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Home Religious Dharm-Sanskriti शनिवार व्रत: पूजा विधि, नियम, उपाय और क्या करें-क्या न करें

शनिवार व्रत: पूजा विधि, नियम, उपाय और क्या करें-क्या न करें

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शनि देव की पूजा विधि, पीपल पूजन, हनुमान आराधना, खरीदारी के नियम और शास्त्रीय उपाय

सनातन धर्म और वैदिक ज्योतिष की काल-गणना में प्रत्येक दिवस एक विशिष्ट ब्रह्मांडीय ऊर्जा और आध्यात्मिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। इनमें शनिवार का दिन विशेष रूप से अत्यंत प्रभावशाली, न्यायपरक और जातक के प्रारब्ध कर्मों के परिशोधन का काल माना गया है। इस दिन के मुख्य अधिष्ठाता देव नवग्रहों में न्यायाधीश का पद प्राप्त सूर्यपुत्र शनि देव हैं, जिनका संबंध सीधे तौर पर प्राणियों के कर्मफलों के संकलन और उनके न्यायसंगत वितरण से है। सनातन परंपरा में शनिवार के व्रत और पूजन की संरचना केवल भयमुक्ति के लिए नहीं, बल्कि आत्म-अनुशासन, मानसिक दृढ़ता और प्रारब्ध कर्मों के परिशोधन के लिए की गई है। इस दिन शनि देव के साथ-साथ उनके गुरु देवाधिदेव महादेव, उनके परम रक्षक महाबली हनुमान, उनकी अधिष्ठात्री शक्ति माता दक्षिण कालिका और पीपल वृक्ष के रूप में साक्षात भगवान वासुदेव की संयुक्त आराधना का विधान है। प्रस्तुत शोधपरक रिपोर्ट में इन सभी देव शक्तियों के पूजन के शास्त्रीय संदर्भों, पौराणिक कथाओं, वैज्ञानिक नियमों और व्यावहारिक पद्धतियों का सांगोपांग अनुशीलन किया गया है।

१. पौराणिक पृष्ठभूमि और देव शक्तियों का शास्त्रीय अंतर्संबंध

शनिवार के देवमंडल में सम्मिलित प्रत्येक देवी-देवता का शनि देव के साथ एक विशिष्ट पौराणिक संबंध है, जिसका विस्तृत उल्लेख विभिन्न पुराणों, संहिताओं और ऐतिहासिक ग्रंथों में प्राप्त होता है।

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शनि देव और राजा विक्रमादित्य की गाथा: स्कन्द व अग्नि पुराण के संदर्भ

शनि देव को नवग्रहों में क्रूर, मंदगामी और न्यायप्रिय माना गया है। अग्नि पुराण और स्कन्द पुराण के प्रसंगों के अनुसार, एक बार देवसभा में ग्रहों के मध्य अपनी-अपनी श्रेष्ठता को लेकर भीषण विवाद उत्पन्न हुआ। इस विवाद के सर्वमान्य समाधान हेतु उज्जैन के परम प्रतापी और न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य के सम्मुख प्रस्ताव रखा गया। राजा विक्रमादित्य ने किसी भी ग्रह के स्वाभिमान को ठेस न पहुँचाने के उद्देश्य से नौ धातुओं से निर्मित सिंहासनों का निर्माण करवाया, जिनमें क्रमशः स्वर्ण, रजत, कांस्य, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लौह धातु सम्मिलित थीं। अंतिम स्थान पर लौह सिंहासन होने के कारण शनि देव को विवश होकर उस पर बैठना पड़ा, जिससे वे अत्यंत कुपित हुए और उन्होंने राजा विक्रमादित्य को अपने कुप्रभाव अर्थात साढ़ेसाती के समय भयानक कष्टों का सामना करने की चेतावनी दी।   

