रह जाता है।

लेकिन यदि सनातन धर्म के शास्त्रों की ओर देखा जाए तो यह कथन पूर्ण सत्य नहीं है। सनातन दर्शन कहता है कि मनुष्य वास्तव में खाली हाथ नहीं जाता। वह जिस प्रकार कुछ लेकर इस संसार में आता है, उसी प्रकार इस जीवन में अर्जित बहुत कुछ अपने साथ लेकर भी जाता है। अंतर केवल इतना है कि वह धन, मकान या सोना-चांदी नहीं, बल्कि सूक्ष्म स्तर पर संचित कर्म, संस्कार, स्मृतियां, चेतना का स्तर और सूक्ष्म शरीर साथ लेकर जाता है। यही तत्व उसकी आगे की यात्रा और अगले जन्म का आधार बनते हैं।

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मनुष्य इस संसार से धन-संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा और परिवार लेकर नहीं जाता, लेकिन वह वास्तव में खाली हाथ भी नहीं जाता। वह अपने साथ अपने संचित कर्म, वर्तमान जीवन के क्रियमाण कर्म, सूक्ष्म शरीर, संस्कार, स्मृतियां, चेतना का स्तर तथा धर्म और अधर्म—अर्थात अपने समस्त पुण्य और पाप—लेकर आगे बढ़ता है।

इसी कारण सनातन धर्म जीवन की सफलता को केवल आर्थिक उपलब्धियों से नहीं मापता, बल्कि इस बात से मापता है कि मनुष्य ने अपने जीवन में कितना धर्म अर्जित किया, कितने सत्कर्म किए, अपनी चेतना को कितना विकसित किया और अपने संस्कारों को कितना शुद्ध बनाया। यही उसकी वास्तविक संपत्ति है और यही मृत्यु के बाद भी उसका सच्चा साथी बनती है।

जन्म के समय मनुष्य अपने साथ क्या लेकर आता है?

सनातन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव जन्म लेते समय मुख्य रूप से तीन तत्व अपने साथ लाता है—संचित कर्म, स्मृति और जागृति (चेतना का स्तर)। इन तीनों के अतिरिक्त एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व सूक्ष्म शरीर भी होता है, जो आत्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक बना रहता है। मृत्यु के बाद स्थूल शरीर नष्ट हो जाता है, लेकिन यही सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ आगे की यात्रा करता है।

संचित कर्म क्या हैं?

सनातन हिंदू दर्शन के अनुसार मृत्यु के बाद केवल स्थूल शरीर अर्थात भौतिक देह पंचतत्व में विलीन होती है। आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। आत्मा के साथ जुड़ा रहता है सूक्ष्म शरीर, जिसे लिंग शरीर भी कहा गया है। यही सूक्ष्म शरीर जन्म-जन्मांतरों के संस्कारों का वाहक होता है।

संस्कारों का अर्थ केवल धार्मिक संस्कार नहीं है, बल्कि हमारे प्रत्येक अच्छे-बुरे कर्म, आदतें, इच्छाएं, वासनाएं, प्रवृत्तियां और मानसिक छापें भी संस्कार ही हैं। शास्त्र बताते हैं कि ये संस्कार केवल पूर्वजन्मों से ही नहीं आते, बल्कि माता-पिता के संस्कार भी गर्भधारण के समय रज और वीर्य के माध्यम से संतान के व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं। गर्भधारण की परिस्थितियां, माता की मानसिक अवस्था तथा पारिवारिक वातावरण भी इन संस्कारों पर प्रभाव डालते हैं।

जन्म-जन्मांतरों के सभी शुभ और अशुभ कर्मों का जो विशाल संग्रह बनता है, वही संचित कर्म कहलाता है।

सनातन दर्शन कर्म को तीन भागों में विभाजित करता है—

संचित कर्म – अनेक जन्मों के समस्त कर्मों का संग्रह।

प्रारब्ध कर्म – संचित कर्मों का वह छोटा भाग जिसे वर्तमान जन्म में भोगना निश्चित होता है। यही जन्म, परिवार, स्वास्थ्य, आयु, सुख-दुःख तथा जीवन की अनेक परिस्थितियों को प्रभावित करता है।

क्रियमाण कर्म – वर्तमान जीवन में किए जा रहे नए कर्म। मृत्यु के बाद यही कर्म भी संचित कर्मों में जुड़ जाते हैं।

अर्थात जब मनुष्य इस संसार से विदा होता है, तब वह अपने वर्तमान जीवन के सभी कर्मों को भी अपने संचित कर्मों में जोड़कर आगे ले जाता है।

स्मृति क्या है?

बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिन्हें अपने पूर्वजन्म की स्पष्ट स्मृति रहती है। फिर भी सनातन दर्शन का मत है कि कोई भी अनुभव कभी नष्ट नहीं होता।

भगवद्गीता (4.5) में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—

“बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥”

अर्थात, “हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म हो चुके हैं। मैं उन सभी को जानता हूं, परंतु तुम उन्हें नहीं जानते।”

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि जीव के पूर्वजन्मों की स्मृतियां समाप्त नहीं होतीं, बल्कि सामान्य मनुष्य उन्हें स्मरण नहीं रख पाता।

इसे आधुनिक उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे कंप्यूटर की हार्ड डिस्क में डेटा सुरक्षित रहता है, लेकिन वह हर समय स्क्रीन पर दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार पूर्वजन्मों की स्मृतियां भी सूक्ष्म शरीर में संस्कार रूप में सुरक्षित रहती हैं। वे कभी-कभी जन्मजात प्रतिभा, विशेष रुचि, अकारण भय, सहज आकर्षण अथवा असाधारण क्षमता के रूप में प्रकट हो सकती हैं।

मृत्यु के समय मनुष्य इस जीवन की स्मृतियों को भी उसी सूक्ष्म संग्रह में जोड़कर आगे बढ़ता है।

जागृति क्या है?

जागृति या चेतना का स्तर सनातन दर्शन का अत्यंत गूढ़ विषय है। प्रत्येक मनुष्य की चेतना अलग-अलग स्तर पर होती है। यह उसके विचारों, जीवन शैली, साधना, संवेदनशीलता, आत्मसंयम और विवेक पर निर्भर करती है।

यदि मनुष्य केवल भोग, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, वासना, अहंकार और इंद्रिय-सुखों में ही जीवन बिताता है, तो उसकी चेतना मुख्यतः मन और इंद्रियों तक सीमित रहती है। यही स्थिति अधिकांश प्राणियों में भी होती है।

मनुष्य की वास्तविक श्रेष्ठता तब आरंभ होती है जब वह मन से ऊपर उठकर विवेक और आत्मबोध की ओर बढ़ता है।

सनातन परंपरा जागृति के तीन प्रमुख स्तर बताती है—

पहला स्तर बुद्धि, जिसमें सही और गलत का विचार उत्पन्न होता है।

दूसरा स्तर विवेक, जिसमें व्यक्ति केवल ज्ञान नहीं, बल्कि धर्मसम्मत निर्णय लेने लगता है।

तीसरा और सर्वोच्च स्तर आत्मबोध का है, जब मनुष्य स्वयं को केवल शरीर या मन नहीं, बल्कि आत्मा के रूप में अनुभव करने लगता है।

योग, ध्यान, जप, स्वाध्याय, सेवा और ईश्वर-प्रार्थना को जागृति बढ़ाने के प्रमुख साधन माना गया है।

सूक्ष्म शरीर क्या है?

सनातन धर्म के अनुसार मनुष्य केवल स्थूल शरीर नहीं है। स्थूल शरीर तो मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है, किंतु आत्मा के साथ सूक्ष्म शरीर बना रहता है।

सूक्ष्म शरीर में मन, बुद्धि, अहंकार, संस्कार, वासनाएं और कर्मों के बीज विद्यमान रहते हैं। यही अगले जन्म का आधार बनते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि मृत्यु शरीर की होती है, आत्मा और उसके सूक्ष्म आवरण की नहीं।

क्या वास्तव में धर्म ही साथ जाता है?

यहां धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ या किसी विशेष धार्मिक कर्मकांड से नहीं है। सनातन धर्म में धर्म का अर्थ है—सत्य, कर्तव्य, न्याय, करुणा, संयम, सेवा, सदाचार और सत्कर्म।

इसीलिए शास्त्र कहते हैं कि मृत्यु के बाद परिवार, मित्र, धन और प्रतिष्ठा साथ नहीं जाते; केवल धर्म और कर्म ही जीव के साथ चलते हैं।

नारद गीता में कहा गया है—

मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्टलोष्टसमं जनाः।
मुहूर्तमिव रोदित्वा ततो यान्ति पराङ्मुखाः॥

तैस्तच्छरीरमुत्सृष्टं धर्म एकोऽनुगच्छति।
तस्माद्धर्मः सहायश्च सेवितव्यः सदा नृभिः॥

अर्थात मृत्यु के बाद लोग कुछ समय तक शोक करते हैं, फिर मृत शरीर का अंतिम संस्कार कर लौट जाते हैं। उस समय केवल धर्म ही ऐसा साथी होता है जो जीव के साथ जाता है। इसलिए मनुष्य को जीवनभर धर्म का आचरण करना चाहिए।

नारद गीता में ही एक अन्य स्थान पर कहा गया है—

न हि त्वां प्रस्थितं कश्चित् पृष्ठतोऽनुगमिष्यति।
सुकृतं दुष्कृतं च त्वां यास्यन्तमनुयास्यति॥

अर्थात जब मनुष्य परलोक की यात्रा करता है, तब उसके पीछे कोई नहीं जाता। केवल उसके द्वारा किए गए पुण्य और पाप ही उसका अनुसरण करते हैं।

 

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