साढ़ेसाती के प्रभावस्वरूप राजा विक्रमादित्य को अपना राज्य गंवाना पड़ा और वे दर-दर भटकने लगे। उन्हें एक पड़ोसी राज्य के तेली के घर बैल हांकने का कार्य करना पड़ा। तदनंतर, एक सुनार के घर में दीवाल की खूंटी द्वारा सोने का अमूल्य हार निगल लिए जाने के झूठे आरोप में राजा चंद्रसेन के आदेशानुसार विक्रमादित्य के हाथ-पैर काट दिए गए। इस घोर शारीरिक और मानसिक कष्ट के समय भी विक्रमादित्य ने अपना धैर्य नहीं खोया और शनि देव की कठिन तपस्या की। अंततः प्रसन्न होकर शनि देव ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए, उनके अंगों को पुनः पूर्ववत किया और उनकी सत्यनिष्ठा से संतुष्ट होकर राजा विक्रमादित्य का खोया हुआ राज्य और संपूर्ण वैभव वापस लौटा दिया। इसके साथ ही उस खूंटी ने भी सबके सामने हार उगल दिया। राजा विक्रमादित्य ने अपने राज्य में लौटकर यह राज-घोषणा करवाई कि शनि देव ही सर्वश्रेष्ठ दंडाधिकारी हैं और संपूर्ण प्रजा को श्रद्धापूर्वक शनिवार का व्रत रखना चाहिए।

काशी के ‘शनैश्चरेश्वर महादेव’ और शिव-शिष्य संबंध: स्कन्द पुराण का साक्ष्य

शिव महापुराण और स्कन्द पुराण के ‘काशी खंड’ के अनुसार, शनि देव के गुरु देवाधिदेव महादेव हैं। शनि देव ने अपने बाल्यकाल में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए काशी नगरी में घोर तपस्या की थी। उनकी कठोर तपस्या से परम संतुष्ट होकर महादेव ने उन्हें नवग्रहों में सर्वोच्च स्थान और सृष्टि के समस्त जीवों को उनके कर्मों के आधार पर दंड देने का दंडाधिकारी पद (न्यायाधीश) प्रदान कियास्कन्द पुराण के अनुसार, काशी में ‘शनैश्चरेश्वर महादेव’ नामक शिवलिंग की स्थापना स्वयं शनि देव ने की थी। शास्त्रोक्त मान्यता है कि इस विशिष्ट शिवलिंग के दर्शन और पूजन से जातक सभी प्रकार के असाध्य रोगों और शनि जनित पीड़ाओं से तत्काल मुक्त हो जाता है।   

शमी और मंदार की दिव्य कथा: शिव महापुराण एवं गणेश पुराण का आख्यान

शिव महापुराण के सतयुग कालीन आख्यान और गणेश पुराण के ‘क्रीडाखण्ड’ के प्रसंगों के अनुसार, मालवा क्षेत्र में औरव नामक एक परम शिवभक्त विद्वान ब्राह्मण निवास करते थे। उनके घर ‘शमी’ नामक एक अत्यंत तेजस्वी कन्या का जन्म हुआ। शमी का विवाह धौम्य ऋषि के पुत्र ‘मंदार’ से संपन्न हुआ। शिक्षा पूर्ण कर जब मंदार अपनी पत्नी शमी के साथ वापस लौट रहे थे, तब वे मार्ग में भृशुण्डी ऋषि के आश्रम से होकर गुजरे। भृशुण्डी ऋषि भगवान श्री गणेश के परम भक्त थे और उन्हें गणेश जी के समान अपने मस्तक से सूंड निकालने की दिव्य शक्ति प्राप्त थी। मंदार और शमी ने अज्ञानतावश ऋषि के इस स्वरूप का उपहास उड़ाया, जिससे क्रोधित होकर भृशुण्डी ऋषि ने दोनों को वृक्ष बन जाने का श्राप दे दिया; मंदार को ‘मंदार (आक) का वृक्ष’ तथा शमी को ‘शमी का वृक्ष’ बनने का श्राप मिला   

जब औरव ऋषि को इस वज्रपात का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने भगवान गणेश की कठिन तपस्या की। प्रकट होने पर गणेश जी ने अपने अनन्य भक्त भृशुण्डी के श्राप को पूर्णतः वापस लेने में असमर्थता व्यक्त की, परंतु उन्होंने वरदान दिया कि ये दोनों वृक्ष तीनों लोकों में परम पूजनीय होंगे। भगवान शिव और गणेश जी की आराधना मंदार के पुष्प और शमी के पत्तों के बिना अधूरी मानी जाएगी। चूंकि शनि देव के गुरु महादेव हैं और महादेव को शमी अत्यंत प्रिय है, इसलिए शनिवार को शिवजी पर शमी पत्र चढ़ाने से शनि देव के क्रूर प्रभाव तत्काल समाप्त हो जाते हैं   

[भृशुण्डी ऋषि का श्राप] ──► [मंदार और शमी का वृक्ष बनना]
      │
      └──► [औरव ऋषि की तपस्या] ──► [श्री गणेश का वरदान] ──► [शिव-पूजन में अनिवार्य स्थान]

हनुमान जी और शनि देव का ऐतिहासिक संधि-प्रसंग: आनंद रामायण का संदर्भ

आनंद रामायण के अनुसार, त्रेतायुग में जब रामसेतु का निर्माण हो रहा था, तब रामभक्त हनुमान जी एकांत में अपने प्रभु के ध्यान में मग्न थे। उसी समय शनि देव वहां पहुंचे और अपने अहंकारवश हनुमान जी को चुनौती दी कि वे उनकी राशि पर प्रवेश करने जा रहे हैं। हनुमान जी के बार-बार अनुनय-विनय करने पर भी जब शनि देव नहीं माने, तो हनुमान जी ने उन्हें अपनी पूंछ में लपेट लिया और पत्थरों तथा विशालकाय पर्वतों पर पटकना आरंभ कर दिया।

इस प्रहार से शनि देव का संपूर्ण शरीर लहुलुहान हो गया और वे असहनीय पीड़ा से व्याकुल होकर अपने प्राणों की भिक्षा मांगने लगे। शनि देव ने हनुमान जी के समक्ष आत्मसमर्पण किया और वचन दिया कि वे कभी भी हनुमान जी और भगवान श्री राम के भक्तों को कष्ट नहीं पहुँचाएंगे। पीड़ा से कराहते हुए शनि देव ने अपने घावों को शांत करने के लिए तेल की मांग की। हनुमान जी ने अत्यंत दयालुता दिखाते हुए उनके शरीर पर सरसों का तेल लगाया, जिससे शनि देव की जलन और दर्द शांत हुआ। इसी ऐतिहासिक घटना के स्मृति स्वरूप शनिवार के दिन शनि देव पर सरसों का तेल और काले तिल चढ़ाने की शास्त्रोक्त परंपरा का उद्भव हुआ   

पीपल वृक्ष में लक्ष्मी-अलक्ष्मी निवास: पद्म पुराण का आख्यान

पद्म पुराण के ‘उत्तरखण्ड’ और सनत्सुजात संहिता के ‘कार्तिक माहात्म्य’ के अनुसार, समुद्र मंथन के समय अमृत से पूर्व हलाहल विष और उसके तुरंत पश्चात माता लक्ष्मी की ज्येष्ठ भगिनी अलक्ष्मी (दरिद्रता की अधिष्ठात्री देवी) का प्रादुर्भाव हुआ था। चूंकि अलक्ष्मी ज्येष्ठ थीं, इसलिए शास्त्रों की मर्यादा के अनुसार उनका विवाह पूर्व में होना अनिवार्य था। भगवान विष्णु के आग्रह पर महर्षि दुसह ने अलक्ष्मी से विवाह किया, परंतु अलक्ष्मी का स्वरूप और प्रकृति अत्यंत अशुभ थी; वे केवल कलह, अपवित्रता, मद्यपान, चोरी और अभक्ष्य भोजन वाले स्थानों पर ही रह सकती थीं।

महर्षि दुसह उन्हें वन में स्थित एक पीपल के वृक्ष के नीचे छोड़कर चले गए। पति द्वारा त्यागे जाने पर अलक्ष्मी विलाप करने लगीं। उनकी करुण पुकार सुनकर भगवान विष्णु ने अपनी पत्नी देवी लक्ष्मी के साथ वहां आकर अलक्ष्मी को ढांढस बंधाया और आश्वासन दिया कि पीपल का वृक्ष उनके ही अंश से उत्पन्न हुआ है, अतः अलक्ष्मी सदा पीपल की जड़ में निवास कर सकती हैं। भगवान विष्णु ने वरदान दिया कि वे स्वयं प्रत्येक शनिवार को माता लक्ष्मी के साथ इस पीपल वृक्ष पर निवास करने आएंगे। जो भी मनुष्य शनिवार के दिन पीपल वृक्ष का पूजन और स्पर्श करेगा, उसके घर में महालक्ष्मी का स्थायी वास होगा और उसके सारे पाप नष्ट हो जाएंगे। इसके विपरीत, शनिवार के अतिरिक्त अन्य दिनों में (विशेषकर रविवार को) पीपल का स्पर्श वर्जित माना गया है, क्योंकि उस समय वहां केवल अलक्ष्मी का प्रभाव रहता है।   

२. संपूर्ण देवमंडल पूजन सारणी एवं समय विधान

शनिवार के दिन विभिन्न देव शक्तियों की उपासना हेतु शास्त्रों में विशिष्ट काल, सामग्री और पद्धतियों का निर्धारण किया गया है, जिसका वैज्ञानिक और व्यावहारिक विवरण नीचे दी गई सारणी में प्रस्तुत है:

पूज्य सत्ता सर्वश्रेष्ठ काल अनिवार्य सामग्री शास्त्रीय मूल मंत्र व स्तोत्र विशिष्ट फल एवं प्रभाव शास्त्रीय संदर्भ ग्रंथ
शनि देव

प्रदोष काल (सूर्यास्त के पश्चात)

सरसों का तेल, लौह पात्र, काले तिल, नीले लाजवंती या अपराजिता के पुष्प, शमी पत्र

“ॐ शं शनैश्चराय नमः” एवं दशरथकृत शनि स्तोत्र

साढ़ेसाती, ढैय्या और जन्मकुंडली के शनि दोषों का पूर्ण शमन

पद्म पुराण, निर्णयसिंधु

[cite: 9, 11]

भगवान शिव

प्रातः काल अथवा प्रदोष काल

तांबे का लोटा, गंगाजल मिश्रित शुद्ध जल, कच्चा दूध, काले तिल, शमी पत्र

“ॐ नमः शिवाय” एवं लघु मृत्युंजय मंत्र

असाध्य शारीरिक व्याधियों से मुक्ति और मानसिक स्थिरता की प्राप्ति

शिव महापुराण, स्कन्द पुराण

[cite: 3, 12]

हनुमान जी

प्रातः काल अथवा संध्या काल

चमेली का तेल, शुद्ध सिंदूर, लाल पुष्प, बूंदी के लड्डू या गुड़-चना

हनुमान चालीसा, बजरंग बाण एवं द्वादश नाम स्तुति

आकस्मिक संकटों से रक्षा, भयमुक्ति और राहु-केतु के कुप्रभावों का नाश

आनंद रामायण, पराशर संहिता
माता काली / दुर्गा

मध्य रात्रि अथवा संध्या काल

शुद्ध गाय के घी या तिल के तेल का दीपक, लाल चंदन, गुड़हल का पुष्प, हलवा

“ॐ क्रीं कालिकायै नमः” एवं दुर्गा चालीसा

तंत्र-बाधा, नजर दोष, शत्रुभय और नकारात्मक ऊर्जा का समूल नाश

वृहद इन्द्रजाल, डामर तंत्र

[cite: 16]

पीपल वृक्ष

केवल सूर्योदय के पश्चात (सूर्यास्त पूर्व)

पीतल का पात्र, कच्चा दूध, गंगाजल, चीनी, काले तिल, चौमुखा दीपक

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”

दरिद्रता का समूल नाश, पैतृक सुख (पितृदोष शांति) और स्थिर लक्ष्मी का वास

पद्म पुराण, सनत्सुजात संहिता

[cite: 1]

  

३. विस्तृत शास्त्रोक्त पूजन पद्धतियां

शनिवार के व्रत को श्रावण मास के शुक्ल या कृष्ण पक्ष के प्रथम शनिवार से प्रारंभ करना अत्यंत मंगलकारी माना गया है। जातक को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर, नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए   

क. शनि देव की शास्त्रीय पूजन विधि

सूर्यास्त के पश्चात किसी शनि मंदिर में जाकर शनि देव की लौह निर्मित प्रतिमा का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। पूजन के समय निम्न चरणों का पालन अनिवार्य है:   

दर्शन करते समय कभी भी शनि देव की प्रतिमा की आंखों में सीधे नहीं देखना चाहिए; दृष्टि सदैव उनके चरणों की ओर होनी चाहिए, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार उनकी दृष्टि में मारक प्रभाव होता है। काँसे या लोहे के पात्र में सरसों का तेल भरकर उसमें अपना मुख देखें (छाया पात्र दान) और फिर उसे शनि देव पर अर्पित कर दें। इसके पश्चात, रुद्राक्ष की माला से “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र का न्यूनतम १०८ बार जाप करें। यदि जातक गोचर के शनि, साढ़ेसाती या ढैय्या से अत्यंत पीड़ित है, तो उसे दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ आरंभ करना चाहिएपद्म पुराण और निर्णयसिंधु के अनुसार, इसे शनिवार से प्रारंभ करके लगातार आठ दिनों तक प्रतिदिन तीन बार पढ़ने का नियम है। स्त्रियों को अपने मासिक धर्म (ऋतुकाल) के समय इस स्तोत्र के पाठ की पूर्ण मनाही है, तथा वे मूर्ति का स्पर्श न करें   

ख. भगवान शिव की विशिष्ट शमी-अर्पण विधि

शिव महापुराण के अनुसार, शनिवार को शिवलिंग पर विशेष अभिषेक विधि से शनि देव अत्यंत शांत और प्रसन्न होते हैं। सर्वप्रथम तांबे के लोटे में शुद्ध जल लेकर उसमें थोड़ा गंगाजल, कच्चा दूध और काले तिल मिलाएं और शिवलिंग पर अर्पित करें। शिवलिंग पर जल, बेलपत्र, धतूरा और चंदन अर्पित कर पूरा श्रृंगार करने के पश्चात ही शमी का पत्ता चढ़ाया जाता है   

शमी के पत्ते को सीधे शिवलिंग पर न रखकर, सर्वप्रथम माता पार्वती के हस्तकमल (जलाधारी) पर स्पर्श कराएं और फिर “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का उच्चारण करते हुए शिवलिंग के मस्तक पर अर्पित करें। गंभीर रोगों से मुक्ति हेतु शमी के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित कर ‘अवधूतेश्वर महादेव’ का नाम लेकर जल अर्पित करना चाहिए।   

ग. हनुमान जी की सिंदूर और चोला विधि

शनिवार के दिन हनुमान जी के मंदिर जाकर चमेली के तेल में शुद्ध सिंदूर मिलाकर उनके विग्रह पर लेपन (चोला चढ़ाना) करना चाहिए। हनुमान जी के सम्मुख बैठकर हनुमान चालीसा, बजरंग बाण या सुंदरकांड का पाठ करेंआनंद रामायण में वर्णित हनुमान जी के द्वादश नामों का जाप करने से शनि देव अत्यंत प्रसन्न होकर जातक की कुंडली के क्रूर प्रभावों को हर लेते हैं।   

घ. माता काली का तांत्रिक व सात्विक पूजन

शनिवार की रात्रि में देवी काली या मां दुर्गा की प्रतिमा के समक्ष गाय के घी का या तिल के तेल का चौमुखा दीपक प्रज्वलित करें। माता को लाल चंदन का तिलक लगाएं और लाल गुड़हल के पुष्प अर्पित करें। “ॐ क्रीं कालिकायै नमः” मंत्र का जाप करने से घर की समस्त नकारात्मक शक्तियां, ऊपरी हवाएं और शत्रु बाधाएं तत्काल शांत हो जाती हैं   

ङ. पीपल वृक्ष की परिक्रमा और दीपदान विधि

शनिवार को केवल सूर्योदय के पश्चात ही पीपल को जल देना चाहिए, क्योंकि सूर्योदय से पूर्व अलक्ष्मी का वास होता है। तांबे या पीतल के लोटे में जल, कच्चा दूध, काले तिल और थोड़ी सी चीनी मिलाकर पीपल की जड़ में अर्पित करें। जल अर्पित करने के पश्चात पीपल वृक्ष की सात बार परिक्रमा करें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का निरंतर जाप करते रहें। शनिवार की शाम को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का एक चौमुखा दीपक जलाएं। दीपक के नीचे थोड़ा सा काला तिल या लोहे की कील रख दें, इससे पितृदोष की शांति होती है   

४. शनिवार के शास्त्रीय यम, नियम और निषेध

शनिवार के दिन कुछ विशेष वस्तुओं के क्रय-विक्रय और व्यक्तिगत आचरण को लेकर ऋषियों ने अत्यंत कड़े नियम बनाए हैं, जिनका उल्लंघन करने पर जातक को घोर दरिद्रता और शारीरिक कष्टों का सामना करना पड़ सकता है।

क. क्रय-विक्रय निषेध एवं स्वीकृत सारणी (स्मार्त एवं ज्योतिषीय विवेचन)

मुहूर्त चिंतामणि और आरंभ सिद्धि जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार, शनिवार ‘तीक्ष्ण और दारुण संज्ञक’ वार है। इस दिन की ब्रह्मांडीय तरंगें अत्यंत कठोर होती हैं, जिसके कारण विशिष्ट धातुओं और रसायनों का क्रय जातक के लिए अशुभ फलदायी हो सकता है   

वस्तु श्रेणी शनिवार को क्रय स्थिति ज्योतिषीय एवं पौराणिक कारण शास्त्रोक्त विकल्प / दान का प्रभाव शास्त्रीय संदर्भ ग्रंथ
लोहा / लौह वस्तुएं

पूर्णतः वर्जित

[cite: 10, 19, 25]

लोहा शनि देव की मुख्य धातु है। शनिवार को लोहा घर लाने से तीक्ष्ण ऊर्जा सक्रिय होती है, जिससे परिवार में कलह-क्लेश बढ़ता है और दुर्घटनाओं का योग निर्मित होता है

इस दिन लोहे का दान करना अत्यंत फलदायी है; इससे नौकरी और व्यवसाय में अप्रत्याशित सफलता मिलती है

मुहूर्त चिंतामणि, नारद संहिता

[cite: 21, 28, 29]

सरसों का तेल / खाद्य तेल

पूर्णतः वर्जित

[cite: 10, 30]

तेल शनि देव के घावों की औषधि है। शनिवार को तेल खरीदने से शारीरिक कष्ट, वात रोग और बीमारियां बढ़ती हैं

शनिवार को सरसों के तेल का दान करना या काले कुत्ते को तेल से निर्मित परांठा/हलवा खिलाना शनि दशा को शांत करता है

धर्मसिंधु, नित्यकर्म प्रकाश

[cite: 33, 34]

नमक

पूर्णतः वर्जित

[cite: 10, 19, 26]

नमक तीक्ष्ण रसात्मक होता है जो राहु-शनि की नकारात्मकता को आकर्षित करता है। शनिवार को नमक खरीदने से घर पर ऋण (कर्ज) का भारी बोझ बढ़ता है

शुक्रवार को ही नमक खरीदकर रख लेना चाहिए। इस दिन नमक का दान करने से शनि दोष दूर होता है

निर्णयसिंधु, स्मृति-रत्नावली

[cite: 11, 33]

काले तिल

पूर्णतः वर्जित

[cite: 19, 35, 36]

काले तिल यम और पितरों से संबंधित हैं। शनिवार को काले तिल खरीदकर घर लाने से जातक के महत्वपूर्ण कार्यों में बाधाएं उत्पन्न होती हैं

पूजा और दान के निमित्त काले तिल का उपयोग उत्तम है, परंतु इसकी खरीद अन्य दिनों में ही कर लेनी चाहिए

निर्णयसिंधु, गरुड़ पुराण

[cite: 11, 37]

चमड़े की वस्तुएं / जूते

पूर्णतः वर्जित

[cite: 10, 19, 26]

चमड़ा मृत पशुओं की त्वचा से निर्मित होता है, जो राहु की तामसिक ऊर्जा का संवाहक है। शनिवार को चमड़े के जूते खरीदने से करियर में अपमान और असफलता का सामना करना पड़ता है

शनिवार को किसी गरीब व्यक्ति को काले जूते या चप्पल दान करने से शनि देव की साढ़ेसाती का प्रभाव समाप्त हो जाता है

धर्मसिंधु, पराशर स्मृति

[cite: 34]

झाड़ू

अत्यंत शुभ (केवल कृष्ण पक्ष में)

[cite: 19]

झाड़ू को मां लक्ष्मी का साक्षात स्वरूप माना गया है। शनिवार को झाड़ू घर लाने से अलक्ष्मी विदा होती हैं और स्थिर लक्ष्मी का वास होता है।

झाड़ू हमेशा कृष्ण पक्ष के शनिवार को ही खरीदनी चाहिए। शुक्ल पक्ष में झाड़ू खरीदना सर्वथा वर्जित है, क्योंकि यह आर्थिक तंगी का कारण बनता है।

स्मृति संग्रह, वास्तु चिंतामणि

[cite: 38]

  

ख. क्षौरकर्म (बाल, दाढ़ी और नाखून काटने) के नियम: महाभारत का साक्ष्य

सनातन धर्मशास्त्रों में शरीर के अंगों के शोधन और कर्तन (क्षौरकर्म) हेतु अत्यंत वैज्ञानिक नियम प्रतिपादित किए गए हैं। महाभारत के अनुशासन पर्व (अध्याय १०८, १२८ और १३९) के अंतर्गत ‘आयुष्याख्यान’ प्रसंग में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को दिन-वार के अनुसार क्षौरकर्म के गंभीर प्रभावों के बारे में विस्तार से बताया है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी इन नियमों की पुष्टि की गई है। वार-विशेष के अनुसार इसके प्रभाव निम्नलिखित हैं:   

  • सोमवार: सोमवार को बाल कटवाने से मानसिक अशांति बढ़ती है और शिवभक्ति की हानि होती है। शास्त्रों के अनुसार, पुत्रवान व्यक्ति को सोमवार के दिन कभी भी क्षौरकर्म नहीं कराना चाहिए   

  • मंगलवार: मंगलवार का संबंध मंगल ग्रह से है। इस दिन बाल या नाखून काटना अत्यंत अशुभ माना गया हैमहाभारत के अनुसार, मंगलवार को क्षौरकर्म कराने से आयु में आठ महीने की कमी होती है और यह अकाल मृत्यु का कारण बन सकता है   

  • बुधवार: बुधवार को बाल, दाढ़ी और नाखून काटना अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है। इस दिन क्षौरकर्म कराने से जातक की आयु में पांच महीने की वृद्धि होती है और घर में निरंतर धन-धान्य तथा लक्ष्मी का आगमन होता है   

  • गुरुवार: गुरुवार देवगुरु बृहस्पति का दिन है, जो बुद्धि, धर्म और समृद्धि के अधिष्ठाता हैं। इस दिन बाल या नाखून काटने से मान-सम्मान की हानि होती है और घर से माता लक्ष्मी रुष्ट होकर चली जाती हैं   

  • शुक्रवार: शुक्रवार सौंदर्य और वैभव के कारक शुक्र देव का दिन है। इस दिन क्षौरकर्म कराना जातक के तेज, ओज और आकर्षण में वृद्धि करता है। इससे जातक की आयु में ग्यारह महीने की वृद्धि होती है और समाज में यश की प्राप्ति होती है   

  • शनिवार: शनिवार का दिन न्याय के क्रूर ग्रह शनि का है। शनिवार को भूलकर भी बाल, दाढ़ी या नाखून नहीं काटने चाहिएमहाभारत के अनुसार, शनिवार को क्षौरकर्म कराने से जातक की आयु सात महीने घट जाती है और वह गंभीर रोगों से ग्रस्त हो जाता है   

  • रविवार: रविवार सूर्य देव का दिन है और इस दिन क्षौरकर्म कराने से जातक के संचित पुण्य नष्ट होते हैं तथा धन, बुद्धि और धर्म की भारी क्षति होती है। इससे आयु में एक महीने की कमी आती है   

[क्षौरकर्म वार फल प्रभाव - महाभारत अनुशासन पर्व]
 ├── बुधवार  ──► आयु वृद्धि (+5 माह) और लक्ष्मी प्राप्ति [शुभ]
 ├── शुक्रवार ──► तेज वृद्धि (+11 माह) और यश लाभ [शुभ]
 ├── सोमवार  ──► शिवभक्ति की हानि (पुत्रवानों हेतु वर्जित) [अशुभ]
 ├── गुरुवार  ──► मान-सम्मान और संचित लक्ष्मी का क्षय [अशुभ]
 ├── रविवार  ──► धन, बुद्धि और धर्म की प्रत्यक्ष क्षति [अशुभ]
 ├── मंगलवार ──► रक्त विकार और अकाल मृत्यु का भय (-8 माह) [अत्यंत अशुभ]
 └── शनिवार  ──► वात रोग, घोर कष्ट और आयु का ह्रास (-7 माह) [अत्यंत अशुभ]

ग. तैल विरोधाभास: शनिवार को तेल क्रय वर्जित किंतु ‘तैलाभ्यंग’ अत्यंत शुभ

ज्योतिष और आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में शनिवार के दिन तेल के प्रयोग को लेकर एक अत्यंत सुंदर और रहस्यमयी व्यवस्था दी गई है। जहां एक ओर शनिवार को तेल का क्रय (खरीदना) पूर्णतः वर्जित माना गया है, वहीं दूसरी ओर इस दिन शरीर पर तैलाभ्यंग (तेल की मालिश) करना परम कल्याणकारी माना गया है। शास्त्रों में इसके संदर्भ में निम्नलिखित सुप्रसिद्ध श्लोक मिलता है:   

इस श्लोक के अनुसार, शनिवार के दिन शरीर पर तेल लगाने से ‘सुख’ की प्राप्ति होती है। शनि देव का स्वभाव अत्यंत रूखा, शुष्क और वात प्रधान है। शनिवार को शरीर पर सरसों या तिल के तेल की मालिश करने से जातक के शरीर का वात दोष शांत होता है, त्वचा को स्निग्धता मिलती है और शनि की वक्र दृष्टि का नकारात्मक प्रभाव निष्प्रभावी हो जाता है   

परंतु, शनिवार के दिन तेल खरीदना इसलिए वर्जित है क्योंकि अपूजित और अपवित्र रूप में सरसों का तेल सीधे घर में लाना शनि के क्रूर और दंडात्मक स्पंदनों को आमंत्रण देता है। इसके अतिरिक्त, निर्णयसिंधु में एक विशेष परिहार श्लोक प्राप्त होता है:   

षष्ठी शनैश्चरे तैलं महाष्टम्यां पलानिच। तीर्थक्षौरं चतुर्दशयां, दीपमाल्यां च मैथुनम्॥

[cite: 22]

अर्थात्, सामान्यतः षष्ठी तिथि को तेल का प्रयोग (तैलाभ्यंग) शास्त्रों में वर्जित माना गया है, परंतु यदि षष्ठी तिथि शनिवार के दिन पड़ जाए, तो शनिवार के प्रभाव से वहां तेल मालिश करने का निषेध समाप्त हो जाता है और वह पूर्णतः शुभ फलदायी बन जाती है   

घ. आचरण और मानवीय व्यवहार के नियम

शनि देव न्याय के अधिपति हैं, अतः उनका सबसे बड़ा पूजन जातक के कर्मों की शुद्धता है। शनिवार के दिन निम्नलिखित आचरण नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए:   

  • कमजोर वर्ग का सम्मान: शनिवार को किसी भी गरीब, असहाय, सफाईकर्मी, बुजुर्ग, विधवा स्त्री या शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति का अपमान भूलकर भी नहीं करना चाहिए। जो लोग कमजोर वर्ग की मदद करते हैं और उन्हें उनका उचित पारिश्रमिक देते हैं, उन पर शनि देव की सदैव अमोघ कृपा बरसती है।

  • तामसिक भोजन का त्याग: इस दिन मद्यपान (शराब), मांस, तामसिक भोजन या परस्त्री/परपुरुष गमन से पूर्णतः दूर रहना चाहिए। ऐसा न करने पर शनि की महादशा अत्यंत विनाशकारी सिद्ध होती है   

  • पुराने झाड़ू का विसर्जन: घर की टूटी या पुरानी झाड़ू को केवल शनिवार या अमावस्या के दिन ही घर से बाहर निकालना चाहिए। भूलकर भी इसे गुरुवार या शुक्रवार को न फेंकें, अन्यथा माता लक्ष्मी रुष्ट होकर घर से प्रस्थान कर जाती हैं।   

५. ध्यान देने योग्य पहलू

शनिवार का व्रत और पूजन केवल रूढ़िवादी परंपरा नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं को अनुकूल करने का एक सुव्यवस्थित आध्यात्मिक विज्ञान है। वैदिक ज्योतिष और पौराणिक आख्यानों की सूक्ष्म मीमांसा से यह स्पष्ट होता है कि शनि देव जातक के अहंकार का नाश करके उसे सत्य, न्याय और धर्म के मार्ग पर अग्रसर करते हैं। शनिवार के दिन पंचदेव पूजन की यह शास्त्रोक्त पद्धति जातक के जीवन के सभी कष्टों, ऋणों, रोगों और ग्रह दोषों का समूल नाश करके उसे सुख, समृद्धि और आत्मिक संतोष प्रदान करती है। जो मनुष्य निष्काम भाव से, आचरण की शुद्धता बनाए रखते हुए इस पूजन विधान का पालन करता है, वह शनि देव के दंडात्मक प्रकोप से मुक्त होकर उनकी परम अनुकंपा का भागी बनता है   

शुक्रवार व्रत: संपूर्ण उपासना विधि और नियम

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